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व्यापार केवल आयात–निर्यात का खेल नहीं होता, वह राष्ट्रों की रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक हैसियत और भविष्य की दिशा तय करता है।
3 फरवरी 2026 को अमेरिका और भारत के बीच हुआ नया व्यापार समझौता इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब 2025 में लगाए गए 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ ने भारतीय निर्यात की रीढ़ तोड़ दी थी। उस पृष्ठभूमि में 18 प्रतिशत पर पहुँचना निश्चित रूप से राहत है—लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भारत की जीत है, या हालात के आगे झुककर निकाला गया रास्ता?
इस समझौते के बाद अमेरिकी बाज़ार में भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत का दंडात्मक शुल्क पूरी तरह हट गया है और पारस्परिक टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत रह गया है।
कपड़ा, रत्न-आभूषण, फार्मा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए यह जीवनदान से कम नहीं।
लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि
2024 तक यही टैरिफ मात्र 3 प्रतिशत के आसपास था।
इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत आज भी उस स्थिति से नीचे खड़ा है, जहाँ वह दो साल पहले था।
संपादकीय दृष्टि से इस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि टैरिफ 18 प्रतिशत हुआ,
बल्कि यह है कि भारत 50 प्रतिशत के दंडात्मक व्यापार युद्ध से बाहर निकल पाया।
2025 में अमेरिकी प्रतिबंधों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अब व्यापार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार बन चुका है।
ऐसे माहौल में भारत का समझौते की मेज़ पर लौटना एक व्यावहारिक निर्णय था।
यह समझौता भारत को एक ऐसे लाभकारी मोड़ पर ले आया है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती—
चीन पर आज भी 30–35% या उससे अधिक अमेरिकी टैरिफ लागू है
वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों पर लगभग 20% शुल्क है
जबकि भारत अब 18% पर है
यह स्थिति भारतीय निर्यात को अमेरिकी बाज़ार में स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देती है।
यह बढ़त 2024 में भारत के पास नहीं थी।
हर समझौते की एक कीमत होती है—और यह डील भी अपवाद नहीं।
भारत ने:
रूसी तेल की खरीद धीरे-धीरे बंद करने
अमेरिकी LNG और तकनीक के आयात बढ़ाने
तथा लगभग 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता ली है
यह सब भारत की ऊर्जा लागत और व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ा सकता है।
सस्ती ऊर्जा छोड़कर महँगे विकल्प अपनाना, अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है।
यह समझौता भारत की उस रणनीतिक स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े करता है,
जिस पर वह लंबे समय से गर्व करता आया है।
क्या वैश्विक दबावों के सामने भारत को बार-बार आर्थिक रियायतें देनी पड़ेंगी?
और क्या भविष्य में व्यापारिक फैसले विदेश नीति के दबाव में लिए जाते रहेंगे?
इन सवालों के उत्तर आसान नहीं हैं।
यह कहना गलत होगा कि भारत इस समझौते में हार गया।
यह कहना भी सच नहीं होगा कि भारत ने सब कुछ जीत लिया।
सच्चाई यह है कि—
भारत ने टकराव के दौर से निकलकर समझौते का रास्ता चुना है।
यह रास्ता महँगा है, समझौतों से भरा है,
लेकिन वैश्विक व्यापार की वर्तमान वास्तविकताओं में
शायद यही सबसे व्यावहारिक विकल्प भी था।
अब चुनौती यह है कि भारत इस मिली हुई प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को
निर्यात विस्तार, घरेलू उद्योग संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा में बदल पाए—
वरना यह समझौता केवल राहत बनकर रह जाएगा, उपलब्धि नहीं।
lwriter - श्री पंकज जोशी
कुशल शासन की दिशा में भारत की यात्रा अक्सर एक विशाल संघीय ढांचे के तहत कार्यान्वयन से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों को रेखांकित करती है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 2015 में स्थापित ‘प्रगति’ [सक्रिय शासन और समयबद्ध कार्यान्वयन (प्रो-एक्टिव गवर्नेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन)] नामक पहल, नौकरशाही की पेचीदगियों को दूर करने के एक शक्तिशाली तंत्र के रूप में कार्य करती है। एक ओर जहां यह विभिन्न राष्ट्रीय परियोजनाओं को गति प्रदान करती है, वहीं इसका प्रभाव शायद राज्य स्तर पर सबसे अधिक स्पष्ट होता है। आर्थिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण विशिष्ट क्षेत्रीय परियोजनाओं की सटीक निगरानी राज्य स्तर पर की जाती है। गुजरात में, ‘प्रगति’ के तहत की गई समीक्षाओं ने बुनियादी ढांचे, ऊर्जा तथा सामाजिक कल्याण से जुड़ी प्रमुख परियोजनाओं में आने वाली अड़चनों को व्यवस्थित रूप से दूर किया है और सहकारी संघवाद के एक मजबूत मॉडल को मूर्त रूप दिया है।
‘प्रगति’ ने न सिर्फ समीक्षा के एक मंच, बल्कि एक पूर्वानुमानित शासन के रूप में भी कार्य किया है। महीने की शुरुआत में अग्रिम रूप से एजेंडा का वितरण राज्य के संबंधित विभागों, जिला प्रशासन और कार्यान्वयन एजेंसियों की केन्द्रित भागीदारी को बढ़ावा देने में सहायक रहा। सक्रिय अनुवर्ती कार्रवाई के परिणामस्वरूप, ‘प्रगति’ की निर्धारित बैठकों से पहले ही कई समस्याओं का निराकरण हो गया। लिहाजा, ऐसे एजेंडा मदों को अंतिम समीक्षा से हटा दिया गया। यह उच्चस्तरीय हस्तक्षेप से पहले ही राज्य स्तर पर उनके समाधान को दर्शाता है।
राज्य-आधारित तेजी हेतु एक डिजिटल समन्वय
‘प्रगति’ की सफलता का मूल राज्य और केन्द्रीय प्रशासन के शीर्ष स्तरों को जवाबदेही-आधारित एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की इसकी क्षमता में निहित है। हर महीने, यह इंटरफ़ेस उन परियोजनाओं की विस्तृत समीक्षा को संभव बनाता है जो अंतर-विभागीय मतभेदों या भूमि अधिग्रहण संबंधी अड़चनों की वजह से रुक सकती हैं।
रणनीतिक विकास हेतु विभागीय सीमाओं को तोड़ना: दिल्ली मुंबई औद्योगिक गलियारा (डीएमआईसी)
डीएमआईसी को सीधे प्रधानमंत्री की समीक्षा के अधीन रखकर, ‘प्रगति’ ने धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण, विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालयों और निजी हितधारकों से जुड़ी समस्याओं पर वास्तविक समय में चर्चा किया जाना सुनिश्चित किया। इस प्रक्रिया ने निर्णय लेने की कवायद को गति दी, नौकरशाही में व्याप्त लालफीताशाही को कम किया और सभी संबंधित पक्षों को स्पष्ट व समयबद्ध दिशा-निर्देश प्रदान किए, जिससे भारत के औद्योगिक भविष्य की बुनियाद मानी जाने वाली इस परियोजना को गति मिली।
‘प्रगति’ के तहत होने वाली समीक्षाओं ने धोलेरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और अहमदाबाद-धोलेरा एक्सप्रेसवे के बुनियादी ढांचे के समयबद्ध विकास को सुनिश्चित किया है। यह 109 किलोमीटर लंबी एक महत्वपूर्ण ग्रीनफील्ड परियोजना है, जिसे अहमदाबाद को धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र (एसआईआर) से जोड़ने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया है। सेमीकंडक्टर निर्माण संयंत्र हेतु कुल 91,000 करोड़ रुपये के मुख्य परियोजना निवेश के साथ, यह इलाका भारत का सेमीकंडक्टर हब बनने के लिए तैयार है और यहां देश के पहले स्वदेशी चिप्स का उत्पादन होगा। इस राज्य की सीमाओं के भीतर संचालित होने वाली ऐसी उच्च-मूल्य वाली केन्द्रीय परियोजनाएं उस ‘प्रगति’ तंत्र का हिस्सा बनने की आदर्श हकदार हैं, जो राज्य के कार्यान्वयन और राष्ट्रीय दृष्टिकोण के बीच तालमेल सुनिश्चित करती हैं।
गुजरात की हरित ऊर्जा क्रांति को गति
गुजरात नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी है और ‘प्रगति’ इसकी विशाल क्षमता को मूर्त रूप देने में अहम भूमिका निभा रही है। बड़े पैमाने की विविध सौर एवं पवन परियोजनाएं इस लक्ष्य को रेखांकित करती हैं। कुल 1200 मेगावाट क्षमता वाली खावड़ा सौर पीवी परियोजना (6284 करोड़ रुपये) और 1255 मेगावाट क्षमता वाली खावड़ा सौर पीवी परियोजना (7180 करोड़ रुपये) इस पहल की प्रमुख घटक हैं। कुल 300 मेगावाट क्षमता वाली भुज सौर पीवी परियोजना (1443 करोड़ रुपये) और खावड़ा नवीकरणीय ऊर्जा पार्क से अतिरिक्त 7 गीगावाट बिजली की निकासी से संबंधित पारेषण प्रणाली (4231 करोड़ रुपये) की भी समीक्षा की गई। इस समीक्षा में ऊर्जा, राजस्व और वन एवं पर्यावरण विभागों ने भाग लिया।
