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बीजेपी ने जो विभाजनकारी राष्ट्रवाद पेश किया है, उसे दरकिनार करते हुए कांग्रेस का दबदबा कायम रहेगा? " संस्मरण " प्रोमिस लैंड से Featured

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नई दिल्ली / शौर्यपथ / अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के संस्मरण में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को नर्वस नेता बताने की बात पर राजनितिक बवाल तो हो ही रहा किन्तु उसी संस्मरण में ऐसी कई बाते भी कही गयी जिस पर अगर गौर किया जाए तो यही संस्मरण की दुहाई देते हुए जो आज बराक ओबामा की बात का समर्थन कर रहे वही विरोध करने लगेंगे . अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति नहीं जहाँ अपने 2011 के संस्मरण में देश में भाजपा के विभाजन कारी नीति का भी उल्लेख किया है जो साल 2014 में सच हुआ .

भारत के भविष्य के बारे में क्या लिखा?
ओबामा लिखते हैं कि आज का भारत "एक कामयाब कहानी है जो कई सरकार बदलने, राजनीतिक दलों के बीच तीखी तकरार, कई सशस्त्र अलगाववादी मूवमेंट और हर तरह के भ्रष्टाचार के घोटालों को झेल चुका है."

लेकिन उन्नत लोकतंत्र और मुक्त अर्थव्यवस्था के बावजूद भारत अब भी 'गांधी की कल्पना वाले समतावादी, शांतिपूर्ण और सहअस्तित्व वाले समाज की छवि से कम ही मेल खाता है. असमानता चरम पर है और हिंसा 'भारतीय जीवन का हिस्सा बनी हुई है.'

ओबामा लिखते हैं कि नवंबर की उस शाम मनमोहन सिंह का घर छोड़ते वक़्त वो सोच रहे थे कि जब 78 साल के प्रधानमंत्री अपनी जिम्मेदारी से अलग होंगे तो क्या होगा?

ओबामा ने लिखा है, "क्या मशाल कामयाबी के साथ राहुल गांधी तक पहुंच जाएगी, उनकी मां ने जो नियति तय की है वो पूरी होगी और बीजेपी ने जो विभाजनकारी राष्ट्रवाद पेश किया है, उसे दरकिनार करते हुए कांग्रेस का दबदबा कायम रहेगा? "

"न जाने क्यों, मुझे संदेह था. ये मिस्टर सिंह की ग़लती नहीं थी. उन्होंने अपनी भूमिका निभाई, शीतयुद्ध के बाद के तमाम उदारवादी लोकतांत्रिक देशों की राह पर चलते हुए: संवैधानिक व्यवस्था को कायम रखते हुए, रोजमर्रा के काम और अक्सर जीडीपी को ऊपर करने के तकनीकी काम करते हुए और सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाते हुए.

"मेरी ही तरह वो भी ये ही भरोसा करते हुए आए थे कि हम सभी लोकतंत्र से यही उम्मीद रख सकते हैं, ख़ासकर भारत और अमेरिका जैसे बड़े, बहुजातीय बहुधार्मिक समाज में."

लेकिन ओबामा ने ख़ुद भी पाया कि "हिंसा, लालच, भ्रष्टाचार, राष्ट्रवाद, नस्लभेद और धार्मिक असहिष्णुता जैसी मानवीय लालसाएं अपनी अनिश्चिताओं और नैतिकता को पीछे छोड़ते हुए दूसरों को छोटा ठहराने की निरर्थकता, जैसे तमाम कारक इतने मजबूत है कि किसी भी लोकतंत्र के लिए इन पर स्थायी तौर पर रोक लगाना मुमकिन नही है."

"ये हर जगह इंतज़ार में रहते हैं, जब भी तरक्की की रफ़्तार मंद होती है या फिर आबादी का स्वरुप बदलता है या फिर कोई करिश्माई नेता लोगों के डर और असंतोष की लहर पर सवार होता है, ये उभरकर ऊपर आ जाते हैं." ओबामा के सवाल का जवाब 2014 में मिला जब नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी ने जबरदस्त जीत हासिल की.

ओबामा 2015 में दोबारा आए. तब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री थे और ओबामा पद पर रहते हुए दो बार भारत की यात्रा करने वाले अमेरिका के पहले राष्ट्रपति बने. लेकिन पूर्व राष्ट्रपति के संस्मरणों का पहला हिस्सा 2011 में ओसामा बिन लादेन की मौत के साथ ख़त्म होता है. उम्मीद की जा रही है कि दूसरे हिस्से में वो नरेंद्र मोदी को लेकर राय जाहिर करेंगे. ( साभार बीबीसी हिंदी )

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