मेलबॉक्स / शौर्यपथ / भारत सरकार ने कुछ रेल मार्गों पर निजी क्षेत्रों को आमंत्रण देने का निर्णय लिया है। विपक्षी दलों ने बिना कुछ समझे सरकार के फैसले का विरोध शुरू कर दिया है। वे इस निर्णय को गरीब-विरोधी बताकर जनता को गुमराह कर रहे हैं। कांग्रेस शायद यह भूल चुकी है कि निजीकरण को बढ़ावा देने वाले प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव उसी के पार्टी के थे। लेकिन आज की जनता जागरूक है, और उसे पता है कि यह निर्णय उसके हित में है। पूर्व में हवाई जहाज से यात्रा करना बड़े लोगों का एकाधिकार था, मगर जब अधिक से अधिक निजी कंपनियों को इसमें उतारा गया, तो हवाई जहाज की यात्रा मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों की पहुंच में आ गई। इसका दूरगामी परिणाम निकला और देश के विकास में पंख लगे। आज दुनिया के कई विकसित देशों में रेलवे का निजीकरण हो चुका है। वहां की रेल सुविधाएं हमसे काफी बेहतर हैं। अब समय आ गया है कि भारत में भी ऐसा प्रयास हो और रेल यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधा मिले।
हिमांशु शेखर, टिकारी, गया
किताबों का दान
साहित्य के प्रति अनुराग होना ही चाहिए। लेखन और उसके शब्दों के भावों को सही तरीके से समझा जाए, तो रचनाकार की रचना साकार होकर मन को छू लेती है। इसके साथ ही साहित्य हमें एक-दूसरे से भी जोड़ता है। ऐसे में, जरूरी है कि साहित्यिक किताबों को रद्दी में न बेचकर वाचनालयों, स्कूलों व महाविद्यालयों जैसे शिक्षण संस्थानों या साहित्यिक संस्थाओं को भेंट किया जाए, ताकि साहित्य के उपासकों के लिए वे लाभकारी हो सकें। हम सभी को किताबें दान करनी ही चाहिए।
संजय वर्मा, मनावर, धार
यह कैसी आत्मनिर्भरता
विकास के नाम पर विश्व के सबसे बड़े रेलवे का निजीकरण किया जा रहा है। एक ओर हम आत्मनिर्भर बनने की सोच रहे हैं, तो दूसरी ओर सरकार खुद आत्मनिर्भर रेल को दूसरों पर निर्भर बना रही है। पहले आम जन इसी मुद्दे पर वोट दिया करते थे कि रेलवे का किराया सस्ता होगा, बस में सुविधाएं मिलेंगी, मगर धीरे-धीरे राजनीति हावी होती गई। आज भी, तमाम खर्चों के बावजूद भारतीय रेल फायदा कमा रही है, फिर इसके निजीकरण की आखिर क्या आवश्यकता पड़ गई? सवाल यह भी है कि तेजस और वंदे भारत जैसी ट्रेनों में कितने लोग यात्रा करने में सक्षम हैं? भले ही जापान, ब्रिटेन, कनाडा जैसे देशों में रेलवे का निजीकरण हुआ, लेकिन उनकी जीडीपी हमसे ज्यादा है और वे विकसित भी हैं। ऐसे में, राजनेताओं को कोई भी कदम उठाने से पहले यह अवश्य विचार करना चाहिए कि आखिर जनता से जब वे वोट मांगने जाएंगे, तो किस नाम और काम पर? सरकार जन सेवा के लिए चुनी जाती है, जिससे गरीब को सहारा मिले। संभव है कि आने वाले समय में रेलवे में एकाधिकार होने से सरकार और निजी कंपनी को तो फायदा हो, मगर जनता को नहीं।
अमन जायसवाल
दिल्ली विश्वविद्यालय
सावधानी से हो प्रयोग
हम लोग बिना सोचे-समझे किसी भी शब्द का बहुत अधिक प्रयोग करने लगते हैं, जिसमें एक शब्द ‘शहीद’ भी है। यह हमारी जुबान पर ऐसा चढ़ गया है कि हम अपने वीरगति प्राप्त सैनिकों को भी शहीद कहते हैं। पर शहीद का शाब्दिक अर्थ है, धर्म की राह पर चलते हुए, खुदा का काम करते हुए अपनी जान अर्पित कर देना। क्या फौजियों के लिए यह शब्द इस्तेमाल होना चाहिए, जो राष्ट्र की सेवा करते हुए अपना बलिदान देते हैं? हमारी फौज, पुलिस या अद्र्धसैनिक बल एक पेशेवर सेना है, जो देश, समाज और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अपनी जान न्योछावर करती है, इसलिए उनके लिए सही शब्द बलिदानी है।
सरिता पांडेय
पावन चिंतन धारा आश्रम