दुर्ग / शौर्यपथ / दुर्ग निगम में शहरी सरकार में कांग्रेस का 20 सालो बाद कब्ज़ा हुआ है किन्तु 20 सालो के वन्सान के बाद सत्ता में वापसी के बाद भी शहरी सरकार दो फाड़ नजर आ रही है . शहरी सरकार के दो प्रमुख जनप्रतिनिधि महापौर और सभापति का गुट अब आम जनता को भी दो फाड़ नजर आ रहा है . कहने को तो कांग्रेस के पास ३० पार्षद है वही निर्दलीय पार्षदों और भाजपा पार्षदों की संख्या १६-१४ के करीब है . कई निर्दलीय पार्षद कांग्रेस समर्थित है तो कई निर्दलीय पार्षद सहित भाजपा पार्षद सांसद विजय बघेल के गुट से जुड़े हुए है . वही कांग्रेस समर्थित पार्षदों में भी दो गुट अब आमने सामने हो गए है . एक गुट सभापति राजेश यादव के समर्थन में नजर आ रहा है तो दूसरा गुट महापौर धीरज बाकलीवाल के समर्थन में नजर आ रहा है . वर्तमान समय में धीरज बाकलीवाल का चयन कर विधायक अरुण वोरा के द्वारा एक उचित फैसला ही प्रतीत होता है . महापौर के रूप में धीरज बाकलीवाल कांग्रेस पार्षदों सहित विपक्षी पार्षदों की सम्स्याओ को दूर करने का भरपूर प्रयास करते है एवं सभी की बातो को सुनते हुए शहरी सरकार चलाने की कोशिश रहती है किन्तु विधायक वोरा के कट्टर समर्थक की टीम में शामिल एल्डरमेन राजेश शर्मा , अंशुल पाण्डेय , आयुष शर्मा ,महिला जिलाध्यक्ष श्रीमती कन्या ढीमर , जिला अध्यक्ष गया पटेल की निष्क्रियता एवं निगम के कार्यो में पक्षपाती ,दखलंदाजी , निविदा लेने की होड़ जैसे कारणों के कारण कई कांग्रेसी महापौर से ज्यादा विधायक से नाराज नजर आते है और कई बार सोशल मिडिया में भी अपनी बात परोक्ष / अपरोक्ष रूप से दर्शा भी चुके है .
इन सबके बावजूद महापौर द्वारा सभी को साथ लेकर चलने की भरसक कोशिश के कारण शहरी सरकार में अभी तक स्थिरता है . महापौर के इसी प्रयास का नतीजा है कि विपक्ष और निर्दलीय तथा परदे के पीछे से शामिल कांग्रेसी पार्षदों का अविश्वास प्रस्ताव लाने की योजना भी ठन्डे बसते में चली गयी .
वैसे भी यह चर्चा आम है कि विपक्षी भाजपा के पास उतना जनाधार नहीं कि वो अविश्वास प्रस्ताव की तरफ मजबूती से आगे बढ़ कर दुर्ग में पार्टी की डूबती साख को और नुक्सान पहुंचाए . कमजोर विपक्ष , भीतरीघात के बावजूद वर्तमान स्थिति में महापौर बाकलीवाल से बेहतर दावेदार न तो सत्ता पक्ष के पास कोई है और ना ही विपक्ष एवं निर्दलीय पार्षदों के पास . ऐसे में यह कहना सर्वोचित होगा कि तमाम गतिरोध के बाद भाजपा-कांग्रेस में दो गुटों में विभाजन के बाद भी दुर्ग निगम की शहरी सरकार को कोई खतरा नहीं है . किन्तु जिस तरह से दुर्ग कांग्रेस में आपसी विरोध का मंजर है उससे विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को नुक्सान उठाना पड़ सकता है .