बिलासपुर ।
व्हीबी–जी राम जी योजना को लेकर गुरुवार को बिलासपुर में एक बार फिर पत्रकार वार्ता आयोजित की गई। यह वार्ता केंद्रीय मंत्री श्री तोखन साहू द्वारा आयोजित की गई, जिसमें पीआईसी के तत्वावधान में पावर प्रेजेंटेशन के माध्यम से योजना का पक्ष रखा गया। उल्लेखनीय है कि इससे एक दिन पूर्व 7 जनवरी को स्थानीय विधायक द्वारा भी इसी विषय पर पत्रकार वार्ता की जा चुकी है।
लगातार हो रही पत्रकार वार्ताओं से यह स्पष्ट होता है कि केंद्र सरकार आजीविका मिशन से जुड़े इस नए अधिनियम को लेकर स्वयं भी असमंजस और दबाव में नजर आ रही है। मंत्री महोदय ने इसे “लोकतांत्रिक विमर्श” बताया, लेकिन सवाल यह उठता है कि यही लोकतांत्रिक विमर्श नोटबंदी, एकतरफा लॉकडाउन, किसान कानून और श्रम कानून लागू करते समय क्यों नहीं दिखाई दिया।
पूरी योजना में जल और पानी को केंद्र में रखा गया है। इस संदर्भ में प्रसिद्ध समाज सुधारक रहीम का दोहा प्रासंगिक प्रतीत होता है—
“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून,
पानी गए न ऊबरे, मोती मानस चून।”
व्हीबी–जी राम जी योजना को कई योजनाओं का मिश्रण मात्र बताया जा रहा है। जिस तरह ठेले पर उपलब्ध तमाम व्यंजनों को देखकर ग्राहक भ्रमित हो जाता है और अंततः ‘गटपट’ मंगा लेता है, या रेस्तरां में ‘मिक्स वेज’ पर संतोष कर लेता है—कुछ वैसी ही स्थिति इस योजना की भी दिखाई देती है।
मनरेगा को नए रूप में प्रस्तुत करते हुए इसे विकसित भारत की आधारशिला बताया जा रहा है, लेकिन विडंबना यह है कि बीते दस वर्षों में लाए गए ‘स्मार्ट सिटी’ जैसे बड़े कॉन्सेप्ट भी ज़मीनी हकीकत में पूरी तरह उतर नहीं पाए। उदाहरण के तौर पर बिलासपुर स्मार्ट सिटी को आज तक घोषित बजट का आधा हिस्सा भी प्राप्त नहीं हो सका।
अब मनरेगा को भ्रष्ट व्यवस्था बताकर नए प्रयोगों के हवाले किया जा रहा है—मानो “बंदरों के हाथ में राम जी” सौंप दिए गए हों। ऐसे में जनता के बीच यह भाव और गहराता जा रहा है कि अब सब कुछ राम भरोसे ही है।
इसी भाव को समेटते हुए अंत में यही पंक्तियाँ सटीक प्रतीत होती हैं—
“जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए।”