कोंडागांव, शौर्यपथ। कल पूरे देश में शिक्षक दिवस बड़े ही धूमधाम से मनाया गया और बनाया भी जाना चाहिए क्योंकि शिक्षा ही इस देश का मूल आधार है शिक्षा के बिना जग अंधेरा है पर क्या आप किसी ने सोचा की हमारी शिक्षा व्यवस्था में कुछ शिक्षक ऐसे भी हैं जो बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, जिनको उस कुर्सी में बैठने के लिए और बच्चों की जीवन को बचाने व सुरक्षित करने के लिए सरकार उनके ऊपर 100000 ₹150000 का खर्चा कर रही है पर वो सोचते हैं पर जब बच्चों की को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने और उन्हें न्याय दिलाने की बात आती है तब ये अपना दरवाज़ा बंद कर लेते है। कभी बहाना करते हैं कि सीट फुल हो गया, तो कभी बहाना करते हैं कि आपका यह कागज नहीं है। वो ऐसा ही मामला ग्राम कोरोबेड़ा का है। यहां के बच्चो के सिर्फ माँ बाप नहीं होने का सजा इन्हें मिल रहा है और ये सजा, ये अपनी किस्मत से नहीं भोग रहे है हमारे शिक्षकों की वजह से भोग रहे हैं, कभी उन बच्चों को आधार कार्ड के कारण स्कूल से निकाल दिया गया जब आधार कार्ड बन गया तो जिला कलेक्टर के आदेश को नजरअंदाज करते हुए उन बच्चों को फिर से गाँव भेज दिया गया। गाँव के हॉस्टल में जब जाकर वह बोले कि इन्हें यहां रख के ही पढ़ाना है तो वहां के टीचर बोले कि हमारे पास सीट फूल हो गया है। आप अपने घर से पैदल आ जाओ, जो कि उनका घर 4 km दूर है टीचर को यह शब्द बोलने से पहले ये सोचना चाहिए कि यह सिर्फ दूर नहीं बीच में जंगल है, नदी है, नाले हैं। और बच्चों की उम्र मात्र 5 -6 साल है, यह घटना न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था पर आवाज़ उठाती है। ये घटना यह भी बताती है कि बिना माँ बाप के बच्चों का जीना इस समाज में इस देश में कितना मुश्किल है जहां इन्हें हर कदम पर यह एहसास दिलाया जाता है कि तुम्हारे लिए कोई नहीं है तुम अकेले हो यही दुनिया का सबसे बड़ा हकीकत है कि जहां पूरे समाज को पूरे प्रशासन को इनका परिवार बनके इनके लिए काम करना था वह इन्हें गली गली भटकने पर मजबूर कर दिया गया।
जिला कलक्टर ने कोशिश भी किया। आदेश भी किया पर जो जवाबदार अधिकारी है, उन्हें कोई मतलब नहीं सिर्फ उनके बच्चे अच्छे स्कूलों में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ लें, डॉ इंजीनियर कमिश्नर बन जाए।हमें गरीबों के बच्चों से क्या लेना है?इन्हें मानसिकता के साथ आज पुरा सिस्टम कार्य कर रहा है, यह मात्र सिर्फ दो बच्चों की कहानी नहीं है।यह उन तमाम जरूरतमंद, यह तमाम अनाथ तमाम गरीब और गरीबी से जूझ रहे उन बच्चों की कहानी है जो पढ़ना तो चाहते हैं, पर उन्हें मजबूर किया जाता है कि तुम्हारे लिए शिक्षा नहीं बनी है।और यही बच्चे जब शिक्षा से वंचित रह जाते हैं कोई गलत काम करते हैं नशा करते हैं या किसी और घटना को अंजाम दे देते हैं। तो यही प्रशासन अपने लाखों और करोड़ों की बिल्डिंग में बैठकर तक चर्चा करते हैं। ये हमारे क्षेत्र का हमारे जिले का लॉयन ऑर्डर कैसे बिगड़ रहा है कौन है यह है ये गुंडा कौन है यह नशेड़ी है, और उठाकर उसे जेल भेज दिया जाता है पर क्या उसकी आपबीती जानने का या उसे पहचानने का या किस कारण से आज उसका यह हालत हुई है इसके ऊपर कभी किसी ने सोचा है किसी ने चर्चा किया है इसका कारण भी यही समाज है यही प्रशासन है जब वो न समझ था तो स्कूल स्कूल घूम रहा था कि मुझे कोई पढ़ा लो उस समय कोई पढ़ाने वाला नही था और ना ही कोई सहारा देने वाला था हमें उन चीजों में भी विचार करना और सोचने की उतनी ही जरूरी है की हम प्रशासन के सबसे बड़े पद और प्रतिष्ठा में बैठकर। हमने उन नौजवान, वो अनाथ, उन गरीब जरूरतमंद बच्चों के लिए क्या किया है। कि आज वो बर्बादी के सबसे ऊंचे पायदान पर पहुंच गये। वो नहीं पहुंचे, उन्हें हमारे सिस्टम ने हमारे समाज भी उतना ही जिम्मेदार है जितना उस बच्चे की मजबूरी जिम्मेदार थी ये हम सभी के लिए प्रश्नवाचक चिन्ह है।क्या हमने अपने समाज के लिए अपने बच्चों के लिए क्या किया है?