मेलबॉक्स / शौर्यपथ / अमेरिकी चुनाव में भारतीय मूल की कमला हैरिस का डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा उप-राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाना भारतीयों के लिए गौरव की बात है। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय प्रतिभा का दुनिया के सभी देशों में सम्मान होता है। इसकी वजह हमारी योग्यता तो है ही, हमारी मजबूत सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भी है। कमला हैरिस के भी पारिवारिक रिश्ते काफी गहरे हैं, जिसका उन्होंने बार-बार प्रदर्शन भी किया है। अपने भाषणों में तो वह मां को हमेशा याद करती रहती हैं। यही कारण है कि राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बिडेन और पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा उनकी खुलकर तारीफ करते हैं। हैरिस की यही खासियत संभवत: उन्हें उप-राष्ट्रपति पद तक पहुंचा सकती है।
हरिकृष्ण बड़ोदिया
रतलाम, मध्य प्रदेश
बेहतर होती सड़कें
यह अच्छी खबर है कि केंद्र सरकार ने देश के ग्रामीण इलाकों में डेढ़ लाख किलोमीटर लंबी नई सड़कें 130 लाख करोड़ रुपये के निवेश से बनाया है। इसकी जरूरत भी थी, क्योंकि सड़कें देश की प्रगति और विकास का प्रमुख आधार हैं। जब भारत गांवों में बसता है, तो उनके सुधार और विकास के लिए सड़कों का निर्माण बहुत जरूरी है। तभी देश सही से आगे भी बढ़ सकता है। अच्छी सड़कों, पुलों, चौराहों, फुटपाथों आदि के अभाव के कारण ही आज देश के महानगर जाम और हादसों से जूझते रहते हैं। इन सबसे प्रतिवर्ष न जाने कितनी पूंजी और ऊर्जा की बर्बादी होती है। सरकार इस समस्या के समाधान को लेकर अब गंभीर हुई है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।
वेद मामूरपुर, नरेला
नेपोटिज्म के खिलाफ
सुशांत सिंह राजपूत की मौत से देश भर में जिस तरह से नेपोटिज्म के खिलाफ एक उबाल पैदा हुआ है, वह शायद ही कभी दिखा है। साफ है,जनता इस मामले को जल्द से जल्द सुलझता हुआ देखना चाहती है। जिस तरह से सीबीआई, आईडी जैसी एजेंसियां सक्रिय हुई हैं, उससे यह उम्मीद भी है कि जल्द ही इस मौत पर खुलासा होगा और दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। मगर तब तक लोगों का गुस्सा बना हुआ है। ‘सड़क-2’ फिल्म का ट्रेलर उनके निशाने पर है, जिसको नापसंद करके लोगों ने महेश भट्ट को साफ संदेश दे दिया है। जनता के न्यायालय में देर नहीं होती। नेपोटिज्म को बढ़ावा देने वाले कलाकारों और फिल्मकारों को इससे सबक मिला होगा। ऐसे तमाम कलाकारों और फिल्मकारों के बहिष्कार से ही सुशांत सिंह राजपूत को न्याय मिल सकेगा।
कृष्ण गोपालन कुमार
कोंच डीह, गया
वायरस से लड़ती राजनीति
जहां हमारा देश कोरोना से ग्रस्त है, वहीं हमारे देश की राजनीति तीन खतरनाक वायरसों से जूझ रही है। ये वायरस हैं- परिवारवाद, सत्ता के लिए मोल-भाव व वीवीआईपी संस्कृति। इन सबके अंत का समय आ गया है। आज नहीं, तो कल कोरोना की वैक्सीन वैज्ञानिक बना ही लेंगे, पर राजनीति को संक्रमित कर रहे इन वायरसों का समाधान जनता को ही निकालना होगा। इस विषय पर सकारात्मक व संवेदनशील संवाद की आवश्यकता है। मगर दुख की बात यह है कि जमात से चला विमर्श जाति, परिवार पर आकर रुक जाता है। इसी तरह, राजनीति को पेशा, यानी कारोबार नहीं, बल्कि त्यागपूर्ण जीवन के रूप में देखना चाहिए। एक समय था, जब लाल बहादुर शास्त्री, कर्पूरी ठाकुर ,दीन दयाल उपाध्याय जैसे लोगों के लिए सादगी ही शृंगार थी। मगर आज यह नहीं दिखता, जबकि समाज के अंतिम छोर पर खडे़ व्यक्ति की आंखों की भाषा समझने के लिए जिस संवेदना की आवश्यकता होती है, उसकी पूर्ति तभी संभव है, जब हमारे नेतागण सादगीपूर्ण जीवन बिताएं। पर क्या ऐसा हो सकेगा?
सत्य प्रकाश, लखीमपुर खीरी