इस प्लेटफॉर्म की व्यवस्थित निगरानी प्रणाली राज्य के विभिन्न विभागों और केन्द्रीय संस्थाओं के बीच निर्बाध समन्वय सुनिश्चित करती है, जोकि भूमि और पर्यावरण संबंधी जटिल मंजूरियों की जरूरत वाली परियोजनाओं के लिए बेहद अहम है।
सरदार सरोवर कमान क्षेत्र के विकास को सुव्यवस्थित करना
सरदार सरोवर परियोजना (एसएसपी) और व्यापक राष्ट्रीय सिंचाई परियोजनाओं के संदर्भ में, माननीय प्रधानमंत्री द्वारा ‘प्रगति’ के तहत की गई समीक्षा पारंपरिक बाढ़ सिंचाई से हटकर सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों की दिशा में बदलाव में निर्णायक कारक साबित हुई है। ‘प्रगति’ के नीति निर्देशों के अनुसार, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का परियोजना अनुमोदन और वित्तपोषण अनिवार्य कर दिया गया। साथ ही, सरदार सरोवर परियोजना, जिसे जल संकट को दूर करने में इसकी भूमिका के कारण अक्सर गुजरात की जीवनरेखा कहा जाता है, ने ‘प्रगति’ के तहत होने वाली समीक्षाओं के परिणामस्वरूप भूमिगत पाइपलाइन (यूजीपीएल) प्रणाली को अपनाया। पारंपरिक खुली नहरों से हटकर हुए इस बदलाव का उद्देश्य जल संरक्षण, भूमि विखंडन को कम करने और निर्माण में लगने वाले समय को घटाकर दक्षता एवं जलापूर्ति को बेहतर बनाना था।
बुनियादी ढांचे से परे: सामाजिक दायित्व
‘प्रगति’ का दायरा भौतिक बुनियादी ढांचे से कहीं आगे जाता है। यह पहल समाज कल्याण की प्रमुख योजनाओं के कार्यान्वयन की निगरानी करने और अंतिम छोर तक उनकी सुलभता सुनिश्चित करने में भी समान रूप से प्रभावी है।
* प्रधानमंत्री-आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (पीएम-अभीम): स्वास्थ्य संबंधी इस महत्वपूर्ण पहल की समयबद्ध और प्रभावी कवरेज सुनिश्चित करने हेतु निगरानी की गई। नागरिकों को मिलने वाले प्रमुख लाभ हैं: उन्नत आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (एएएम) के जरिए स्वास्थ्य सेवा तक बेहतर पहुंच; देखभाल की बेहतर गुणवत्ता; वित्तीय बोझ में कमी; आईटी-आधारित रोग निगरानी प्रणाली तथा प्रयोगशालाओं के नेटवर्क के विकास द्वारा महामारी से निपटने की बेहतर तैयारी एवं प्रतिक्रिया; व्यापक प्राथमिक देखभाल; और डिजिटल स्वास्थ्य एकीकरण।
* पीएम स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया (पीएमश्री): स्कूली अवसंरचना के आधुनिकीकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण इस योजना की प्रगति की समीक्षा ‘प्रगति’ के जरिए की जाती है। परिणामस्वरूप, गुजरात के 448 सरकारी स्कूलों में स्कूल अवसंरचना का तेजी से उन्नयन हो रहा है।
* “लखपति दीदी” योजना: ग्रामीण विकास के जरिए महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से शुरू की गई इस महत्वपूर्ण पहल की निगरानी भी ‘प्रगति’ प्लेटफॉर्म पर की जाती है। गुजरात में 6 लाख से अधिक लखपति दीदियों को कौशल विकास, वित्तीय समावेशन, डिजिटल साक्षरता और बाजार के संपर्क जैसे विभिन्न उपायों के जरिए स्थायी आय प्राप्त हो रही है।
शीर्ष स्तर पर इन योजनाओं की समीक्षा करके, ‘प्रगति’ जवाबदेही तय करती है और गुजरात के लक्षित लाभार्थियों को समय पर सरकारी सेवाएं सुलभ होना सुनिश्चित करती है।
गुजरात का सशक्तिकरण: प्रगति के जरिए भारत सरकार का परिवर्तनकारी समर्थन
राष्ट्रीय स्तर पर प्रगति की सफलता के बाद, गुजरात सरकार ने शिकायतों एवं परियोजनाओं के प्रबंधन हेतु एक उन्नत प्रणाली के रूप में ‘स्वागत 2.0’ की शुरुआत की। यह ऑटो एस्केलेशन मैट्रिक्स से लैस है, जो महत्वपूर्ण बाधाओं से संबंधित ‘प्रगति’ की व्यवस्थित एस्केलेशन प्रणाली पर आधारित है। ‘प्रगति’ की परियोजना निगरानी संबंधी खूबियों से प्रेरित, संशोधित ‘स्वागत’ में अब समर्पित निगरानी और प्रदर्शन डैशबोर्ड शामिल हैं। ये डैशबोर्ड मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) को अधिकारियों की व्यक्तिगत कार्यकुशलता का आकलन करने और उन जिलों की पहचान करने में सक्षम बनाते हैं जहां बड़ी संख्या में अनसुलझी शिकायतें हैं। परियोजना संबंधी समीक्षाओं के जरिए प्रणालीगत सुधार लाने की ‘प्रगति’ की क्षमता की तरह, नई ‘स्वागत’ प्रणाली डैशबोर्ड डेटा का उपयोग करके बार-बार उभरने वाली उन समस्याओं की पहचान करती है जिनके लिए सिर्फ शिकायत समाधान के बजाय नीति-स्तर पर बदलाव की जरूरत होती है। ‘स्वागत 2.0’ के जरिए, गुजरात के मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से मासिक रूप से जटिल मामलों - जैसे आवास परियोजनाएं और बुनियादी ढांचे में देरी - की समीक्षा करते हैं और समाधान के लिए सख्त व समयबद्ध निर्देश जारी करते हैं, जो ‘प्रगति’ के “समयबद्ध कार्यान्वयन” के मूल उद्देश्य का अभिन्न अंग है।
गुजरात की उल्लेखनीय विकास यात्रा माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रदान किए गए दूरदर्शी समर्थन और सहयोगात्मक नेतृत्व का उत्कृष्ट प्रमाण है। ‘प्रगति’ नामक एक अग्रणी कदम के जरिए, केन्द्र सरकार ने इस राज्य को अमूल्य सहयोग प्रदान किया है। इससे इस राज्य को अपनी पूरी क्षमता का दोहन करने हेतु आवश्यक तकनीकी अवसंरचना और रणनीतिक मार्गदर्शन हासिल हुआ है।
(लेखक आईएएस (सेवानिवृत्त), जीईआरसी के अध्यक्ष/गुजरात के पूर्व मुख्य सचिव हैं)
✍️ शौर्यपथ लेख:
दुर्ग की धरती पर आज एक ऐसी घटना घटी, जिसने यह साबित कर दिया कि अगर सत्ता में बैठा व्यक्ति संवेदनशील हो, तो वह सिर्फ आदेश नहीं देता, बल्कि किसी का भविष्य भी संवार देता है।
महर्षि दयानंद स्कूल का 8 वर्षीय छात्र ओजश चक्रधारी… उम्र इतनी कम कि सपनों की दुनिया अभी रंग भरना सीख ही रही थी। लेकिन अचानक फीस न भर पाने की मजबूरी ने उसके सपनों पर ताला जड़ दिया। स्कूल से बाहर कर दिए जाने की टीस जब एक मासूम दिल तक पहुँची, तो वह रोते हुए अपनी माँ विजयी लक्ष्मी से बस इतना कह सका—
“माँ, मैं पढ़ना चाहता हूँ…”
माँ के लिए इससे बड़ा दर्द और क्या हो सकता है? बेटे के भविष्य की चिंता लिए वह सेवा सदन मंत्री गजेंद्र यादव के पास पहुँचीं। यह मुलाकात किसी औपचारिकता की नहीं थी, यह एक माँ की आख़िरी उम्मीद थी।
मंत्री गजेंद्र यादव ने न सिर्फ पूरे मामले को ध्यान से सुना, बल्कि उसी क्षण यह साबित कर दिया कि संवेदनशीलता आज भी राजनीति में ज़िंदा है। उन्होंने तुरंत स्कूल प्रबंधन से फोन पर बात की और दो टूक शब्दों में कहा—
“बच्चे की फीस मैं भरूंगा, लेकिन उसकी पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए।”
यह सिर्फ फीस भरने का निर्णय नहीं था, यह एक बच्चे के आत्मविश्वास को वापस देने का संकल्प था। वह एक वाक्य—
“मैं हूँ ना, चिंता क्यों करते हो”
ओजश और उसके परिवार के लिए किसी वरदान से कम नहीं था।
जब यही शब्द प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री के मुख से निकलते हैं, तो वे सिर्फ आश्वासन नहीं रहते, बल्कि पीड़ित व्यक्ति के भीतर ऐसा आत्मबल भर देते हैं, जो जीवन की दिशा बदल देता है। एक पल में डर, निराशा और असहायता—आशा और विश्वास में बदल जाती है।
इस संवेदनशील पहल ने समाज को यह संदेश दिया कि शिक्षा कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर बच्चे का अधिकार है, और कोई भी बच्चा सिर्फ आर्थिक कारणों से अपने सपनों से दूर नहीं किया जा सकता।
आज ओजश की आँखों में फिर से पढ़ाई की चमक है, उसकी माँ के चेहरे पर सुकून है, और समाज के सामने एक उदाहरण है—
कि जब जनप्रतिनिधि दिल से सोचते हैं, तब शासन सिर्फ व्यवस्था नहीं, बल्कि सहारा बन जाता है।
यह कहानी सिर्फ एक बच्चे की नहीं, बल्कि उस “मैं हूँ ना” की है, जो किसी के जीवन में उजाला भर देता है। ?
(एक संपादकीय दृष्टि)
कैसे स्वीकार कर लूँ कि विकास की वीरांगना हैं दुर्ग नगर निगम की महापौर श्रीमती अलका बाघमार?
यह अलग बात है कि 31 जनवरी को महापौर श्रीमती अलका बाघमार का जन्मदिन है और समर्थकों द्वारा अतिशयोक्ति से भरे पोस्टर शहर भर में लगाए जा रहे हैं। राजनीतिक दल से जुड़ी होने के कारण यह उनका राजनीतिक धर्म भी हो सकता है, लेकिन प्रश्न यह है कि शहर की जनता इन पोस्टरों पर आखिर किस आधार पर विश्वास करे?
