जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ /देश को आजादी मिले तीन साल बीते थे। केरल के एक संपन्न परिवार में बेटा पैदा हुआ। उसके दादा और पिता बहुत खुश थे कि खानदान को वारिस मिल गया। लेकिन जो मादियथ नाम के इस बालक को विधाता ने अलग ही मिजाज के साथ भेजा था। जो की परवरिश में किसी अभाव के लिए कोई जगह न थी।
जो अक्सर दादा या पिता के साथ रबड़ की अपनी खेती देखने जाया करते थे। लेकिन वहां पहुंचकर उन्हें कुछ अलग सा महसूस होता। मासूम मन यह समझ ही नहीं पाता कि हमारे खेतों-बागों में काम करने वाले लोग आखिर हमारी तरह क्यों नहीं खाना खाते? उन्हें क्यों चूहों के बिलों को खोदकर अनाज निकालना पड़ता है? जो जब थोड़े बड़े हुए, तो एक और कड़वी सामाजिक सच्चाई से उनका साबका पड़़ा। दरअसल, एक दिन घर वालों ने तथाकथित निम्न जाति के बच्चों के साथ उन्हें खुले में खेलने से सख्ती से मना किया।
जो को यह पाबंदी बिल्कुल पसंद नहीं आई और शायद उसी वक्त इन विद्रूपों से मोर्चा लेने का ख्याल उनकी चेतना का हिस्सा भी बन गया। कहते हैं, साहसी व्यक्ति पहला प्रयोग अपने ऊपर करता है। जो की उम्र तो उस समय महज 12 साल थी। पर साहसी होने की कसौटी पर खुद को उन्होंने उसी उम्र में आजमाया और अपने ही मजदूरों से कहा कि सब एक साथ मिलकर बेहतर मजदूरी और दूसरी सुविधाओं की मांग करो, तभी पिताजी मानेंगे।
जाहिर है, यह बागी तेवर पिता को नागवार गुजरा। बेटे की बगावती हरकत से चिंतित पिता ने बगैर वक्त गंवाए जो को गांव से दूर एक हॉस्टल में डाल दिया। मगर जो के भीतर तो हकगोई की लौ जल चुकी थी। स्कूल में भी उन्होंने साथी छात्रों को अपने अधिकारों के लिए संगठित होने को प्रेरित किया। अब तक पिता को एहसास हो गया था कि उनका बेटा समाज के लिए ही शायद इस धरती पर आया है। उन्होंने बेटे पर कभी कोई दबाव नहीं बनाया, बल्कि उसकी कोशिशों में सहायक बन गए।
जो मादियथ उन दिनों लोयला कॉलेज, चेन्नई के छात्र संघ के अध्यक्ष हुआ करते थे। वह गांधीजी के विचारों से काफी प्रभावित थे। जिस तरह बापू ने जनरल क्लास से रेलयात्रा के जरिए असली भारत को जाना-समझा था, उससे प्रेरित होकर जो भी देश के गरीबों और गरीबी को जानने के लिए साइकिल से भारत भ्रमण पर निकल पड़े। उन्हीं दिनों में उन्होंने यंग स्टूडेंट्स मूवमेंट फॉर डेवलपमेंट (वाईएसएमडी) नामक एक संगठन बनाया।
बात 1971 की है। देश बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में जुटा हुआ था। बड़ी तादाद में शरणार्थी पूर्वी बंगाल से भागकर पश्चिम बंगाल आ गए थे। जो अपने संगठन के 400 साथियों के साथ कोलकाता पहुंचे, ताकि राहत शिविरों के प्रबंधन में प्रशासन का सहयोग कर सकें। जो बताते हैं, ‘कोलकाता के राहत-शिविरों में हैजा फैल गया था। कई लोग उसके शिकार हो गए। मगर कोई उनकी लाश को हाथ लगाने को तैयार न था, तब मैंने और मेरे साथियों ने फैसला किया कि इनके अंतिम संस्कार पूरी गरिमा के साथ होने चाहिए। हम स्वयं ट्रकों से उन्हें ले जाते और उनके अंतिम कर्म करते थे।’ जो और उनके साथियों की इस सेवा भावना से स्थानीय प्रशासन के लोग काफी प्रभावित थे।
दुर्योग से, उसी वर्ष अक्तूबर में ओडिशा में भयानक चक्रवाती तूफान आया। दस हजार से भी ज्यादा लोग मारे गए, जबकि कई लाख लोगों का घर-बार उजड़ गया था। जो अपने 40 साथियों के साथ कोलकाता से ओडिशा पहुंचे। राहत-कार्य के शुरुआती चरणों के पूरे होने पर वाईएसएमडी के युवा जब केरल लौटने लगे, तब जो और कुछ अन्य कार्यकर्ताओं ने ओडिशा में रुककर ही काम करने का फैसला किया।
वहां के आदिवासी इलाकों की गरीबी और भुखमरी ने जो को अंदर तक हिला दिया था। स्थानीय प्रशासन के अनुरोध पर वह अपने कुछ साथियों के साथ गंजाम जिला पहुंचे और 1979 में उन्होंने वहां ‘ग्राम विकास’ नामक संस्था की नींव रखी। जिला प्रशासन ने जो से अनुरोध किया था कि वह आदिवासियों को पशुपालन और दुग्ध उत्पादन के लिए प्रशिक्षित करें, ताकि वे आधुनिक जीवन से परिचित हों और समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें। जब जो के साथियों ने आदिवासियों के घर-घर पहुंच उनसे बात की, तो पता चला कि वे लोग मवेशी से दूध निकालने को भारी पाप मानते हैं। वन्य संस्कृति में उन पर सिर्फ उनके छौनों का हक माना जाता है।
चुनौती बड़ी थी, मगर जो की टीम ने दूसरे तरीकों से उन्हें प्रेरित किया, स्थानीय दबंगों द्वारा हड़पी गई उनकी जमीनें उन्हें दिलवाईं, साफ पेयजल के लिए मुहिम चलाई, पेड़ काटने की बजाय बायोगैस के इस्तेमाल के लिए उन्हें राजी किया। बच्चों के लिए स्कूल खोले गए। जो के प्रयासों ने ओडिशा में लगभग 20 लाख लोगों की जिंदगी में बेहतरी की रोशनी फैलाई है। कई नोबेल विजेता इनके कामों की सराहना कर चुके हैं। कौन कहता है कि मसीहा राजधानियों में बसते हैं, सच्चे मसीहा तो वनवासियों के पास हैं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह जो मादियथ गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता