बिलासपुर / शौर्यपथ / पुलिस एवं अन्य वर्दीधारी अनुशासित बलों में बिना अनुमति ड्यूटी अथवा प्रशिक्षण छोड़कर लंबे समय तक अनुपस्थित रहना गंभीर परिणाम वाला कृत्य हो सकता है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कठिन परिस्थितियों या असुविधा के कारण प्रशिक्षण कैंप छोड़ देना डेजर्शन यानी सेवा से पलायन की श्रेणी में आ सकता है। अनुशासित बलों में इस तरह के आचरण को सामान्य नहीं माना जा सकता।
जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकल पीठ ने तीन आरक्षकों की याचिकाएं खारिज करते हुए उनकी सेवा से बर्खास्तगी के आदेश को उचित ठहराया है। याचिकाकर्ताओं त्रिलोक चंद साहू, तीरथ दास और लक्ष्मीनारायण पटेल की पुलिस विभाग में वर्ष 2008-09 में नियुक्ति हुई थी।
// बिना अनुमति प्रशिक्षण बीच में छोड़ा //
17 जून 2009 को तीनों आरक्षकों को महाराष्ट्र के चाकुर स्थित बीएसएफ स्पेशल ट्रेनिंग सेंटर में बुनियादी प्रशिक्षण के लिए भेजा गया था। हालांकि, तीनों ने बिना अनुमति प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ दिया। इसके बाद विभाग ने 8 फरवरी 2010 को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा। जवाब के बाद 10 मार्च 2010 को तीनों को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। विभागीय अपील और दया याचिकाएं भी खारिज होने के बाद तीनों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
// तीन वर्ष की सेवा पूरी नहीं होने का भी रहा महत्व //
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और संबंधित नियमों की समीक्षा करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं ने सेवा की तीन वर्ष की अवधि पूरी नहीं की थी, इसलिए वे स्थायी कर्मचारी नहीं थे। वर्दीधारी बलों में तैनात कर्मचारी सामान्य अथवा मामूली कारणों से लंबे समय तक अनुपस्थित नहीं रह सकते।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कठिन क्षेत्र में ड्यूटी या असुविधाजनक स्थान पर प्रतिनियुक्ति की आशंका के कारण प्रशिक्षण कैंप छोड़ देना डेजर्शन की श्रेणी में आता है। अनुशासित बलों में इस प्रकार के आचरण को किसी भी परिस्थिति में सामान्य नहीं माना जा सकता।
// स्वास्थ्य कारणों का दिया हवाला //
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि उन्हें स्वीकृत पदों पर नियुक्त किया गया था और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से वे अनुपस्थित हुए थे। उनके अनुसार, उन्होंने चिकित्सा संबंधी दस्तावेज भी प्रस्तुत किए थे और विभागीय जांच के बिना की गई बर्खास्तगी को गलत बताया गया।
राज्य सरकार ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि तीनों अस्थायी कर्मचारी थे। नियमों के तहत अस्थायी सरकारी कर्मचारी को एक महीने का नोटिस देकर सेवा से हटाया जा सकता है और ऐसे मामलों में विभागीय जांच अनिवार्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के पक्ष को स्वीकार करते हुए तीनों याचिकाएं खारिज कर दीं और बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा। इस फैसले से स्पष्ट है कि अनुशासित बलों में प्रशिक्षण और ड्यूटी के दौरान बिना अनुमति अनुपस्थिति को गंभीरता से लिया जाएगा तथा कठिन परिस्थितियों का हवाला देकर सेवा या प्रशिक्षण से पलायन को सामान्य कृत्य नहीं माना जा सकता।