कचरे, बदबू और बदहाली का विकास मॉडल
शहर के मध्य सुराना कॉलेज के सामने कचरों का अंबार और उससे उठती दुर्गंध आज भी जनता को मुंह ढकने पर मजबूर कर रही है। भारतीय जनता पार्टी के ही शासनकाल में बनी चौपाटी आज बदहाली की मिसाल बन चुकी है।
सड़कों पर अवैध बाजार लगातार अपने आकार का विस्तार कर रहा है। बस स्टैंड क्षेत्र में संचालित राम रसोई सड़क पर कब्जा कर खुलेआम व्यापार कर रही है। व्यापार में नफा हो या नुकसान—वह अलग विषय है—लेकिन तथ्य यह है कि व्यापार जारी है, और वह भी शहरी सरकार की मौन स्वीकृति के साथ।
अनुबंध समाप्त, कार्रवाई शून्य
बस स्टैंड स्थित राम रसोई का निर्धारित अनुबंध समाप्त हो चुका है, इसके बावजूद नगर निगम द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इससे भी अधिक आपत्तिजनक यह है कि शहरी सरकार की मुखिया उसी संचालक के साथ मंच साझा करती नजर आती हैं।
मंच से यह जरूर कहा जा रहा है कि “शहरी सरकार ईमानदारी से काम कर रही है”, लेकिन यह ईमानदारी शहर में बढ़ते अतिक्रमण के सामने पूरी तरह अदृश्य हो जाती है।
अतिक्रमण में भेदभाव के आरोप
अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई में भेदभाव अब छिपा नहीं रह गया है।
कपड़ा लाइन में एक विशेष समुदाय पर निरंतर कार्रवाई
वहीं, कपड़ा लाइन के समीप चौक पर अतिक्रमण की भरमार पर चुप्पी
वार्ड क्रमांक 59 में रोहित जैन के ठेले पर की गई तथाकथित कार्रवाई को कई लोग महापौर की निजी जिद का प्रत्यक्ष उदाहरण बता रहे हैं। सवाल यह है कि नियम सबके लिए एक समान क्यों नहीं?
पोस्टर वार में ठेकेदारों की एंट्री
इस बार महापौर के जन्मदिन पर एक नया दृश्य देखने को मिल रहा है—नगर निगम के ठेकेदारों की फौज भी पोस्टर वार में शामिल हो चुकी है।
सभी की अपनी-अपनी राजनीतिक और व्यावसायिक मजबूरियाँ हो सकती हैं, लेकिन शहर की जनता आज जिन समस्याओं से जूझ रही है, वे किसी पोस्टर से छिप नहीं सकतीं।
जमीनी हकीकत बनाम मंचीय भाषण
आज शहर की वास्तविक तस्वीर यह है—
जगह-जगह कचरे के ढेर
अंधेरे रास्ते
सफाई व्यवस्था बदहाल
जल व्यवस्था चरमराई
अतिक्रमण से अस्त-व्यस्त शहर
आवारा पशुओं से आमजन त्रस्त
विकास कार्य कई स्थानों पर ठप
ऐसे में विकास की बात करना कहीं न कहीं चुनावी वादों से जनता को ठगने जैसा प्रतीत होता है, जो महापौर प्रत्याशी के रूप में श्रीमती अलका बाघमार ने किए थे।
निजी संस्थाओं के भरोसे शहर
यदि कुछ निजी संस्थाएँ चौराहों और चौक-चौराहों के सौंदर्यीकरण की जिम्मेदारी न उठातीं, तो आज शहर की स्थिति और भी भयावह होती।
वित्त आयोग से मिलने वाले फंड से सड़कों का संधारण हो रहा है, लेकिन यह कोई निजी उपलब्धि नहीं बल्कि एक सतत प्रशासनिक प्रक्रिया है—सरकार किसी की भी हो, यह राशि आती ही है।
शहरी सरकार की कोई ठोस, मौलिक उपलब्धि आज भी ढूंढे नहीं मिलती।
एक अपवाद: नरेन्द्र बंजारे
हाँ, वित्त विभाग प्रभारी नरेन्द्र बंजारे ने उपादान जैसे मामलों में निगम के पूर्व कर्मचारियों के लिए पहल कर एक सकारात्मक उदाहरण जरूर प्रस्तुत किया है। लेकिन समग्र व्यवस्था आज भी शर्मसार नजर आती है।
प्रोटोकॉल और किराए की गाड़ी
विडंबना यह भी है कि महापौर के लिए निगम वाहन आवंटित होने के बावजूद किराए के वाहन में यात्रा की जा रही है—मानो प्रोटोकॉल का आनंद भी सत्ता का एक अलग ही सुख हो।
जन्मदिन, भव्य आयोजन और मीडिया प्रबंधन
सूत्रों के अनुसार, 31 जनवरी का जन्मदिन समारोह अत्यंत भव्य बनाया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी विभागीय अधिकारियों को सौंप दी गई है।
कुछ तथाकथित पत्रकारों को साधकर झूठी वाहवाही वाली खबरें भी प्रकाशित कराई जा सकती हैं—ऐसी चर्चाएँ शहर में आम हैं।
20–25 साल में सबसे बदहाल दौर
यदि जमीनी हकीकत देखी जाए, तो शहर पिछले 20–25 वर्षों में अपने सबसे बदहाल दौर से गुजर रहा है।
इस स्थिति की जिम्मेदारी से नगर निगम प्रशासन और शहरी सरकार दोनों नहीं बच सकते।
शहरी सरकार और निगम प्रशासन के बीच समन्वय की कमी साफ दिखाई देती है। वहीं स्थानीय विधायक—जो कि प्रदेश के शिक्षा मंत्री भी हैं—के साथ बढ़ती दूरी भी शहरी सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
एक ओर बस स्टैंड को नया स्वरूप देने की योजना, दूसरी ओर बस स्टैंड में राम रसोई के अवैध अनुबंध पर पुरानी सरकार को दोष देकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश—यह विरोधाभास शहर की जनता भली-भांति समझ रही है।
अंत में…
खैर, जैसा भी हो—
महापौर हैं, तो जन्मदिन धूमधाम से मनाया जाएगा।
जब सत्ता है, तो उसका लाभ भी उठाया जाएगा।
फिर भी औपचारिकता निभाते हुए—
महापौर श्रीमती अलका बाघमार को जन्मदिन की अग्रिम बधाई एवं शुभकामनाएँ।
बस इतना निवेदन है कि अगला जन्मदिन पोस्टरों में नहीं, बल्कि शहर की सूरत में विकास के रूप में नजर आए।
यह उस सोच का अंत है, जो स्वयं को पत्रकारिता का पर्याय और शेष सभी को नगण्य समझ बैठी थी।
सवाल सीधा और असहज है—
क्या पत्रकारिता किसी क्लब की बपौती है?
क्या किसी पत्रकार की पहचान कुछ लोगों की मोहर से तय होगी?
यदि जवाब “नहीं” है,
तो फिर दुर्ग में वह स्थिति क्यों बनी, जहाँ राष्ट्रीय और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकारों को भी बार-बार “पत्रकार” साबित करना पड़ा?
इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि पुराने प्रेस क्लब में अनुभव है, वरिष्ठता है और पत्रकारिता का इतिहास है।
लेकिन जब यही वरिष्ठता—
नए पत्रकारों के लिए दीवार बन जाए
सदस्यता वर्षों तक लटकाई जाए
बैठकों से लोकतांत्रिक संवाद गायब हो जाए
और संगठन कुछ गिने-चुने लोगों की सुविधा व वसूली का माध्यम बन जाए
तो सवाल उठना स्वाभाविक ही नहीं, आवश्यक हो जाता है।पत्रकारिता में सबसे खतरनाक नज़दीकी होती है— सत्ता से नहीं, आत्ममुग्धता से।
दुर्ग में वर्षों तक प्रशासन और राजनीतिक तंत्र के भीतर यह भ्रम बैठाया गया कि—“प्रेस क्लब मतलब यही लोग,इनके बाहर कोई पत्रकार नहीं।”
यह भ्रम इतना गहरा था कि कई अवसरों पर अन्य पत्रकारों को सार्वजनिक रूप से नकारा गया,जबकि वे ज़मीनी पत्रकारिता कर रहे थेऔर बड़े मीडिया संस्थानों से जुड़े हुए थे।
यह पत्रकारिता नहीं थी— यह सूचना पर कब्ज़े की मानसिकता थी।
नया प्रेस क्लब किसी सत्ता-समर्थित षड्यंत्र का परिणाम नहीं है। यह उन पत्रकारों की आख़िरी चुप्पी-तोड़ प्रतिक्रिया है,जिन्हें वर्षों तक यही सुनाया गया—
“जगह नहीं है, नियम नहीं है, ज़रूरत नहीं है।”
जब संगठन परिवार न रहे,तो नए घर बनते ही हैं।
यहाँ एक सच नए प्रेस क्लब के लिए भी उतना ही ज़रूरी है—पत्रकारिता जितनी बँटेगी,उतनी ही कमज़ोर होगी।दो प्रेस क्लब,दो मंच,दो ध्रुव—इस बंटवारे का सीधा लाभ पत्रकारों को नहीं, सत्ता और प्रशासन को मिलेगा।
जो आज तालियाँ बजा रहे हैं,वही कल इसी विभाजन का इस्तेमाल पत्रकारों की आवाज़ दबाने में करेंगे।
वरिष्ठ पत्रकारों की — कि संगठन को निजी जागीर न बनाएं
नए पत्रकारों की — कि विद्रोह मर्यादा से बाहर न जाए
पत्रकारिता में न वरिष्ठ छोटा होता है,न कनिष्ठ कमज़ोर— कमज़ोर होती है केवल नीयत।
क्या दुर्ग का पत्रकार क्लब से बड़ा बनेगा,या क्लब के नाम पर खुद को छोटा करता रहेगा? यदि पुराने प्रेस क्लब ने आत्ममंथन नहीं किया और नया प्रेस क्लब आत्मसंयम नहीं अपनाता—
तो इतिहास साफ़ है—
अहंकार से बना संगठन और जल्दबाज़ी से जन्मा विद्रोह,दोनों ही ज़्यादा देर तक नहीं टिकते। दुर्ग की पत्रकारिता आज चौराहे पर खड़ी है। अब फैसला पत्रकारों को करना है—
✒️ कलम एकजुट रखनी है
या
✒️ क्लबों में बाँट देनी है।
व्यंगात्मक लेख
दुर्ग। नगर पालिका निगम में इन दिनों विकास, स्वच्छता या जनसमस्याओं की नहीं, बल्कि "चाय पहले क्यों नहीं आई" जैसे गूढ़ प्रशासनिक मुद्दे की चर्चा जोरों पर है। बताया जा रहा है कि मात्र चाय समय पर न पहुँचने की ‘गंभीर चूक’ पर एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को निलंबन और ट्रांसफर की धमकी दे दी गई। कर्मचारी भले निलंबित न हुआ हो, पर उसकी कुर्सी ज़रूर खिसका दी गई—और यही साबित करता है कि चाय हल्की हो सकती है, पर सत्ता की चुस्की भारी होती है।
नगर निगम में यह कोई पहला मामला नहीं है। हाल ही में आयुक्त द्वारा अधीनस्थ कर्मचारियों से घरेलू कार्य कराए जाने का मामला जब अदालत की दहलीज़ तक पहुँचा, तब प्रदेश भर में बहस छिड़ी। अब उसी बहस की आँच में यह पुराना किस्सा फिर से उबल पड़ा है—इस बार चाय के उबाल के साथ।
व्यंग्य यह है कि पाँच साल के लिए चुने गए जनप्रतिनिधि यदि चाय के कप से ही प्रशासनिक ताकत का प्रदर्शन करने लगें, तो शहर की दशा-दिशा का अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं। सवाल यह नहीं कि चाय पहले क्यों नहीं आई, सवाल यह है कि अहंकार पहले क्यों आ गया?
