शासकीय बंगलों में कार्यालय या सत्ता का विशेषाधिकार? स्व. हेमचंद यादव के परिवार के कब्जे वाले आवास पर भी सवाल
दुर्ग// जिला मुख्यालय दुर्ग की सिविल लाइन और आसपास का इलाका अधिकारियों के लिए बनाए गए शासकीय आवासों के कारण जाना जाता है। दूसरे जिलों से पदस्थ होकर आने वाले अधिकारियों के लिए ये आवास प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन जब यही शासकीय आवास जनप्रतिनिधियों के कार्यालय अथवा ऐसे लोगों के कब्जे में दिखाई दें, जिनकी पात्रता पर सवाल उठ रहे हों, तो व्यवस्था और नियम दोनों पर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है।
सबसे ज्यादा चर्चा दुर्ग ग्रामीण विधायक ललित चंद्राकर को लेकर है। ग्रामीण क्षेत्र से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे विधायक का कार्यालय जिला मुख्यालय की सिविल लाइन स्थित शासकीय आवासीय परिसर में संचालित होना अब ग्रामीण क्षेत्र में भी चर्चा का विषय बनता जा रहा है। स्थानीय चर्चाओं में सवाल उठ रहा है कि जिस जनता ने ग्रामीण क्षेत्र से अपना प्रतिनिधि चुना, उसके बीच कार्यालय खोलने के बजाय शहरी क्षेत्र के शासकीय परिसर को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है?
बताया जा रहा है कि सिविल लाइन में लगभग तीन बंगलों के बड़े भूभाग को कार्यालय के रूप में उपयोग किए जाने की स्थिति बनी हुई है। यदि यह वास्तव में शासकीय आवासीय परिसरों का उपयोग है, तो बड़ा सवाल यह है कि क्या नियमों के तहत किसी विधायक को इस प्रकार शासकीय आवासीय संपत्ति का कार्यालय के लिए उपयोग करने की अनुमति है? यदि अनुमति है तो उसका आधार, अवधि और शर्तें क्या हैं? और यदि अनुमति नहीं है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
मामला केवल विधायक के कार्यालय तक सीमित नहीं है। जिला मुख्यालय में वर्षों से कुछ शासकीय आवास ऐसे भी बताए जाते हैं, जिनका आवंटन स्थानांतरित हो चुके अधिकारियों के नाम पर बना हुआ है। सवाल यह है कि जब कोई अधिकारी दूसरे जिले में पदस्थ हो चुका है, तो उसके नाम पर दुर्ग का शासकीय आवास कितने समय तक रखा जा सकता है? ऐसे आवास खाली नहीं होने से नए पदस्थ होने वाले अधिकारियों को किराए के मकान में रहने की मजबूरी क्यों आती है?
इसका उदाहरण नगर निगम के पूर्व आयुक्त के मामले से भी जुड़ता है, जिन्हें पदभार ग्रहण करने के बाद शुरुआती दौर में किराए के आवास का सहारा लेना पड़ा और बाद में प्रयासों के बाद शासकीय आवास उपलब्ध हो सका। अब नए अधिकारियों की पदस्थापना के साथ फिर वही स्थिति सामने आने की आशंका प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है।
इसी कड़ी में स्वर्गीय हेमचंद यादव को आवंटित शासकीय आवास को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि वर्षों बाद भी उक्त आवास उनके परिवार के उपयोग में है। यदि वर्तमान में परिवार का कोई सदस्य शासकीय आवास की पात्रता रखने वाले संवैधानिक अथवा विभागीय पद पर नहीं है, तो प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि आवास किस नियम और किस आदेश के आधार पर अब तक आवंटित है।
चार आवास खाली हों तो कितने अधिकारियों को मिल सकती है सुविधा?
यदि सिविल लाइन के ऐसे शासकीय आवास, जिनका उपयोग वर्तमान पात्र अधिकारियों के बजाय अन्य प्रयोजनों के लिए हो रहा है, नियमानुसार मुक्त कराए जाएं तो जिला मुख्यालय में पदस्थ कई वरिष्ठ अधिकारियों को आवास की सुविधा मिल सकती है। इससे अधिकारियों को किराए के मकान की तलाश से राहत मिलेगी और शासन द्वारा निर्मित आवासों का वास्तविक उद्देश्य भी पूरा होगा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि शासकीय आवास अधिकारियों के लिए हैं या सत्ता से जुड़े लोगों के प्रभाव के लिए?
चुनाव के दौरान जनता, व्यवस्था और सिद्धांतों की बात करने वाले जनप्रतिनिधियों से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि सत्ता में आने के बाद भी वे उन्हीं सिद्धांतों का पालन करें। ग्रामीण क्षेत्र से चुने गए प्रतिनिधि का जिला मुख्यालय के शासकीय परिसर में कार्यालय होना यदि नियमसम्मत है तो प्रशासन को आदेश सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यदि नियमसम्मत नहीं है तो कार्रवाई कौन करेगा?
ग्रामीण जनता के बीच अब यह सवाल भी उठने लगा है—विधायक ग्रामीण क्षेत्र से जीते हैं, लेकिन कार्यालय के लिए पसंद शहरी सिविल लाइन ही क्यों?
दुर्ग प्रशासन को अब शासकीय आवासों के आवंटन, कब्जे, पात्रता और वर्तमान उपयोग की निष्पक्ष समीक्षा कर स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि शासकीय संपत्ति का उपयोग नियमों के अनुसार हो रहा है या फिर सत्ता और प्रभाव के चलते नियमों की परिभाषा बदल रही है।