नई दिल्ली /
दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शामिल गौतम अडानी पर वर्ष 2024 में आरोप लगा था कि उन्होंने एक बड़े सौर ऊर्जा परियोजना को सफल बनाने के लिए भारी रिश्वत दी। उन पर साजिश, सिक्योरिटीज फ्रॉड और वायर फ्रॉड जैसे आरोप लगाए गए थे। यह मामला अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड और एक अन्य कंपनी द्वारा भारत सरकार को 12 गीगावॉट सौर ऊर्जा बेचने के समझौते से जुड़ा था, जिसका उद्देश्य लाखों घरों और व्यवसायों तक बिजली पहुंचाना था।
उस समय अडानी समूह ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया था। अडानी को इस मामले में कभी गिरफ्तार नहीं किया गया और न ही उन्हें मुकदमे का सामना करने के लिए अमेरिका लाया गया। भारत में कई लोगों को पहले से उम्मीद थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा विदेशी भ्रष्ट आचरण अधिनियम (Foreign Corrupt Practices Act - FCPA) के प्रवर्तन को निलंबित किए जाने के बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा। यह कानून विदेशों में व्यापारिक रिश्वतखोरी पर रोक लगाता है।
आरोप वापस लेने का यह फैसला ऐसे समय आया जब अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) ने अडानी से जुड़े एक अन्य मुकदमे के निपटारे की जानकारी दी।
गौतम अडानी ने 1990 के दशक में कोयला कारोबार से अपनी संपत्ति बनाई थी। समय के साथ अडानी समूह ने नवीकरणीय ऊर्जा, रक्षा और कृषि जैसे क्षेत्रों में निवेश कर अपना कारोबार विविध बनाया। कंपनी ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ा पोर्टफोलियो तैयार किया, जिसमें दुनिया के सबसे बड़े सौर ऊर्जा संयंत्रों में से एक भी शामिल है। समूह ने वर्ष 2030 तक देश की सबसे बड़ी स्वच्छ ऊर्जा कंपनी बनने का लक्ष्य रखा था। अडानी के भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से करीबी संबंध भी बताए जाते रहे हैं।
अमेरिकी अभियोजकों ने अदालत में दायर दस्तावेज में कहा,
“न्याय विभाग ने इस मामले की समीक्षा की है और अभियोजन संबंधी अपने विवेकाधिकार का उपयोग करते हुए व्यक्तिगत आरोपियों के खिलाफ इन आपराधिक मामलों पर आगे संसाधन खर्च न करने का निर्णय लिया है।”
हालांकि, इस अनुरोध को अभी न्यायाधीश निकोलस गारौफिस की मंजूरी मिलना बाकी है।
अभियोजकों के अनुसार, अडानी और उनके सह-आरोपियों के वकीलों ने भी इस अनुरोध पर सहमति जताई है। अडानी के वकील रॉबर्ट जियुफ्रा ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
दूसरी ओर, अडानी समूह के आलोचक भी लगातार सक्रिय रहे हैं। अमेरिकी वित्तीय शोध संस्था हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी समूह पर “खुलेआम शेयर मूल्य में हेरफेर” और “लेखा धोखाधड़ी” के आरोप लगाए थे। अडानी समूह ने इन दावों को “चयनित गलत सूचनाओं और पुराने, निराधार तथा बदनाम आरोपों का दुर्भावनापूर्ण मिश्रण” बताया था।
जब 2024 में अमेरिकी अभियोजकों ने अडानी पर आरोप लगाए थे, तब उनका कहना था कि अडानी और अन्य लोगों ने सौर ऊर्जा सौदे में दोहरी रणनीति अपनाई। एक ओर उन्होंने वॉल स्ट्रीट निवेशकों को परियोजना की आकर्षक तस्वीर दिखाकर अरबों डॉलर का निवेश हासिल किया, वहीं दूसरी ओर भारतीय सरकारी अधिकारियों को लाभकारी अनुबंध पाने के लिए लगभग 26.5 करोड़ डॉलर की रिश्वत देने का आरोप भी लगाया गया।
मामला सामने आने के बाद केन्या के राष्ट्रपति ने अडानी समूह से जुड़े करोड़ों डॉलर के एयरपोर्ट विस्तार और ऊर्जा समझौतों को रद्द कर दिया था। वहीं, श्रीलंका द्वारा कीमतों पर पुनर्विचार की मांग के बाद अडानी ग्रीन एनर्जी ने वहां की पवन ऊर्जा परियोजनाओं से खुद को अलग कर लिया। एक फ्रांसीसी तेल कंपनी ने भी समूह में नए निवेश अस्थायी रूप से रोक दिए थे।
विश्लेषकों का मानना है कि अडानी समूह की तेज़ी से बढ़ती सफलता का एक प्रमुख कारण उसकी कारोबारी प्राथमिकताओं का मोदी सरकार की नीतियों के अनुरूप होना रहा है। हालांकि, आलोचक अडानी पर “क्रोनी कैपिटलिज्म” यानी सत्ता से निकटता के जरिए लाभ लेने और सरकारी अनुबंधों में विशेष रियायत मिलने के आरोप लगाते रहे हैं, जिन्हें अडानी समूह लगातार खारिज करता आया है।