नैतिकता की किताब में शायद यह अध्याय नहीं मिलता कि किसी चपरासी को ‘मेरी चाय’ के नाम पर धमकाया जाए। पर निगम की अनकही पाठ्यक्रम में यह अध्याय पढ़ाया जा रहा है—जहाँ हँसी-मज़ाक में कहा जाता है, “काम कर दे, नहीं तो नौकरी से निकलवा दूँगा।” मज़ाक की आड़ में यह वाक्य, कर्मचारियों के लिए डर का स्थायी पोस्टर बन जाता है।
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी वैसे ही सत्ता के गलियारों में सहमे रहते हैं। ऐसे में यदि जनप्रतिनिधि अपने कार्यकाल को चाय-ट्रांसफर मॉडल से चलाएँ, तो प्रशासनिक अनुशासन नहीं, तानाशाही की सुगंध आती है—भले ही कप में इलायची पड़ी हो।
जिस कर्मचारी का ट्रांसफर हुआ, उसने प्रतिरोध नहीं किया। चुपचाप नई जगह काम संभाल लिया। शायद इसलिए कि उसे मालूम था—यह शहर है, यहाँ चाय ठंडी हो सकती है, पर सत्ता का मिज़ाज नहीं।
आज जब निगम और कर्मचारी के बीच के मामले अदालत तक पहुँच चुके हैं, तब यह किस्सा फिर से हँसी-मज़ाक में उछाला जा रहा है। पर हँसी के पीछे जो कड़वाहट है, वह यह सवाल छोड़ जाती है—
अगर चाय के लिए धमकी है, तो शहर के लिए क्या?
व्यंग्य यहीं खत्म होता है, जवाब शहर को देना है।
लेखक - श्री पीयूष गोयल (केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री- भारत सरकार )
स्टार्टअप इंडिया पहल पूरे देश में एक समग्र और नई सोच वाले इकोसिस्टम के रूप में विकसित हुई है। यह युवाओं की उद्यमशील ऊर्जा को रोजगार सृजन और आर्थिक विकास को तेज करने की दिशा में लगाकर, माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत 2047 के मिशन को साकार करने का मार्ग तैयार कर रही है।
भारत में आज दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में से एक मौजूद है। आज उद्यमिता एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन बन चुकी है, जो भारत के आर्थिक परिदृश्य को नया आकार दे रही है और विकास व रोजगार सृजन का नया इंजन बन रही है।
यह परिवर्तन रातोंरात नहीं हुआ। जब प्रधानमंत्री ने 2015 में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से स्टार्टअप इंडिया की घोषणा की, तब उन्होंने एक स्पष्ट और महत्वाकांक्षी दृष्टि रखी कि उद्यमिता देश के हर जिले और हर ब्लॉक तक पहुंचे।
16 जनवरी 2016 को उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) की ओर से शुरू किए जाने के बाद से स्टार्टअप इंडिया ने लंबा सफर तय किया है। स्टार्टअप देश की अर्थव्यवस्था के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नई ऊर्जा भर रहे हैं। आईटी सेवाएं, स्वास्थ्य और जीवन विज्ञान, शिक्षा, कृषि और निर्माण जैसे क्षेत्रों में सबसे अधिक स्टार्टअप सक्रिय हैं। इसके अलावा, जलवायु तकनीक और अवसंरचना सहित 50 से अधिक अन्य उद्योगों में भी नए उद्यम सामने आए हैं। यह व्यापकता विभिन्न क्षेत्रों में नवाचार और मजबूती को दर्शाती है, खासकर उन क्षेत्रों में जो राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
नवाचार और एआई: पिछले एक दशक में एक बड़ा बदलाव नवाचार और गहन तकनीक पर बढ़ते ध्यान के रूप में देखा गया है। वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की रैंक 2015 में 81वें स्थान से बढ़कर पिछले वर्ष 38वें स्थान पर पहुँच गई है, और गहन तकनीक से जुड़े स्टार्टअप्स को सरकार का समर्थन इसे आगे और बेहतर करेगा। प्रधानमंत्री की डिजिटल इंडिया पहल के आधार पर एआई स्टार्टअप्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
गहन तकनीक वाला राष्ट्र बनाने के प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण के तहत अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की गई है, तथा इंडिया एआई मिशन और रिसर्च डेवलपमेंट एंड इनोवेशन योजना की शुरुआत की गई है। भारत के स्टार्टअप एयरोनॉटिक्स, एयरोस्पेस और रक्षा, रोबोटिक्स, हरित तकनीक, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में भी नवाचार कर रहे हैं। बौद्धिक संपदा के निर्माण में तेज़ वृद्धि इस प्रवृत्ति को और मजबूत करती है। भारतीय स्टार्टअप्स ने 16,400 से अधिक नए पेटेंट आवेदन दाखिल किए हैं, जो मौलिक नवाचार, दीर्घकालिक मूल्य सृजन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर बढ़ते फोकस को दर्शाता है।
अखिल भारतीय विकास: उद्यमिता को देशभर में मिल रहा समर्थन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वर्ष 2016 में केवल चार राज्यों में स्टार्टअप नीतियां थीं, जबकि आज भारत के 30 से अधिक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष स्टार्टअप ढांचे मौजूद हैं। अब हर राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में डीपीआईआईटी से मान्यता प्राप्त स्टार्टअप हैं, जो संस्थागत समर्थन की मजबूती और जमीनी स्तर की भागीदारी को दर्शाता है।
अब तक 2 लाख से अधिक स्टार्टअप्स को मान्यता दी जा चुकी है, जो नीति-आधारित पारिस्थितिकी तंत्र के एक दशक के सतत विकास को दर्शाता है। केवल 2025 में ही 49,400 से अधिक स्टार्टअप्स को मान्यता मिली, जो स्टार्टअप इंडिया की शुरुआत के बाद सबसे अधिक वार्षिक वृद्धि है।
समावेशन इस पूरी यात्रा की एक मजबूत आधारशिला रहा है। महिला नेतृत्व वाले उद्यम एक बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं, जहां 45 प्रतिशत से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक है। इसके अलावा, लगभग आधे स्टार्टअप गैर-मेट्रो शहरों में स्थित हैं, जो नवाचार और रोजगार के नए केंद्र के रूप में टियर-2 और टियर-3 शहरों की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
लोकल से ग्लोबल: जैसे-जैसे भारतीय स्टार्टअप्स का विस्तार हो रहा है, पूरी दुनिया उनके लिए बाज़ार बनती जा रही है। वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को समर्थन देने के लिए स्टार्टअप इंडिया ने मजबूत अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां बनाई हैं। अब 21 अंतरराष्ट्रीय ब्रिज और 2 रणनीतिक गठबंधन मौजूद हैं, जो यूके, जापान, दक्षिण कोरिया, स्वीडन और इज़राइल सहित प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बाज़ार तक पहुंच, सहयोग और विस्तार को आसान बनाते हैं। इन पहलों से अब तक 850 से अधिक स्टार्टअप्स लाभान्वित हो चुके हैं।
स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड, न्यूज़ीलैंड और इज़राइल की मेरी हालिया यात्राओं में स्टार्टअप्स भारत के व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों का अहम हिस्सा रहे। इन प्रयासों ने वैश्विक मंच पर भारतीय नवाचार को प्रदर्शित करने का अवसर दिया, साथ ही हमारे उद्यमियों को विकसित अर्थव्यवस्थाओं की नवाचार और व्यापारिक कार्यप्रणालियों से परिचित कराया।
सुधार और बाज़ार तक पहुंच: इस विकास को संभव बनाने में कारोबार करने में आसानी सुधारना एक मुख्य आधार रहा है। पात्र स्टार्टअप अपने पहले दस वर्षों में से किसी भी तीन लगातार वर्षों के लिए कर अवकाश का लाभ ले सकते हैं। अब तक 4,100 से अधिक स्टार्टअप्स को इसके लिए पात्रता प्रमाणपत्र मिल चुके हैं।
60 से अधिक नियामकीय सुधारों के माध्यम से अनुपालन का बोझ कम किया गया है, पूंजी जुटाने को आसान बनाया गया है और घरेलू संस्थागत निवेश को मजबूत किया गया है। एंजेल टैक्स को समाप्त करने और वैकल्पिक निवेश कोषों (एटीएफ) के लिए दीर्घकालिक पूंजी के रास्ते खोलने से स्टार्टअप फंडिंग का पारिस्थितिकी तंत्र और सशक्त हुआ है। बाज़ार तक पहुंच को प्राथमिकता दी गई है। सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जैम) के माध्यम से 35,700 से अधिक स्टार्टअप्स को जोड़ा गया है, जिन्हें 51,200 करोड़ से अधिक मूल्य के पांच लाख से ज्यादा ऑर्डर मिले हैं। इन प्रयासों के साथ मजबूत वित्तीय सहयोग भी दिया गया है। स्टार्टअप्स के लिए फंड ऑफ फंड्स योजना के तहत वैकल्पिक निवेश कोषों के जरिए 25,500 करोड़ से अधिक का निवेश किया गया है, जिससे 1,300 से अधिक उद्यमों को लाभ मिला है। इसके अलावा, स्टार्टअप्स के लिए क्रेडिट गारंटी योजना के अंतर्गत 800 करोड़ से अधिक के बिना जमानत ऋण की गारंटी दी गई है।
945 करोड़ के परिव्यय वाली स्टार्टअप इंडिया सीड फंड योजना के तहत स्टार्टअप्स को कॉन्सेप्ट की जाँच, प्रोटोटाइप विकास, उत्पाद परीक्षण, बाज़ार में प्रवेश और व्यवसायीकरण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
सांस्कृतिक बदलाव: भारतीय स्टार्टअप्स ने देश में एक बड़ा सांस्कृतिक परिवर्तन लाया है। पहले बच्चों को मुख्य रूप से सरकारी नौकरी, इंजीनियरिंग या चिकित्सा जैसे कुछ ही क्षेत्रों में जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। आज कई युवा नौकरी तलाशने वाले नहीं, बल्कि नौकरी देने वाले बनने का सपना देख रहे हैं, और उनके परिवार भी उद्यमशील आकांक्षाओं का सम्मान करते हैं और उन्हें बढ़ावा देते हैं।
अंततः भारत की स्टार्टअप यात्रा: हमारे युवा उद्यमियों पर विश्वास, नीति-आधारित विकास और दुनिया के लिए नवाचार करने की भारत की क्षमता की कहानी है। 2047 तक एक विकसित देश बनने के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए, स्टार्टअप्स समृद्ध, समावेशी और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारत के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाते रहेंगे।
(लेखक केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री हैं)
शरद पंसारी - संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार
भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर हाल के दिनों में एक अजीब-सी बहस सार्वजनिक विमर्श में छा गई है — “भारत में एक डॉलर में छह समोसे मिल जाते हैं, जबकि अमेरिका में एक डॉलर में केवल एक पेन।” यह तुलना सुनने में भले ही चुटीली लगे, लेकिन यह आर्थिक यथार्थ को समझने के बजाय उसे सरलीकरण और भावनात्मक तर्कों में उलझाने का प्रयास अधिक प्रतीत होती है। असल सवाल समोसे या पेन का नहीं, बल्कि आय, गरीबी, क्रय शक्ति और जीवन स्तर का है।
भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा 7 जनवरी 2026 को जारी प्रथम अग्रिम अनुमान इस वास्तविकता को स्पष्ट रूप से सामने रखते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में स्थिर मूल्यों पर भारत की प्रति व्यक्ति वास्तविक जीडीपी ₹1,42,119 रहने का अनुमान है, जो बीते वर्ष की तुलना में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि अवश्य दर्शाता है। यह वृद्धि स्वागतयोग्य है, किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि वित्त वर्ष 2024-25 में प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय (NNI) ₹1,14,710 रही — एक ऐसा आंकड़ा जो भारत की विशाल आबादी के जीवन स्तर की सीमाओं को उजागर करता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलना और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार 2026 में भारत की नॉमिनल प्रति व्यक्ति आय लगभग $3,051 रहने का अनुमान है। क्रय शक्ति समानता (PPP) के आधार पर यह आंकड़ा $12,964 तक पहुँचता है, किंतु इसके बावजूद नॉमिनल प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत का वैश्विक स्थान 144वां है। यह रैंकिंग इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि भारत की आर्थिक वृद्धि अभी भी औसत नागरिक की आय में पर्याप्त रूप से परिलक्षित नहीं हो पा रही है।
देश के भीतर आय की असमानता और भी गहरी है। गोवा, सिक्किम और महाराष्ट्र जैसे राज्य प्रति व्यक्ति आय में आगे हैं, जहाँ महाराष्ट्र की अनुमानित प्रति व्यक्ति आय ₹2.89 लाख तक पहुँचने वाली है। इसके विपरीत बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य आज भी राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे हैं। यह क्षेत्रीय असंतुलन भारत की आर्थिक संरचना की एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
अब यदि तुलना अमेरिका से की जाए, तो अंतर लगभग खाई का रूप ले लेता है। IMF के अनुसार 2026 में अमेरिका की प्रति व्यक्ति नॉमिनल आय लगभग $92,880 (करीब ₹77.5 लाख) रहने का अनुमान है। अमेरिका दुनिया के शीर्ष 10 देशों में शामिल है, जहाँ औसत मासिक आय $5,000 और औसत घरेलू आय $78,538 के आसपास है। वहीं 2026 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कुल जीडीपी $30.50 ट्रिलियन को पार करने की संभावना है। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत और अमेरिका की तुलना केवल वस्तुओं की कीमत से नहीं, बल्कि आय और अवसरों की संरचना से होनी चाहिए।
सबसे चिंताजनक पहलू गरीबी का अंतर है। भारत में आज भी अनुमानतः लगभग 80 करोड़ लोग गरीबी रेखा के आसपास या नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। अत्यधिक गरीबी — जहाँ प्रतिदिन की आय कुछ ही रुपयों तक सीमित है — में जीवन बिताने वाली आबादी करीब 12 प्रतिशत बताई जाती है। इसके विपरीत अमेरिका में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या 10–12 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन वहाँ गरीबी की परिभाषा ही $15,000 वार्षिक आय जैसे स्तर से जुड़ी है। यह तुलना बताती है कि प्रतिशत के आंकड़े समान दिख सकते हैं, पर जीवन की वास्तविक परिस्थितियाँ पूरी तरह अलग हैं।
अर्थशास्त्रियों की राय में भारत की समस्या केवल विकास दर नहीं, बल्कि आय असमानता, रोजगार की गुणवत्ता और वास्तविक क्रय शक्ति है। जब तक आर्थिक वृद्धि का लाभ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक नहीं पहुँचेगा, तब तक समोसे और पेन जैसी तुलना केवल हकीकत से ध्यान भटकाने वाला शोर बनी रहेगी।
आज जरूरत इस बात की है कि भारत अपनी आर्थिक बहस को प्रतीकों और जुमलों से निकालकर आम आदमी की आय, रोजगार और जीवन स्तर पर केंद्रित करे। सवाल यह नहीं कि एक डॉलर में क्या मिलता है, सवाल यह है कि एक भारतीय की मेहनत की कीमत क्या है — और क्या वह उसे सम्मानजनक जीवन दे पा रही है या नहीं। यही बहस भारत को आगे ले जाएगी, बाकी सब केवल दिखावटी तर्क हैं।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि नक्सलवाद उन्मूलन अब निर्णायक चरण में है और मार्च 2026 तक इसे पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य है।
सुरक्षा शिविरों का विस्तार: दिसंबर 2023 से अब तक 65 नए सुरक्षा शिविर स्थापित किए गए हैं, जिससे दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में सरकारी उपस्थिति मजबूत हुई।
नक्सली नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई: प्रमुख माओवादी विचारकों और कमांडरों को निष्क्रिय कर उनके नेटवर्क को पूरी तरह कमजोर किया गया।
सटीक आंकड़े:
आत्मसमर्पण: 2,386+ नक्सली
गिरफ्तार: 1,901+ नक्सली
निष्क्रिय/मारे गए: 505+ नक्सली
इन कदमों से नक्सलियों की कमांड और नियंत्रण प्रणाली टूट चुकी है और स्थानीय लोग अब खुले तौर पर सरकारी पहलों का समर्थन कर रहे हैं।
सरकार ने नक्सलियों के “कोर एरिया” (अबूझमाड़ और घोर जंगली इलाके) में सक्रिय रूप से अभियान चलाकर उनके गढ़ों को निशाना बनाया।
फॉरवर्ड लिंक कैंप: पिछले दो वर्षों में 50+ नए कैंप स्थापित, जिन्हें विकास केंद्र के रूप में विकसित किया गया।
इंटेलिजेंस आधारित ऑपरेशन: अब मुठभेड़ें केवल गश्त पर नहीं होतीं, बल्कि सटीक खुफिया जानकारी के आधार पर विशेष ऑपरेशन किए जाते हैं।
आधुनिक हथियार और तकनीक: ड्रोन, एन्टी-माइन वाहन, और अत्याधुनिक संचार उपकरणों से जवानों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई, हताहत दर में भारी कमी आई।
इन रणनीतियों के परिणामस्वरूप नक्सलियों के बीच भय और अविश्वास का माहौल उत्पन्न हुआ और कई कमांडर आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौट आए।
मुख्यमंत्री की प्रमुख पहल ‘नियद नेल्लानार’ (आपका अच्छा गाँव) योजना ने सुरक्षा शिविरों के आसपास के गांवों में शत-प्रतिशत विकास की दिशा में काम किया।
सुविधाओं का विस्तार: राशन दुकान, स्कूल, आंगनबाड़ी, खेल का मैदान, मुफ्त बिजली, पक्के आवास, स्वास्थ्य क्लिनिक और 25+ बुनियादी सुविधाओं का वितरण।
शिक्षा और स्वास्थ्य: बंद 300+ स्कूलों को पुनः खोला गया, और ‘छू लो आसमान’ जैसी कोचिंग संस्थाओं के माध्यम से IIT/NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी उपलब्ध।
स्थानीय सहभागिता: ग्रामीण अब स्वयं सुरक्षा शिविरों की मांग करने लगे हैं, जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि विकास और सुरक्षा का मॉडल सफल हुआ है।
बस्तर को केवल सुरक्षा के मोर्चे तक सीमित नहीं रखा गया; सरकार ने इसे स्थानीय उद्यमिता, वनोपज और पर्यटन से जोड़ा।
वनोपज आधारित समर्थन: इमली, महुआ, कोसा वनोपजों का MSP बढ़ाया गया और बिचौलियों को खत्म किया गया।
स्थानीय रोजगार: ‘बस्तर कैफे’ ब्रांड और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स में महिलाओं और युवाओं को रोजगार मिला।
पर्यटन और इको-टूरिज्म: ‘बस्तर पांडुम’, ‘बस्तर ओलंपिक’ और सुरक्षित पर्यटन स्थलों से स्थानीय आजीविका को बढ़ावा।
कौशल विकास: आत्मसमर्पित नक्सलियों और युवाओं को ट्रैक्टर रिपेयरिंग, मोबाइल रिपेयरिंग, सोलर पंप तकनीशियन और अन्य व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान।
भरोसे का संकेत: 2025 में ‘लोन वर्राटू’ अभियान के तहत 2,000+ नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें कई अब ‘बस्तर फाइटर्स’ के रूप में पुलिस और प्रशासन की मदद कर रहे हैं।
राजनीतिक भागीदारी: ग्राम सभाओं और स्थानीय चुनावों में मतदान प्रतिशत में वृद्धि, जो लोकतंत्र में विश्वास की बढ़ती दर को दर्शाती है।
सड़कों और पुलों का निर्माण: इंद्रावती नदी पर नए पुल और ग्रामीण सड़कों का निर्माण, जिससे मानसून के दौरान भी बस्तर का संपर्क टूटने का खतरा नहीं।
स्वास्थ्य सेवाएं: ‘हाट बाजार क्लिनिक’ योजना के तहत जंगलों और दुर्गम इलाकों में डॉक्टर और दवाइयां उपलब्ध।
शिक्षा और कौशल: बच्चों के लिए गुणवत्ता शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का मार्गदर्शन।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में बस्तर में दो वर्षों में सुरक्षा, विकास और विश्वास का त्रिकोणीय मॉडल सफल हुआ है। नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई और विकास की मुख्यधारा के प्रति स्थानीय लोगों के विश्वास ने बस्तर को 'लाल आतंक' से मुक्त कर 'हरी-भरी संस्कृति और तेजी से बढ़ते विकास' की पहचान दिलाई है।
मार्च 2026 तक बस्तर को पूर्ण नक्सल मुक्त बनाने का लक्ष्य अब within reach है, और यह स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और उनकी सरकार ने बस्तर को न केवल सुरक्षित, बल्कि आत्मनिर्भर और विकसित बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है।
माननीय नरेंद्र मोदी (प्रधानमन्त्री जी के कलम से )
पीआईबी रायपुर से संकलित
शौर्यपथ विशेष
सोमनाथ... ये शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है...“सौराष्ट्रे सोमनाथं च...यानि ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। ये इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है। शास्त्रों में ये भी कहा गया है:
“सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।
लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गं समाश्रयेत्॥”
अर्थात्, सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वो पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है।
दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और प्रार्थनाओं का केंद्र था, विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था।
वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था।
सोमनाथ हमला मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है। साल 1026 के बाद समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुन:निर्मित करने के प्रयास जारी रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका। संयोग से 2026 का यही वर्ष सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है। 11 मई 1951 को इस मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वो समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे।
1026 में एक हजार वर्ष पहले सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण, वहां के लोगों के साथ की गई क्रूरता और विध्वंस का वर्णन अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में विस्तार से मिलता है। जब इन्हें पढ़ा जाता है तो हृदय कांप उठता है। हर पंक्ति में क्रूरता के निशान मिलते हैं, ये ऐसा दुःख है जिसकी पीड़ा इतने समय बाद भी महसूस होती है।
हम कल्पना कर सकते हैं कि इसका उस दौर में भारत पर और लोगों के मनोबल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा होगा। सोमनाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व बहुत ज्यादा था। ये बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर खींचता था। ये एक ऐसे समाज की प्रेरणा था जिसकी आर्थिक क्षमता भी बहुत सशक्त थी। हमारे समुद्री व्यापारी और नाविक इसके वैभव की कथाएं दूर-दूर तक ले जाते थे।
सोमनाथ पर हमले और फिर गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद आज मैं पूरे विश्वास के साथ और गर्व से ये कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है। ये पिछले 1000 साल से चली आ रही भारत माता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान की गाथा है, ये हम भारत के लोगों की अटूट आस्था की गाथा है।
1026 में शुरू हुई मध्यकालीन बर्बरता ने आगे चलकर दूसरों को भी बार-बार सोमनाथ पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। यह हमारे लोगों और हमारी संस्कृति को गुलाम बनाने का प्रयास था। लेकिन हर बार जब मंदिर पर आक्रमण हुआ, तब हमारे पास ऐसे महान पुरुष और महिलाएं भी थीं जिन्होंने उसकी रक्षा के लिए खड़े होकर सर्वोच्च बलिदान दिया। और हर बार, पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारी महान सभ्यता के लोगों ने खुद को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया।
महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका। सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था, हमारा विश्वास और प्रबल हुआ। उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं की भीतर सांस लेती रही। साल 1026 के हजार साल बाद आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है, कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं, जबकि सोमनाथ मंदिर आज हमारे विश्वास का मजबूत आधार बनकर खड़ा है। वो आज भी हमारी प्रेरणा का स्रोत है, वो आज भी हमारी शक्ति का पुंज है।
ये हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है, जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया। उन्होंने ये सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें।
1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे, वो अनुभव उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया। 1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने अपनी भावना व्यक्त की।
उन्होंने कहा, “दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएंगे। ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे।
इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है। ये बार बार नष्ट किए गए, और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए। पहले की तरह सशक्त। पहले की तरह जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है। इसका अनुसरण आपको गौरव से भर देता है। इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु। इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा।”
ये सर्वविदित है कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। उन्होंने आगे बढ़कर इस दायित्व के लिए कदम बढ़ाया। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई। उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।
उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे। महान सरदार साहब इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे, लेकिन उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार होकर भव्य रूप में उपस्थित था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी। लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया।
सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है। उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था। सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’, अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।
जैसा कि मुंशी जी की पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है। हम विश्वास करते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया, लेकिन उसकी चेतना अमर रही।
इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है। दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है। वो हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है। हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं। ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं। आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।
अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है। सदियों पहले जैन परंपरा के आदरणीय मुनि कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य यहां आए थे और कहा जाता है कि प्रार्थना के बाद उन्होंने कहा,
“भवबीजाङ्कुरजनना रागाद्याः क्षयमुपगता यस्य।
अर्थात्, उस परम तत्व को नमन जिसमें सांसारिक बंधनों के बीज नष्ट हो चुके हैं। जिसमें राग और सभी विकार शांत हो गए हैं।
आज भी दादा सोमनाथ के दर्शन से ऐसी ही अनुभूति होती है। मन में एक ठहराव आ जाता है, आत्मा को अंदर तक कुछ स्पर्श करता है, जो अलौकिक है, अव्यक्त है।
1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद 2026 में भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है और तट को स्पर्श करती लहरें उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं। उन लहरों की तरह सोमनाथ बार-बार उठता रहा है।
अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं। उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। इतिहास के पन्नों में वे केवल फुटनोट हैं, जबकि सोमनाथ आज भी अपनी आशा बिखेरता हुआ प्रकाशमान खड़ा है। सोमनाथ हमें ये बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है। ये विश्वास का वो स्वर है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देता है।
अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं। आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं। एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए। एक ऐसा भारत, जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है।
जय सोमनाथ !
(नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं और श्री सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं।)
शौर्यपथ व्यंगात्मक लेख / दिल्ली विधानसभा का बजट सत्र चल रहा था। माहौल गंभीर होना चाहिए था—आंकड़े, योजनाएँ, भविष्य की दिशा। लेकिन 6 जनवरी 2026 को अचानक इतिहास ने ऐसा पलटा खाया कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव भी शायद सेलुलर जेल से झांककर पूछ बैठे हों—“भाई, ये नया सिलेबस कब आया?”
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने पूरे आत्मविश्वास के साथ विधानसभा में ऐलान किया कि शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने “बहरी कांग्रेस की सरकार” को जगाने के लिए असेंबली में बम फेंका था।
इतिहास की किताबें हड़बड़ा गईं, अध्यापक चुपचाप पानी पीने लगे और गूगल सर्च ने एक साथ लाखों बार “Central Legislative Assembly 1929” सर्च होते देखा।
असल इतिहास थोड़ा जिद्दी किस्म का है। वह बताता है कि 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बम फेंका था—कांग्रेस सरकार तब न सत्ता में थी, न अस्तित्व में। लेकिन राजनीति में जब आत्मविश्वास ऊँचा हो, तो तथ्य अक्सर बौने लगने लगते हैं।
बयान आते ही सोशल मीडिया ने बिना बजट सत्र बुलाए ही आपात बैठक कर ली।
X (पूर्व ट्विटर) पर इतिहास “रीमिक्स मोड” में चला गया।
AAP नेताओं ने तंज कसते हुए कहा—“इतिहास अब OTT पर आ गया है, हर एपिसोड में नया प्लॉट।”
किसी ने मुख्यमंत्री को “दिल्ली की पप्पू CM” बताया, तो किसी ने पूछा—“मैडम, अगली बार 1857 की क्रांति भी Wi-Fi से लड़ी जाएगी क्या?”
ट्रोलर्स को याद आ गया कि यह वही मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने कभी AQI को तापमान समझ लिया था और दिल्ली की लंबाई 1483 किलोमीटर घोषित कर दी थी। जनता ने राहत की सांस ली—कम से कम दिल्ली अब तक अमेरिका से लंबी घोषित नहीं हुई।
मीम्स की ऐसी बाढ़ आई कि भगत सिंह की टोपी में Wi-Fi सिग्नल लग गए, असेंबली में डीजे बजने लगे और कैप्शन लिखा गया—
“बहरी सरकार थी, इसलिए बम फेंका गया।”
विपक्ष ने भी मौके को हाथ से जाने नहीं दिया।
AAP ने इसे “इतिहास का अपमान” बताया, कांग्रेस ने कहा—“अब भगत सिंह भी कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल किए जा रहे हैं।”
इतिहासकारों ने चुपचाप सिर पकड़ लिया—क्योंकि वे जानते थे, अब कोई भी किताब खोलने वाला नहीं।
बाद में मुख्यमंत्री ने वर्षांत संदेश में कहा कि कुछ लोग “AQI और AIQ” जैसे मुद्दों पर बहस करके सरकार का ध्यान भटका रहे हैं, जबकि वह गवर्नेंस पर फोकस कर रही हैं।
यह बयान सुनकर जनता ने तय कर लिया कि आने वाले समय में शायद इतिहास भी “वर्क फ्रॉम होम” करेगा।
कुल मिलाकर, दिल्ली ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यहाँ सिर्फ प्रदूषण ही नहीं, बयान भी हाई लेवल के होते हैं।
और इतिहास?
