संपादकीय |( शरद पंसारी )
व्यापार केवल आयात–निर्यात का खेल नहीं होता, वह राष्ट्रों की रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक हैसियत और भविष्य की दिशा तय करता है।
3 फरवरी 2026 को अमेरिका और भारत के बीच हुआ नया व्यापार समझौता इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब 2025 में लगाए गए 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ ने भारतीय निर्यात की रीढ़ तोड़ दी थी। उस पृष्ठभूमि में 18 प्रतिशत पर पहुँचना निश्चित रूप से राहत है—लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भारत की जीत है, या हालात के आगे झुककर निकाला गया रास्ता?
राहत को जीत कह देना जल्दबाज़ी होगी
इस समझौते के बाद अमेरिकी बाज़ार में भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत का दंडात्मक शुल्क पूरी तरह हट गया है और पारस्परिक टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत रह गया है।
कपड़ा, रत्न-आभूषण, फार्मा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए यह जीवनदान से कम नहीं।
लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि
2024 तक यही टैरिफ मात्र 3 प्रतिशत के आसपास था।
इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत आज भी उस स्थिति से नीचे खड़ा है, जहाँ वह दो साल पहले था।
व्यापार युद्ध से बाहर निकलना—यही असली उपलब्धि
संपादकीय दृष्टि से इस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि टैरिफ 18 प्रतिशत हुआ,
बल्कि यह है कि भारत 50 प्रतिशत के दंडात्मक व्यापार युद्ध से बाहर निकल पाया।
2025 में अमेरिकी प्रतिबंधों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अब व्यापार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार बन चुका है।
ऐसे माहौल में भारत का समझौते की मेज़ पर लौटना एक व्यावहारिक निर्णय था।
जहाँ भारत मजबूत हुआ
यह समझौता भारत को एक ऐसे लाभकारी मोड़ पर ले आया है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती—
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चीन पर आज भी 30–35% या उससे अधिक अमेरिकी टैरिफ लागू है
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वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों पर लगभग 20% शुल्क है
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जबकि भारत अब 18% पर है
यह स्थिति भारतीय निर्यात को अमेरिकी बाज़ार में स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देती है।
यह बढ़त 2024 में भारत के पास नहीं थी।
लेकिन कीमत भी चुकानी पड़ी है
हर समझौते की एक कीमत होती है—और यह डील भी अपवाद नहीं।
भारत ने:
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रूसी तेल की खरीद धीरे-धीरे बंद करने
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अमेरिकी LNG और तकनीक के आयात बढ़ाने
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तथा लगभग 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता ली है
यह सब भारत की ऊर्जा लागत और व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ा सकता है।
सस्ती ऊर्जा छोड़कर महँगे विकल्प अपनाना, अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है।
रणनीतिक प्रश्न यहीं से शुरू होता है
यह समझौता भारत की उस रणनीतिक स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े करता है,
जिस पर वह लंबे समय से गर्व करता आया है।
क्या वैश्विक दबावों के सामने भारत को बार-बार आर्थिक रियायतें देनी पड़ेंगी?
और क्या भविष्य में व्यापारिक फैसले विदेश नीति के दबाव में लिए जाते रहेंगे?
इन सवालों के उत्तर आसान नहीं हैं।
निष्कर्ष: न पराजय, न पूर्ण विजय—एक परिपक्व समझौता
यह कहना गलत होगा कि भारत इस समझौते में हार गया।
यह कहना भी सच नहीं होगा कि भारत ने सब कुछ जीत लिया।
सच्चाई यह है कि—
भारत ने टकराव के दौर से निकलकर समझौते का रास्ता चुना है।
यह रास्ता महँगा है, समझौतों से भरा है,
लेकिन वैश्विक व्यापार की वर्तमान वास्तविकताओं में
शायद यही सबसे व्यावहारिक विकल्प भी था।
अब चुनौती यह है कि भारत इस मिली हुई प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को
निर्यात विस्तार, घरेलू उद्योग संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा में बदल पाए—
वरना यह समझौता केवल राहत बनकर रह जाएगा, उपलब्धि नहीं।