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फिजूल की बहस

  • rounak group

मेलबॉक्स / शौर्यपथ / आज जब कोरोना से निपटने में सरकार की नाकामी पर चर्चा होनी चाहिए, डीजल के लगातार बढ़ते दाम के बीच पहली बार इसकी कीमत पेट््रोल से पार जाने पर चिंता जताई जानी चाहिए, चीन की सेना के सीमा पार करने के खिलाफ सरकार की रणनीति पर बहस होनी चाहिए, तब 1975 के आपातकाल को तूल देना अफसोसनाक है। सबको मालूम है कि जनता ने इंदिरा गांधी को इसका सबक 1977 के आम चुनाव में सीखा दिया था। आज लोकतंत्र के काले अध्याय के रूप में इतिहास के अनैतिक फैसलों पर शोक मनाने से बेहतर है कि मौजूदा भारतीय लोकतंत्र पर मंडराते संकट के बादल का अंदाजा लगाया जाए। ‘द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट’ द्वारा जारी 2019 के डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत 160 देशों की सूची में 51वें स्थान पर एक त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र के रूप में मौजूद है। इसलिए बेहतर होगा कि इतिहास के दुर्भाग्यपूर्ण फैसलों को पीछे छोड़कर आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए।
अंकित कुमार मिश्रा, पटसा, समस्तीपुर

काल बनी बारिश
मानसून आते ही भारतीय किसान खुशी से झूम उठते हैं, क्योंकि यह वक्त खेतों की मेड़ बांधकर पानी को इकट्ठा करके धान रोपने का होता है। मगर इस बार 25 जून को यही मानसूनी बारिश बिहार और उत्तर प्रदेश में लोगों पर काल बनकर बरसी। इसमें बिजली गिरने से बिहार में लगभग 85 और उत्तर प्रदेश में करीब 25 लोगों की मौत हो गई। पर यह भी सच है कि प्राकृतिक आपदा रोकी नहीं जा सकती, सिर्फ सावधानी ही इसका बचाव है। इसलिए किसानों को कृषि-धर्म निभाने से पहले चैनलों या रेडियो पर जारी अलर्ट पर ध्यान देना चाहिए। मूसलाधार बारिश के समय विशेष सावधानी जरूरी है, क्योंकि हमारे अन्नदाताओं की जान बहुत कीमती है।
आनंद पाण्डेय, पंजियार टोली, रोसड़ा

अविश्वास बढ़ाता चीन
चीन की कथनी और करनी एक-दूसरे के विपरीत हैं। ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा लगाने वाला चीन 1962 में हमारी पीठ में छुरा घोंप चुका है। भारत के साथ ताजा घटनाक्रम में चीन ने अविश्वास और धोखेबाजी की वही पुरानी तरकीब अपनाई। इस बार बातचीत के बहाने उसने हमें धोखा दिया। जाहिर है, चीन पर अब कतई विश्वास नहीं किया जा सकता। वह इसलिए भी अविश्वास के लायक है, क्योंकि वहां लोकतंत्र नहीं है। वह भारत को अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है, इसीलिए आर्थिक, राजनीतिक एवं सैन्य, तीनों स्तरों पर वह हमें घेरना चाहता है। मगर भारत भी अब बचाव की बजाय आक्रामक मुद्रा अपनाने को तैयार है। अब हम पलटकर उसे बखूबी जवाब दे सकते हैं। कोरोना महामारी के दौरान विश्व भी यह जान चुका है कि चीन मानवता का कितना बड़ा दुश्मन है और अपने हितों के लिए वह कितना नीचे गिर सकता है। भारत को अब इसी के मुताबिक अपनी रणनीति बनानी चाहिए।
उपेंद्र कुमार राय, पटना

खाली जेब पर बोझ
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन हमारे देश में पेट्रोल-डीजल के दामों में लगातार इजाफा हो रहा है। दिल्ली जैसे महानगर में तो डीजल की कीमत पेट्रोल से ज्यादा हो गई। आखिर तेल के दाम इस कदर क्यों बढ़ रहे हैं, जबकि कच्चे तेल के दामों में गिरावट है? क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि सरकार सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए ऐसा कर रही है? फिर भी, अभी इसकी कीमतों पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आम जनता को बडे़ संकटों का सामना करना पडे़गा। उनकी मुश्किलें इसलिए भी बढ़ेंगी, क्योंकि कोरोना की वजह से उनकी जेबें पहले से ही खाली हैं। उम्मीद है, सरकार लोगों की मुश्किलों को समझेगी और जल्द ही कीमतों में कमी करेगी।
शुभम पांडेय गगन

 

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शौर्यपथ