वह अब किताबों में नहीं, सोशल मीडिया के मीम टेम्पलेट में सुरक्षित है।
शौर्यपथ लेख /
डिजिटल मीडिया के दौर में पॉडकास्ट संवाद का एक सशक्त मंच बन चुके हैं, जहां जटिल सामाजिक विषयों पर खुलकर चर्चा होती है। लेकिन हाल ही में शुभांकर मिश्रा के पॉडकास्ट में शामिल हुईं लेखिका और मिथकशास्त्री सीमा आनंद के कुछ बयानों ने एक तीखा विवाद खड़ा कर दिया है। यह विवाद केवल किसी एक वक्तव्य तक सीमित नहीं, बल्कि सहमति, नैतिकता, नाबालिगों की सुरक्षा और यौन शिक्षा की जिम्मेदारी जैसे गहरे सवालों को सामने लाता है।
पॉडकास्ट के दौरान सीमा आनंद ने एक घटना साझा की, जिसमें उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष एक 15 वर्षीय लड़के ने उन्हें “अप्रोच” किया था। उन्होंने इस प्रसंग को सामान्य अनुभव के तौर पर रखा, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। कई लोगों ने इस बयान को ग्रूमिंग और नाबालिगों के प्रति असंवेदनशीलता से जोड़ते हुए सवाल उठाए कि क्या इस तरह की बातों को सार्वजनिक मंच पर कहना उचित है।
इसी बातचीत में सीमा आनंद ने “ग्रुप सेक्स” जैसे विषयों पर भी अपनी राय रखी और कहा कि किसी भी क्रिया को तब तक “अच्छा” या “बुरा” नहीं कहा जाना चाहिए, जब तक वह आपसी सहमति (Mutual Consent) से हो रही हो। यहीं से विवाद ने कानूनी और नैतिक मोड़ ले लिया। आलोचकों का कहना है कि 15 वर्ष का नाबालिग कानूनन सहमति देने में सक्षम नहीं होता, ऐसे में सहमति का तर्क इस संदर्भ में न केवल अवैध है, बल्कि सामाजिक रूप से भी अस्वीकार्य है। इस बहस ने यह स्पष्ट कर दिया कि सहमति की अवधारणा उम्र, संदर्भ और शक्ति-संतुलन से अलग नहीं की जा सकती।
सीमा आनंद लंदन स्थित एक जानी-मानी मिथकशास्त्री और कथावाचक हैं। वे स्वयं को “आनंद की संरक्षक” (Patron Saint of Pleasure) कहती हैं। उनकी चर्चित पुस्तकों में The Arts of Seduction और हालिया रिलीज Speak Easy: A Field Guide to Love, Longing and Intimacy शामिल हैं। वे अपने लेखन और वक्तव्यों में प्राचीन भारतीय ग्रंथों—विशेषकर कामसूत्र और अन्य कामुक साहित्य (Erotology)—का संदर्भ देती रही हैं।
सीमा आनंद का तर्क है कि प्राचीन भारत में यौन शिक्षा और आनंद को जीवन का स्वाभाविक और महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था, जिसे आधुनिक समाज ने नैतिकता के नाम पर कलंक बना दिया है। उनके अनुसार, खुली बातचीत और शिक्षा से ही स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि ऐतिहासिक संदर्भों की व्याख्या करते समय आधुनिक कानून और सामाजिक जिम्मेदारियों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
सीमा आनंद पहले भी यह बता चुकी हैं कि उन्हें अपने काम के कारण सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है, यहां तक कि उनके पति को लेकर भी टिप्पणियां की जाती हैं। लेकिन इस बार का विवाद अलग है। इसने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यौन शिक्षा पर बातचीत की सीमाएं क्या हों, और सार्वजनिक मंचों पर बोलते समय वक्ताओं की जिम्मेदारी कितनी होनी चाहिए।
यह विवाद किसी एक व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने से अधिक, एक व्यापक चेतावनी है। यह याद दिलाता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और कानूनी जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है—खासतौर पर तब, जब बात नाबालिगों, सहमति और संवेदनशील विषयों की हो।
डिजिटल युग में संवाद आवश्यक है, लेकिन उतना ही आवश्यक है संदर्भ, संवेदनशीलता और कानून की समझ। सीमा आनंद के बयानों ने भले ही तीखी बहस छेड़ दी हो, पर इस बहस का सबसे अहम परिणाम यही है कि समाज को अब यह तय करना होगा कि खुली चर्चा और जिम्मेदार अभिव्यक्ति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
शौर्यपथ लेख।
प्यार को अक्सर उम्र के तराजू पर तौला जाता है—जैसे भावनाएँ केवल जवानी की जागीर हों। लेकिन सच इससे कहीं ज़्यादा गहरा है। बड़ी उम्र की औरत का प्यार कोई क्षणिक आकर्षण नहीं, बल्कि अनुभव, समझ और आत्मिक स्थिरता से उपजा हुआ भाव होता है। यह प्यार दिखावे से दूर, भीतर तक उतरने वाला होता है—जो न सिर्फ़ रिश्ते को, बल्कि इंसान को भी संवार देता है।
अनुभव से उपजा भरोसा
ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव देख चुकी औरत जानती है कि रिश्ते शब्दों से नहीं, व्यवहार से टिकते हैं। वह जल्दबाज़ी नहीं करती, न ही हर बात पर शक का बोझ डालती है। उसका भरोसा आँख मूँदकर नहीं, बल्कि समझदारी से दिया गया होता है—और इसी वजह से वह भरोसा मज़बूत भी होता है।
देखभाल जो दिखती नहीं, महसूस होती है
उसका प्यार बड़े-बड़े वादों में नहीं, रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में दिखता है—समय पर पूछा गया हाल, थकान में दिया गया सुकून, और मुश्किल वक्त में बिना शोर किए खड़ा रहना। वह जानती है कि साथ निभाना क्या होता है, इसलिए उसका सहारा दिखावे का नहीं, स्थायी होता है।
भावनात्मक समझ की गहराई
बड़ी उम्र की औरत को हर बात कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वह आँखों की भाषा, खामोशी की आवाज़ और व्यवहार के उतार-चढ़ाव को पढ़ लेती है। बिना टोके, बिना जज किए—सिर्फ़ समझना और साथ देना—यही उसकी सबसे बड़ी खूबी है।
सम्मान और स्वीकृति
वह सामने वाले को बदलने की कोशिश नहीं करती। न उसे अपने साँचे में ढालना चाहती है, न ही तुलना के बोझ तले दबाती है। जैसा है, वैसा स्वीकार करना—यह उसकी परिपक्वता का सबसे सुंदर रूप है। ऐसे रिश्ते में इंसान को खुद होने की आज़ादी मिलती है।
स्थिरता जो समय के साथ बढ़ती है
उसका प्यार तेज़ हवा का झोंका नहीं, बल्कि धीमी बहती नदी की तरह होता है—जो समय के साथ और गहरी, और शांत होती जाती है। उसमें ड्रामा नहीं, भरोसा होता है; दिखावा नहीं, अपनापन होता है; और डर नहीं, सुरक्षा होती है।
कुल मिलाकर, बड़ी उम्र की औरत का प्यार शोरगुल वाला नहीं होता—वह सुकून देता है। यह ऐसा प्यार है जो रिश्ते को नहीं, इंसान को मज़बूत बनाता है। जो समय के साथ कम नहीं, बल्कि और निखरता जाता है।
ऐसा प्यार मिल जाए, तो उम्र मायने नहीं रखती—क्योंकि वहाँ दिल पूरी ईमानदारी से जुड़ता है।
श्री शैलेश कुमार सिंह
(लेखक भारत सरकार के ग्रामीण विकास विभाग में सचिव हैं)
शौर्यपथ लेख / लोकतंत्र में लोकनीति पर सार्वजनिक बहस स्वाभाविक ही नहीं, बल्कि जरूरी भी है। आजीविकाओं (खास तौर से ग्रामीण परिवारों के लिए) को आकार देने वाले कानूनों की कड़ाई से समीक्षा की ही जानी चाहिए। लेकिन इस तरह की समीक्षा नए कानून के प्रावधानों के सावधानी पूर्वक अध्ययन पर आधारित होनी चाहिए। यह पिछले फ्रेमवर्क से निकाले गए अनुमानों या नुकसान के भय पर आधारित नहीं होनी चाहिए। मगर विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून 2025 की ज्यादातर आलोचनाएं इस जाल में फंस जाती हैं। इनमें जल्दबाजी में पिछली नाकामियों का विश्लेषण कर उनका ठीकरा सुधार पर ही फोड़ दिया जाता है।
दो दशक पहले बनाए गए रोजगार गारंटी कानून ने ग्रामीण आय को स्थिर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और संकट के वक्त सुरक्षा प्रदान की। कोविड की वैश्विक महामारी जैसे संकट के समय में इसके योगदान को स्वीकार किया गया है। लेकिन समय के साथ अनुभव से इसकी दीर्घकालिक ढांचागत कमियां भी उजागर हुई हैं। मजदूरी के भुगतान में बार-बार देरी हो रही थी। प्रक्रियात्मक अवरोधों ने बेरोजगारी भत्ते को अप्रभावी बना दिया था। विभिन्न राज्यों में इस योजना तक पहुंच में काफी अंतर था। प्रशासनिक क्षमता असमान थी तथा फर्जी जॉब कार्ड, उपस्थिति के रजिस्टर में हेरफेर और खराब गुणवत्ता वाली संपदाओं के सृजन से बड़े पैमाने पर धन की बर्बादी हुई। ये छोटी नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक खामियां थीं। इसलिए मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि क्या सुधार की जरूरत थी। मुद्दा यह है कि क्या नए फ्रेमवर्क में इन खामियों को सार्थक ढंग से दूर किया गया है।
आम दावा है कि नए कानून में बुनियादी कमियां तो बनीं रहीं और समूची बहस को संक्षिप्ताक्षरों की होड़ में समेट दिया गया। लेकिन हकीकत में इसका उलट ही सच के ज्यादा करीब है। नया कानून डिलीवरी की उन कमियों को दूर करने पर केंद्रित है जिनकी वजह से पिछले फ्रेमवर्क की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा था। कमजोर परंपरागत प्रणालियों की जगह सत्यापित कामगार पंजीकरण ने ले ली है। देरी के लिए स्वतः मुआवजे के प्रावधान के साथ मजदूरी भुगतान की वैधानिक समय सीमाएं तय की गई हैं। अयोग्यता के उन प्रक्रियात्मक प्रावधानों को खत्म कर दिया गया है जिनकी वजह से बेरोजगारी भत्ता अप्रभावी बन गया था। स्पष्ट समयसीमा और जवाबदेही के साथ शिकायत निवारण को मजबूत किया गया है। ये दिखावटी बदलाव नहीं हैं। ये उन खामियों को दूर करते हैं जिनसे कामगारों का विश्वास टूटता था।
एक अन्य आलोचना यह है कि रोजगार गारंटी को खत्म कर दिया गया है। इनके अनुसार नई योजना में पुरानी कमजोरियां बनी हुई हैं। इस तरह की आलोचना सही नहीं है। वेतन रोजगार के कानूनी अधिकार को बरकरार और न्यायसंगत रखा गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि रोजगार की वैधानिक पात्रता को 100 दिनों से बढ़ाते हुए 125 दिन कर दिया गया है। बदलाव क्रियान्वयन की संरचना में किया गया है। पुराने कानून का मॉडल टुकड़ों में बंटा हुआ और प्रतिक्रियात्मक था। यह अक्सर संकट शुरू हो जाने के बाद ही हरकत में आता था। नए कानून का फ्रेमवर्क योजनाबद्ध और लागू करने योग्य है। इसे पूर्वानुमान के आधार पर कार्य सौंपे जाने के लिए डिजाइन किया गया है। वैधानिक सुधार के जरिए क्रियान्वयन की नाकामियों को दूर किए जाने को दोहराव नहीं, बल्कि संशोधन माना जाना चाहिए।
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे अधिक गरीब आबादी वाले राज्यों को पहले के फ्रेमवर्क के तहत सबसे कम लाभ मिलने के सम्बन्ध में जो चिंताएं जताई गईं हैं, वे सही हैं लेकिन यह बात सुधार की जरूरत को और मजबूत करती है, न कि उसे कमजोर करती है। इन राज्यों में मनरेगा का लाभ कम पहुंचा यह योजना की एक बड़ी विफलता थी। बिना किसी ठोस योजना के सिर्फ मांग के आधार पर चलने वाला मॉडल उन राज्यों के पक्ष में रहा जिनकी प्रशासनिक क्षमता बेहतर थी, जबकि अधिक जरूरत और पलायन वाले राज्य पिछड़ गए। नया फ्रेमवर्क सीधे तौर पर इस असंतुलन को दूर करता है, यह रोजगार पैदा करने के काम को 'विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं' से जोड़ता है, जहाँ स्थानीय मांग और कामों की पहले से मंजूरी को सुनिश्चित फंडिंग के साथ मिलाया जाता है। असमान वितरण ही सुधार की ज़रूरत की असली वजह थी; पुरानी व्यवस्था को बनाए रखने का मतलब केवल मौजूदा असमानताओं को और बढ़ाना होता। इसके अलावा, निष्पक्ष मानकों पर आधारित आवंटन से राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे में अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता आएगी।
आलोचना का एक पक्ष यह भी है कि 125 दिनों का रोजगार देने का विस्तार केवल दिखावा है, क्योंकि अब राज्यों को भी खर्च का एक हिस्सा उठाना होगा। यह तर्क पहले के उदाहरणों और सुरक्षा उपायों दोनों को नज़रअंदाज़ करता है। केंद्र और राज्यों के बीच खर्च बांटने का यह तरीका केंद्र-प्रायोजित योजनाओं के पुराने नियमों के अनुसार ही रखा गया है। वहीं, उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों तथा जम्मू-कश्मीर के लिए 90:10 के अनुपात (जहाँ केंद्र 90 और राज्य 10 प्रतिशत खर्च उठाते हैं) को जारी रखा गया है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि योजना बनाकर काम करने से पैसों का बेहतर इस्तेमाल होता है, जिससे अनिश्चितता खत्म होती है और योजना को लागू करने में कम रुकावटें आती हैं। अधिकारों का दायरा बढ़ाना और साझा जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल को दर्शाता है, न कि कमज़ोरी को। ग्रामीण सड़कों से लेकर, आवास और पीने के पानी जैसे कई सफल राष्ट्रीय कार्यक्रम भी इसी तरह की व्यवस्था के तहत काम करते हैं।
आर्थिक रूप से कमज़ोर राज्यों को अक्सर नए फ्रेमवर्क का संभावित शिकार बताया जाता है। लेकिन सिर्फ़ आर्थिक कमज़ोरी ही राज्यों के बाहर होने का कारण नहीं है। पिछली व्यवस्था के तहत, राज्यों का इस योजना से बाहर होना अक्सर खराब प्लानिंग, सरकारी मशीनरी की कम क्षमता और काम करने के तरीके में आने वाली रुकावटों की वजह से था। नया कानून पहले से की गई तैयारी, जनता की भागीदारी और प्रौद्योगिकी के जरिये जोखिमों को कम करने की कोशिश करता है। नयी व्यवस्था में एक बार योजना मंजूर होने के बाद, काम देने से मना करने की अधिकारियों की शक्ति को कम किया गया है और पारदर्शिता तथा जवाबदेही को मजबूत किया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासनिक खर्च को 6% से बढ़ाकर 9% कर दिया गया है जिससे राज्य अपनी जमीनी क्षमता को कार्यक्रम की विशालता के अनुरूप मजबूत बना सकें। किसी राज्य विशेष की अपनी चुनौतियाँ उस राष्ट्रीय सुधार को गलत साबित नहीं करतीं, इसका उद्देश्य पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को ठीक करना है।
आलोचक यह भी कहते हैं कि पहले के फ्रेमवर्क के तहत कई ज़रूरतमंद राज्यों में रोज़गार के सबसे कम दिन मिले, और बहुत कम परिवार ही कानूनी सीमा तक पहुँच पाए। यह बात सुधार के तर्क को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे और भी मजबूत बनाती है। नया फ्रेमवर्क, दर्ज की गई मांग को मंजूर किए गए कामों, तय समय सीमा में पूरा करने और बेरोजगारी भत्ते को सुनिश्चित करेगा। इसका मकसद सीधा है: कानूनी हक को असल और भरोसेमंद रोज़गार के दिनों में बदलना, खासकर उन इलाकों में जहाँ पहले सुविधाओं की कमी थी।
पुरानी 'मांग-आधारित' योजना और नई 'आपूर्ति-आधारित' योजना के बीच के अंतर को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। व्यवहार में, यह अंतर इतना बड़ा नहीं है। नया फ्रेमवर्क डिमांड को कम नहीं करता; बल्कि यह योजना के माध्यम से इसे एक संस्थागत रूप देता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मांगी गई मांग को पूरा भी किया जा सके। संसाधनों के भरोसे के साथ की गई एक नियोजित मांग, उस सैद्धांतिक अधिकार से कहीं ज्यादा सशक्त है जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता।
रोजगार गारंटी का अधिकार-आधारित स्वरूप, कमजोर होने के बजाय और मजबूत हुआ है। काम के दिनों को बढ़ाकर 125 दिन करना, मजदूरी भुगतान के लिए कानूनी रूप से लागू समय-सीमा, देरी होने पर अपने-आप मिलने वाला मुआवजा, हक छीनने वाली शर्तों को हटाना, और शिकायत निवारण के लिए अपील की सुविधा—ये सब मिलकर 'काम के अधिकार' की व्यावहारिक उपयोगिता को बढ़ाते हैं। अधिकार सबसे ज़्यादा तब मायने रखते हैं जब उनका प्रशासनिक बाधाओं के बिना इस्तेमाल किया जा सके।
यहां तक कि आलोचक भी मानते हैं कि योजना को लागू करने की विफलताएं—जैसे भ्रष्टाचार, फर्जी जॉब कार्ड, उपस्थिति रजिस्टर में हेरफेर और खराब गुणवत्ता वाली संपदाओं का निर्माण, पुराने फ्रेमवर्क की सबसे बड़ी कमजोरियां थीं। यह सुधार इन्हीं विफलताओं को दूर करने की कोशिश करता है, जिसके लिए सत्यापित लाभार्थी प्रणाली, मजबूत ऑडिट और अन्य योजनाओं के साथ मिलकर संपदा निर्माण का सहारा लिया गया है। पिछली विफलताओं को स्वीकार करना ही इस सुधार का ठोस आधार है, न कि इसके खिलाफ कोई तर्क।
योजना को कुछ समय के लिए रोकने को लेकर जो चिंताएं हैं, उन्हें सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह श्रम-बाजार के लिए एक सुरक्षा कवच है जिसे इसलिए बनाया गया है ताकि खेती के सबसे व्यस्त सीजन के दौरान श्रमिकों की कमी न हो और बाजार का संतुलन न बिगड़े। यह प्रावधान 125 दिनों के कानूनी अधिकार को कम नहीं करता है। यह प्रावधान सोची-समझी आर्थिक समझदारी को दिखाता है और उत्पादक कृषि रोज़गार को कमज़ोर किए बिना मजदूरों की आय की रक्षा करता है।
कुल मिलाकर, ज़्यादातर की जा रही आलोचनाएं पुराने फ्रेमवर्क की कमियों को बताती हैं और फिर उन कमियों का कारण खुद सुधारों को बताती हैं। विकसित भारत–रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम रोज़गार गारंटी को खत्म नहीं करता है बल्कि यह इसे और मजबूत और व्यापक बनाता है। खासकर उन कमज़ोरियों पर ध्यान देता है जहाँ ज़्यादा ज़रूरत वाले इलाकों और कमज़ोर मज़दूरों के बीच योजना के प्रभाव को सीमित कर दिया था। यहाँ सुधार का अर्थ सामाजिक सुरक्षा से पीछे हटना नहीं है; बल्कि यह काम के वादे को वास्तविक, भरोसेमंद और गरिमापूर्ण बनाने का एक प्रयास है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
