By- नरेश देवांगन
जगदलपुर, शौर्यपथ। सरकार आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए भरसक प्रयास कर रही है, योजनाएं बन रही हैं, बजट खर्च हो रहा है—लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ गैर-जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों की कार्यशैली इन प्रयासों पर सवाल खड़े करती दिख रही है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं मानो जनता का पैसा और सरकारी मंशा, दोनों ही कागज़ों में बेहतर और जमीन पर कमजोर पड़ रहे हों। सबसे चिंताजनक यह है कि जिन अधिकारियों को जिले में निरीक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है, उन्हें भी यह सब या तो दिखाई नहीं दे रहा, या फिर प्राथमिकता में नहीं है।
इसी क्रम में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र काकलूर से सामने आई जानकारियों ने व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर यह बात सामने आई है कि केंद्र में पदस्थ आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी द्वारा नियमित रूप से ड्यूटी का निर्वहन नहीं किया जा रहा है, जिससे मरीजों को निरंतर सेवाएं मिल पाना प्रभावित हो रहा है।
मामले को और गंभीर बनाते हुए विभागीय सूत्रों का दावा है कि संबंधित महिला चिकित्सा अधिकारी महीने में एक बार आ जाएं तो ही “बहुत” माना जाता है, जबकि कभी-कभार तो वे लंबे समय तक अनुपस्थित रहती हैं। सूत्र यह भी बताते हैं कि उनके पति—जो स्वयं अन्य स्थान पर पदस्थ बताए जाते हैं—सप्ताह में एक बार आकर उपस्थिति रजिस्टर, ओपीडी रजिस्टर सहित अन्य आवश्यक प्रविष्टियां भरते नजर आते हैं। यदि यह तथ्यात्मक रूप से सही है, तो यह व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सूत्रों के अनुसार, यह सब संभव होने के पीछे स्थानीय स्तर पर “संरक्षण” की चर्चा भी है, जिसमें विकासखंड चिकित्सा अधिकारी की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, यह पहलू जांच का विषय है और आधिकारिक पुष्टि के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकारी स्वास्थ्य संस्थान अब जिम्मेदारी से अधिक “व्यवस्था के भरोसे” चल रहे हैं? और क्या निगरानी तंत्र केवल कागज़ों तक सीमित रह गया है? यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन है, बल्कि आमजन के विश्वास के साथ भी गंभीर समझौता है।
अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं—क्या पारदर्शी जांच और कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगा।