दुर्ग / शौर्यपथ /
ग्राम पंचायत अंजोरा (ख) में विकास कार्यों की रफ्तार शायद इतनी ‘तेज’ थी कि पेवर ब्लॉक की सामग्री रास्ता ही भटक गई। ₹56,000 की प्रथम किस्त तो समय पर निकल गई, मगर सामग्री गाँव पहुँचने में पूरा एक साल लगा—वह भी केवल तब, जब वर्तमान सरपंच संतोष सारथी ने शिकायत कर इसकी खोजबीन शुरू की। मानो पेवर ब्लॉक नहीं, कोई लापता व्यक्ति हो!
वर्तमान सरपंच ने पूर्व सरपंच संगीता साहू और पूर्व सचिव तामलेश्वरी देवांगन पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि सार्वजनिक धन का दुरुपयोग हुआ, हिसाब-किताब में गोलमाल कर पंचायत को अंधेरे में रखा गया, और विकास कार्यों को ‘व्यक्तिगत लाभ’ का साधन समझ लिया गया।
कलेक्टर के पास शिकायत पहुँचते ही जिला पंचायत ने जांच टीम गठित की, और जैसे ही परतें खुलीं—वैसे-वैसे अनियमितताओं की कहानी लंबी होती चली गई। जांच में गड़बड़ियां साबित होते ही कार्यों पर तत्काल रोक लगा दी गई।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि पहले तो सामग्री वर्षों तक ‘गायब’ रही, लेकिन शिकायत के बाद जैसे ही मामला गर्माया—सामग्री चमत्कारिक रूप से आ पहुँची। यह बताते हुए ग्रामीण मुस्कुराए बिना नहीं रह सके कि “अगर शिकायत नहीं होती, तो शायद पेवर ब्लॉक आज भी गुमशुदगी की रिपोर्ट में ही दर्ज रहता।”
मामला छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम की धारा 40, 49 और 92 का खुला उल्लंघन माना जा रहा है। वर्तमान सरपंच ने मांग की है कि:
पूर्व सरपंच-सचिव पर विभागीय एवं आपराधिक कार्रवाई हो,
गलत भुगतान की रकम ब्याज सहित वसूली जाए,
गड़बड़ी करने वाले जनप्रतिनिधियों को आगे किसी भी एजेंसी कार्य से प्रतिबंधित किया जाए।
ग्रामीणों में आपसी चर्चा है कि इस पुरे प्रकरण पर अगर वर्तमान सरपंच समय पर संज्ञान न लेते, तो न सिर्फ सामग्री, बल्कि जिम्मेदार अधिकारी भी ‘गायब’ ही माने जाते।
अंजोरा पंचायत में विकास कार्यों की यह कहानी एक कटु सच उजागर करती है—पैसा समय पर निकलता है, बस विकास कार्य देर से पहुँचते हैं… वह भी तब, जब कोई शिकायत कर दे!