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ध्यान विधि:स्वामी विवेकानंद को उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस कहते थे 'ध्यानसिद्ध',

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अन्य खबर /शौर्यपथ/ 

ध्यान क्या है?

वह बल, जो हमें इस सब (प्रकृति के प्रति हमारी दासता) का प्रतिरोध करने का सामर्थ्य देता है। प्रकृति हमसे कह सकती है, ‘देखो, वहां एक सुंदर वस्तु है।’ मैं नहीं देखता। अब वह कहती है, ‘यह गंध सुहावनी है, इसे सूंघो।’ मैं अपनी नाक से कहता हूं, ‘इसे मत सूंघ।’ और नाक नहीं सूंघती। ‘आंखो, देखो मत!’ प्रकृति जघन्य कार्य करती है, और कहती है, ‘अब, बदमाश, बैठ और रो! गर्त में गिर!’ मैं कहता हूं, ‘मुझे न रोना है, न गिरना है।’ मैं उछल पड़ता हूं। मुझे मुक्त होना ही चाहिए। कभी इसे करके देखो। ध्यान में, एक क्षण के लिए, तुम इस प्रकृति को बदल सकते हो। अब, यदि तुममें यह शक्ति आ जाती है, तो क्या वह स्वर्ग या मुक्ति नहीं होगी? यही ध्यान की शक्ति है। इसे कैसे प्राप्त किया जाए? दर्जनों विभिन्न रीतियों से प्रत्येक स्वभाव का अपना मार्ग है। पर सामान्य सिद्धांत यह है कि मन को पकड़ो। मन एक झील के समान है, और उसमें गिरने वाला हर पत्थर तरंगें उठाता है। ये तरंगें हमें देखने नहीं देतीं कि हम क्या हैं। झील के पानी में पूर्ण चंद्रमा का प्रतिबिम्ब पड़ता है, पर उसकी सतह इतनी आंदोलित है कि वह प्रतिबिम्ब हमें स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। इसे शांत होने दो। प्रकृति को तरंगें मत उठाने दो। शांत रहो, और तब कुछ समय बाद वह तुम्हें छोड़ देगी। तब हम जान सकेंगे कि हम क्या हैं। ईश्वर वहां पहले से है, पर मन बहुत चंचल है, सदा इन्द्रियों के पीछे दौड़ता रहता है। तुम इन्द्रियों को रोकते हो और (फिर भी) बार-बार भ्रमित होते हो। अभी, इस क्षण मैं सोचता हूं कि मैं ठीक हूं और मैं ईश्वर में ध्यान लगाऊंगा, लेकिन एक मिनट में मेरा मन लंदन पहुंच जाता है। यदि मैं उसे वहां से खींचता हूं तो वह न्यूयॉर्क चला जाता है, और मेरे द्वारा वहां अतीत में किए गए क्रियाकलापों के बारे में सोचने लगता है। इन तरंगों को ध्यान की शक्ति से रोकना है।

परम आनंद का द्वार

ध्यान के द्वार से हम उस परम आनंद तक पहुंचते हैं। प्रार्थनाएं, अनुष्ठान और पूजा के अन्य रूप ध्यान की शिशुशाला मात्र हैं। तुम प्रार्थना करते हो, तुम कुछ अर्पित करते हो।
एक सिद्धांत था- सभी बातों से मनुष्य का आध्यात्मिक बल बढ़ता है। कुछ विशेष शब्दों, पुष्पों, प्रतिमाओं, मंदिरों, ज्योतियों को घुमाने के समान अनुष्ठानों- आरतियों- का उपयोग मन को उस अभिवृत्ति में लाता है, पर वह अभिवृत्ति तो सदा मनुष्य की आत्मा में है, कहीं बाहर नहीं। लोग यह कर रहे हैं; पर वे जो अनजाने कर रहे हैं, उसे तुम जान-बूझकर करो। यही ध्यान की शक्ति है।
हमें धीरे-धीरे अपने को प्रशिक्षित करना है। यह प्रश्न एक दिन का, या वर्षों का, और हो सकता है कि, जन्मों का नहीं है। चिंता मत करो! अभ्यास जारी रहना चाहिए! इच्छापूर्वक, जान-बूझकर, अभ्यास जारी रखना चाहिए। हम उन वास्तविक सम्पदाओं को अनुभव करने लगेंगे, प्राप्त करने लगेंगे, जिन्हें हमसे कोई नहीं ले सकता- वह सम्पत्ति जिसे कोई नहीं छीन सकता; नष्ट नहीं कर सकता; वह आनंद जिसे कोई दुःख छू नहीं सकता।

 


साधना की पद्धति

ब्राह्ममुहूर्त और गोधूलि, इन दो समयों में प्रकृति अपेक्षाकृत शांत भाव धारण करती है। ये दो समय मन की स्थिरता के लिए अनुकूल हैं। इस दौरान शरीर बहुत कुछ शांत भावापन्न रहता है। इस समय साधना करने से प्रकृति हमारी काफ़ी सहायता करेगी, इसलिए इन्हीं दो समयों में साधना करना आवश्यक है।
तुममें से जिनको सुभीता हो वे साधना के लिए स्वतंत्र कमरा रख सकें तो अच्छा हो। इसे सोने के काम में न लाओ। बिना स्नान किए और शरीर-मन को शुद्ध किए इस कमरे में प्रवेश न करो। इस कमरे में सदा पुष्प और हृदय को आनंद देने वाले चित्र रखो। सुबह और शाम वहां धूप और चंदन-चूर्ण आदि जलाओ। उस कमरे में क्रोध, कलह और अपवित्र चिंतन न किया जाए। ऐसा करने पर शीघ्र वह कमरा सत्वगुण से पूर्ण हो जाएगा। यहां तक कि जब किसी प्रकार का दु:ख या संशय आए अथवा मन चंचल हो तो उस समय उस कमरे में प्रवेश करते ही मन शांत हो जाएगा।
शरीर सीधा रखकर बैठो। संसार में पवित्र चिंतन का एक स्रोत बहा दो। मन ही मन कहो- संसार में सभी सुखी हों, शांति लाभ करें, आनंद पाएं। इस प्रकार चहुंओर पवित्र चिंतन की धारा बहा दो। ऐसा जितना करोगे, उतना ही अच्छा अनुभव करने लगोगे।

 

 

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PANKAJ CHANDRAKAR