दुर्ग / शौर्यपथ / 13 मई २०२५
एक तरफ दुर्ग नगर पालिक निगम के महापौर श्रीमती अलका वाघमार शहर के यातायात के दबाव को कम करने और सुव्यवस्थित स्थित शहर बनाने की दिशा में सड़क किनारे छोटे-छोटे दुकानदारों के अवैध अतिक्रमण को हटाने के निर्देश जारी कर चुकी है वहीं निगम प्रशासन भी अतिक्रमण के विरुद्ध लगातार कार्यवाही कर रहा है किंतु यह कार्रवाई दुर्ग बस स्टैंड पर कहीं नजर नहीं आती जहां निगम के परिसर के बरामदो पर अवैध रूप से दुकानों का संचालन किया जा रहा है वहीं पूर्व की कांग्रेस सरकार के परिषद के अंतिम बैठक में शहर के सबसे बड़े उद्योगपति चतुर्भुज राठी के संरक्षक में बनी राम रसोई संस्था को जगह की कमी होने के बावजूद भी बस स्टैंड में काफी बड़ी जगह दे दी गई.
आश्चर्य की बात यह है की अंतिम बैठक के तुरंत बाद एक ही दिन में बाजार विभाग ने अनुबंध की प्रक्रिया भी पूर्ण कर ली शहर की जनता में चर्चा इस बात पर भी है कि जो विभाग छोटे-छोटे कार्यों को करने के लिए महीनो लगा देता है वही एक ही दिन में संस्था के साथ अनुबंध कैसे हो गया . वहीं कुछ जानकारी का मानना है कि नगर निगम किसी भी अपंजीकृत संस्था के साथ अनुबंध नहीं कर सकता बावजूद इसके राम रसोई नामक संस्था के साथ आखिरकार अनुबंध कैसे हो गया,शहर में यह भी चर्चा है कि राम रसोई के संरक्षक शहर के बड़े उद्योगपति चतुर्भुज राठी भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं और शायद यही कारण है कि शहर में भाजपा की सरकार के अस्तित्व में आने के बाद महापौर श्रीमती अलका बाघमार पुरानी सरकार के कई फसलों पर रोक लगा दी व कई फैसला रद्द कर दिए निविदाये रद्द कर दी किंतु सिर्फ राम रसोई के साथ हुए अनुबंध की तरफ कोई चर्चा नहीं की.
वहीं राम रसोई के अनुबंध के चार महीने बाद बड़े ताम झाम के साथ 7 मई को उद्घाटन हो गया मात्र 2 घंटे के भोजन व्यवस्था के लिए उद्घाटन के समय बड़े-बड़े टेंट लगाए गए आज भीड़ और यातायात के दबाव वाले बस स्टैंड में हफ्ता गुजर जाने के बाद भी टेंट नहीं हटने से वाहनों के आने-जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है वही निगम परिसर के एक गली में आने जाने के लिए मार्ग लगभग बंद हो गया है किंतु बस स्टैंड के छोटे-छोटे व्यापारी अब दबी जुबान में खाने वालों की शहर के धनवान व्यक्ति हैं और भाजपा के नेता इसलिए कुछ कहा भी नहीं जा सकता.
वही निगम प्रशासन भी हफ्ता भर गुजर जाने के बाद भी लगे टेंट पर किसी प्रकार का संज्ञान ना ले कर कहीं ना कहीं खुद को सवालों के घेरे में खड़ी कर रही है धीरे-धीरे अब शहर में चर्चा भी होने लगी कि आखिर किस नियम के तहत अपंजीकृत संस्था के साथ निगम प्रशासन ने अनुबंध कर लिया बरहाल हफ्ता भर गुजर जाने के बाद भी टेंट अपनी जगह है और आम जनता की परेशानी अपनी जगह जिस पर ना निगम प्रशासन संज्ञान ले रही है ना संस्था के सदस्य और जनता चुपचाप मौन होकर बेबस होकर यह सब देख रही है क्या यही साय सरकार का सुशासन है और क्या यही सुशासन तिहार का समय ?