नजरिया / शौर्यपथ / शनिवार को जब देश स्वतंत्रता दिवस के जश्न में डूबा था, तमिलनाडु के वरिष्ठ मंत्री मुख्यमंत्री ई पलानीसामी और उप-मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम के बीच सुलह-समझौते कराने में व्यस्त थे। देर शाम मुख्यमंत्री व उप-मुख्यमंत्री ने एक साझा बयान जारी करते हुए पार्टी के नेताओं को सख्त निर्देश दिया कि वे मीडिया में पार्टी या नेतृत्व पर किसी तरह की टीका-टिप्पणी से बचें। यह बयान, दरअसल दोनों नेताओं के बीच सरकार व पार्टी पर नियंत्रण बनाने के सवाल पर चल रहे परोक्ष युद्ध का नतीजा है, जिसका दायरा बढ़कर समर्थकों तक पहुंच गया है। इन सबकी शुरुआत एक मंत्री के उस बयान से हुई, जिसमें जोर दिया गया कि अन्नाद्रमुक पार्टी अपने नेता ई पलानीसामी को बतौर चेहरा पेश करते हुए विधानसभा चुनाव लड़ेगी। जवाब में एक अन्य मंत्री ने कहा कि चुनाव के बाद विधायक अपना नेता खुद चुनेंगे। स्वतंत्रता दिवस के दिन हालात बिगड़ गए, जब पनीरसेल्वम के समर्थकों ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की मांग वाले पोस्टर उनके गृहनगर में चिपकाए और पलानीसामी के समर्थकों ने उसे फाड़ दिया। नतीजतन, चेन्नई में पनीरसेल्वम के घर पर शांति बैठक हुई, जिसमें पलानीसामी के 10 मंत्रियों ने उप-मुख्यमंत्री के साथ गंभीर विमर्श किया। इसके बाद प्रस्ताव मुख्यमंत्री को भेजे गए थे, जिसका नतीजा यह संयुक्त बयान रहा। हालांकि, इसमें असल मुद्दा गौण है और उस पर चर्चा की बजाय पार्टी के नेताओं के लिए सलाह जारी की गई है।
पनीरसेल्वम दो बार कार्यवाहक मुख्यमंत्री बन चुके हैं, जब जयललिता को भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाना पड़ा था। दोनों बार उन्होंने वफादार की तरह अपने कर्तव्यों का पालन किया। अम्मा की मौत के बाद उनकी सहयोगी वी के शशिकला ने उन्हें तीसरी बार यह दायित्व सौंपा। संदेश साफ था कि पिछली दो पारियों की वजह से उनको यह पद सौंपा गया है, इसलिए उन्हें अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर नहीं करनी चाहिए। 31 दिसंबर, 2016 को शशिकला ने औपचारिक रूप से अन्नाद्रमुक की बागडोर संभाल ली और 5 फरवरी, 2017 को उन्हें विधायक दल का नेता भी चुन लिया गया। नतीजतन, अगले दिन ही पनीरसेल्वम ने पद छोड़ दिया, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें पद पर बने रहने का कहा, क्योंकि आय से अधिक संपत्ति के मामले में वह एक फैसले का इंतजार कर रहे थे, जो शशिकला के खिलाफ आया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। लिहाजा शशिकला की नई पसंद पलानीसामी बने।
पलानीसामी और पनीरसेल्वम के बीच गुटीय लड़ाई रोकने के लिए केंद्र ने एक सौदा किया, क्योंकि एकजुट अन्नाद्रमुक हर किसी के हित में था। शायद इसी सौदे के तहत पलानीसामी के पद पर बने रहने की सहमति बनी और पनीरसेल्वम उप-मुख्यमंत्री बनाए गए। पनीरसेल्वम को पार्टी संयोजक बनाकर अन्नाद्रमुक की बागडोर भी उन्हीं के हाथों में सौंपी गई। पर यह पूर्ण व्यवस्था नहीं थी, पलानीसामी को सह-संयोजक बनाया गया व महासचिव का पद खाली रखा गया। भाजपा की मंशा शायद यह थी कि जब तक राज्य में उसका समर्थन-आधार नहीं बन जाता, तब तक सूबे की मित्र-सरकार की मदद से अपनी पकड़ मजबूत बनाकर रखी जाए। अगर उसकी यह योजना थी, तो यह कारगर साबित नहीं हुई है, क्योंकि पलानीसामी धीरे-धीरे मजबूत हुए हैं।
बहरहाल, मुख्यमंत्री ने पिछले पखवाड़े में नई शिक्षा नीति की मुखालफत करके अपने प्रशंसकों व आलोचकों को चौंका दिया। गणेश चतुर्थी के जुलूस पर पाबंदी लगााने से भी उनके आलोचक मुखर हुए हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने तो यह तक दावा किया है कि उनकी पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में एजेंडा तय करेगी। आमतौर पर तमिलनाडु में राष्ट्रीय पार्टियां जूनियर सहयोगी रही हैं, इसलिए उनका यह बयान चौंकाने वाला है, क्योंकि सूबे में भाजपा का आधार सीमित है। चूंकि सितंबर के पहले हफ्ते में शशिकला की रिहाई हो सकती है, इसलिए माना जा रहा है कि उनके सक्रिय होने से पहले ही पलानीसामी और पनीरसेल्वम अपनी हैसियत मजबूत बनाना चाहते हैं। अब जबकि विधानसभा चुनाव आठ महीने दूर है, दोनों नेता अपने-अपने तरीके से नैरेटिव गढ़ना चाहते हैं। पैर जमाने के लिए भाजपा की आक्रामक नीति ने भी यहां के चुनावी माहौल को दिलचस्प बना दिया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार