रसूख के दम पर कब्जे का आरोप: पुलगांव नाले से पचरी घाट तक भूमि विवाद, प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
दुर्ग। शौर्यपथ की विशेष रिपोर्ट
शहर के प्रतिष्ठित व्यापारी के रूप में पहचाने जाने वाले ताराचंद रमेश कुमार जैन एक बार फिर भूमि विवाद के केंद्र में हैं। आरोप है कि उन्होंने सरकारी नाले से सटी भूमि, समाज की जमीन, मंदिर परिसर और अब एक गरीब किसान की निजी भूमि तक पर कब्जा करने की कोशिश की है। मामले ने तूल पकड़ लिया है और स्थानीय लोगों में आक्रोश व्याप्त है।
किसान की जमीन पर फिर खड़ा हुआ विवाद
किसान डोमन सिन्हा ने आरोप लगाया है कि उनकी कृषि भूमि के सीमांकन से पूर्व ही ताराचंद रमेश कुमार जैन द्वारा खेत की मेड़ से लगभग 6 फीट बाहर बाउंड्री वॉल खड़ी कर दी गई।
बताया जा रहा है कि पूर्व में समाचार प्रकाशित होने के बाद जैन ने बाउंड्री तोड़कर मेड़ के अनुरूप दीवार उठाने का आश्वासन दिया था। किसान के अनुसार, कुछ दिनों तक काम रुका रहा, लेकिन जब वह खेत की ओर नहीं गया तो दोबारा निर्माण शुरू कर दिया गया।
डोमन सिन्हा का कहना है कि सीमांकन की मांग के बावजूद सुबह 6 बजे से देर रात तक मजदूर लगाकर विवादित हिस्से में दीवार निर्माण जारी है।
नाले की सरकारी भूमि और मंदिर परिसर पर भी आरोप
स्थानीय सूत्रों के अनुसार पुलगांव नाले से सटी सरकारी भूमि पर भी पहले विवाद खड़ा हुआ था। जांच प्रक्रिया लंबित रहने के दौरान कथित रूप से बाउंड्री निर्माण कर लिया गया।
इसी तरह समाज की जमीन पर बने मंदिर को "नए स्वरूप" देने के नाम पर बड़े भूभाग पर निर्माण का आरोप लगाया गया है।
पचरी घाट का मुद्दा फिर गरमाया
पूर्व मंत्री स्वर्गीय हेमचंद यादव द्वारा निर्मित पचरी घाट का हिस्सा भी कथित रूप से अतिक्रमण की जद में बताया जा रहा है। घाट के पास लगी शिलालेख आज भी मौजूद है, लेकिन स्थानीय नागरिकों का कहना है कि घाट का एक बड़ा हिस्सा आम जनता की पहुंच से बाहर हो चुका है।
प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल
मामले की शिकायत थाना स्तर पर की जा चुकी है। किसान सीमांकन की मांग कर रहे हैं, वहीं आरोप है कि प्रशासनिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार का लाभ उठाकर निर्माण कार्य पूरा किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष राजस्व सीमांकन और स्थलीय जांच नहीं हुई तो विवाद और गहरा सकता है।
जनहित का सवाल
भूमि विवाद केवल दो पक्षों का मामला नहीं रह जाता, जब उसमें सरकारी जमीन, सार्वजनिक घाट और समाज की संपत्ति शामिल हो। ऐसे मामलों में पारदर्शिता, त्वरित सीमांकन और स्पष्ट प्रशासनिक निर्णय आवश्यक है, ताकि न तो किसी गरीब किसान के अधिकारों का हनन हो और न ही सार्वजनिक संपत्ति पर अतिक्रमण हो।
"शौर्यपथ" की ओर से यह स्पष्ट है कि कानून सबके लिए समान है—चाहे वह रसूखदार व्यापारी हो या साधारण किसान। यदि आरोपों में सच्चाई है तो संबंधित विभागों—राजस्व, नगर निगम और जिला प्रशासन—को तत्काल संयुक्त जांच कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं—क्या सीमांकन कराकर विवादित भूमि की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाएगी?
या फिर जांच और कागजी प्रक्रिया के बीच निर्माण की दीवारें और ऊंची होती जाएंगी?
आम जनता उम्मीद कर रही है कि सुशासन का दावा जमीनी स्तर पर भी दिखाई दे और सार्वजनिक व निजी भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
?? कॉलम बॉक्स: मामले की प्रमुख बातें
?? किसान की जमीन पर विवाद – डोमन सिन्हा ने आरोप लगाया कि खेत की मेड़ से लगभग 6 फीट बाहर बाउंड्री वॉल खड़ी की गई।
?? पूर्व में दिया गया आश्वासन – समाचार प्रकाशन के बाद दीवार तोड़कर मेड़ पर निर्माण का वादा, लेकिन दोबारा निर्माण शुरू होने का आरोप।
?? सीमांकन की मांग लंबित – किसान द्वारा राजस्व सीमांकन की मांग, निर्माण कार्य जारी रहने से विवाद गहराया।
?? सरकारी नाले की भूमि पर सवाल – पुलगांव नाले से सटी जमीन पर भी पहले कब्जे के आरोप और जांच प्रक्रिया जारी।
?? समाज की जमीन व मंदिर परिसर – "नए स्वरूप" के नाम पर बड़े हिस्से में निर्माण का आरोप।
?? स्व. हेमचंद यादव का पचरी घाट – पूर्व मंत्री द्वारा निर्मित घाट के हिस्से पर कथित अतिक्रमण, शिलालेख आज भी मौजूद।
?? प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल – शिकायत के बावजूद त्वरित कार्रवाई न होने से स्थानीय नागरिकों में असंतोष।