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पिता के वचन को निभाने के लिए राम वन जाने को हुए सहर्ष तैयार : महंत दिवाकर

  • rounak group

नवागढ़। शौर्यपथ । ग्राम बाघुल में सोमवार को कलशयात्रा के साथ सात दिवसीय श्री राम चरित मानस महायज्ञ एवं रामकथा में रविवार को कथाव्यास महंत दिवाकर महाराज ने सीता-राम विवाह की कथा सुनाई। जिसको सुनकर श्रोता भाव-विभोर हो उठे। इसके पूर्व गांव के गौठान में गौमाता का पूजन भी किया,इस दौरान नवागढ़ नगर प्रधान विकास धर दीवान, दाऊ मिन्टू बिसेन आदि ने भी पूजन किया। 

कथावाचक दिवाकर महाराज ने कहा कि राजा जनक के दरबार में भगवान शिव का धनुष रखा हुआ था। एक दिन सीता ने घर की सफाई करते हुए उसे उठाकर दूसरी जगह रख दिया। जिसे देख राजा जनक को आश्चर्य हुआ, क्योंकि धनुष किसी से उठता नहीं था। राजा ने प्रतिज्ञा ली, कि जो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी से सीता का विवाह होगा। उन्होंने स्वयंवर की तिथि निर्धारित कर सभी देश के राजा और महाराजाओं को निमंत्रण पत्र भेजा। समय पर स्वयंवर की कार्रवाई शुरू हुई और एक-एक कर लोगों ने धनुष उठाने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। गुरू की आज्ञा से श्रीराम ने धनुष उठा प्रत्यंचा चढ़ाने लगे तो वह टूट गया। इसके बाद धूमधाम से सीता व राम का विवाह हुआ।

महाराज ने बताया कि अयोध्या के कोपभवन में कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वचन मांगा। जिस पर राजा दशरथ ने कहा कि रघुकुल रीति सदा चल आई, प्राण जाई पर वचन न जाई। यह सुनते ही कैकयी ने राजा दशरथ से दो वचनों में से, पहला वचन अपने पुत्र भरत को अयोध्या की राजगद्दी तथा दूसरा प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास । यह वचन सुनते ही महाराजा दशरथ के होश उड़ गए, जब प्रभु श्रीराम इस बात से अवगत हुए, तो वह पिता के वचन को निभाने के लिए वन जाने को सहर्ष तैयार हो गए। माता सीता व लक्ष्मण के साथ वन को चल दिए। रास्ते में श्री राम गंगा तट पर पहुंचते हैं, जहां केवट से गंगा पार कराने की आग्रह करते हैं। केवट ने अपनी नाव पर चढ़ाने के लिए प्रभु श्रीराम को इंकार कर दिया, उसे मालूम था कि पत्थर बनी अहिल्या श्री राम के चरणों के स्पर्श से पुन: नारी बन गई, प्रभु श्रीराम केवट के भाव को समझ जाते हैं और अपना पैर उससे धोने का कहते हैं। केवट श्रीराम का पैर धोकर उन्हें गंगा पार पहुंचाता।

इस अवसर पर भाजपा महिला मोर्चा जिला महामंत्री मधु रॉय, सुरेश निषाद, रामकिशुन साहू, मीना साहू, केदार साहू, रामधुन साहू, ओमप्रकाश साहू, संतराम सोनकर, भुखरा साहू, धन्नू साहू, हजारी साहू, जनकु साहू, गोपाल साहू, किशुन श्रीवास, रामनाथ साहू आदि उपस्थित रहे।

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शौर्यपथ

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