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अतिक्रमण पर आयुक्त सुमित अग्रवाल का ‘सेलेक्टिव न्याय’— Featured

  • devendra yadav birth day

गरीबों पर बुलडोजर, अमीरों पर खामोशी… क्या रिमोट कंट्रोल से चल रहा?

दुर्ग। शौर्यपथ।

दुर्ग नगर पालिक निगम की शहरी सरकार इन दिनों अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर जनता की कठघरे में है। गरीबों की गुमटियों पर बुलडोजर और धनवानों के कब्जों पर सन्नाटा—यह दोहरा रवैया अब शहर की चर्चा बन चुका है।

आरोप सीधे निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल के दरवाज़े पर दस्तक दे रहे हैं, जिनकी कार्यशैली को लेकर लोग सवाल उठा रहे हैं—

“क्या आयुक्त भी रिमोट कंट्रोल से संचालित हो रहे हैं?”

 

इंदिरा मार्केट से फूल चौक तक—अमीरों का अतिक्रमण दिखता ही नहीं!

इंदिरा मार्केट में बड़े व्यापारियों द्वारा किए गए खुले कब्जे सबके सामने हैं।

गणेश मंदिर के सामने होटल संचालक ने सड़क पर कब्जे की दीवार खड़ी कर दी है, जिससे राहगीरों को भारी दिक्कतें हो रही हैं।

परंतु निगम का बुलडोजर उस दिशा में शायद GPS ही नहीं पकड़ता।

फूल चौक स्थित ओम ज्वैलर्स ने दुकान से आगे बरामदा, और बरामदे से आगे सड़क तक बैरिकेड लगाकर खुद का “प्राइवेट कॉरिडोर” बना लिया है।

यातायात बाधित, बाजार अस्त-व्यस्त—पर कार्रवाई शून्य।

स्थानीय दुकानदार भी तंज कसते हुए कहते हैं—

“यहाँ कब्जा हटता नहीं, बल्कि रेगुलराइज़ हो जाता है… बशर्ते आप अमीर हों।”

 

गरीबों की गुमटियों पर बुलडोजर—पर बड़े कब्जों पर चुप्पी क्यों?

शहर की जनता यह सवाल इसलिए उठा रही है क्योंकि गरीबों की छोटी गुमटियां हटाने में निगम प्रशासन ताबड़तोड़ एक्टिव हो जाता है।

लेकिन जब बात इंदिरा मार्केट और प्रमुख व्यापारियों की आती है, तो आयुक्त सुमित अग्रवाल का रुख अचानक “मौन मोड” में चला जाता है।

 

लोगों के बीच यह चर्चा भी तैर रही है—

“क्या पर्दे के पीछे कोई बड़ा सौदा अटका है?”

“या फिर शहरी सरकार ने धनवानों के आगे घुटने टेक दिए हैं?”

 

चुनावी वादों की पोल—जनप्रतिनिधि गायब और प्रशासन निष्क्रिय

शहरी सरकार ने चुनाव के समय बाज़ारों की व्यवस्था सुधारने के बड़े-बड़े वादे किए थे।

मगर अब हालात यह हैं कि—

ना जनप्रतिनिधि मैदान में दिखाई दे रहे

ना प्रशासन फैसले ले रहा

और ना शहर को किसी सुधार की उम्मीद बची है

स्थानीय व्यापारियों का कटाक्ष—

“जनप्रतिनिधि तो चुनावी मोड से बाहर आ गए, पर आयुक्त भी अब सिर्फ समय काटने में लगे हैं।”

बड़ा सवाल—आयुक्त संवैधानिक शक्तियां रखते हुए भी चुप क्यों?

एक पक्ष कहता है कि आयुक्त सुमित अग्रवाल धनवानों के प्रभाव में हैं।

दूसरा पक्ष मानता है कि आयुक्त की कार्रवाई किसी ‘अनदेखे रिमोट कंट्रोल’ के इशारों पर निर्भर है।

पर सत्य यह है कि—

अतिक्रमण के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का अभाव सीधे-सीधे शहर की व्यवस्था को गर्त में धकेल रहा है।

 तीखा सवाल:

“क्या दुर्ग नगर निगम का संचालन कानून से चल रहा है या फिर रिमोट कंट्रोल से?”**

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