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आरोप लगाना आसान, फैसला कठिन—अब राम रसोई पर MIC की कसौटी, जनता के हित या रसूख के आगे झुकेगी शहरी सरकार? Featured

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दुर्ग। शौर्यपथ विशेष रिपोर्ट ।

    पूर्व महापौर पर नियम विरुद्ध आवंटन और अनियमितताओं के आरोप लगाने वाली वर्तमान महापौर श्रीमती अलका बाघमार के सामने अब वही मामला निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। बस स्टैंड जैसे अति-व्यस्त और बेशकीमती इलाके में संचालित राम रसोई का एक वर्ष का अस्थायी अनुबंध समाप्त हुए लगभग तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन न तो संस्था पर कोई कार्रवाई हुई और न ही अवैध कब्जों को हटाया गया। विभागीय जानकारी अनुसार अब राम रसोई के संचालकों द्वारा पुनः समय-सीमा बढ़ाने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर दिया गया है, जिस पर अंतिम निर्णय नगर निगम की MIC (मेयर इन काउंसिल) को लेना है।

   गौरतलब है कि जिस राम रसोई को पूर्व कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में बिना पंजीकरण संस्था को अस्थायी स्थान दिया गया था, उसी अनियमितता के लिए वर्तमान महापौर ने पूर्व महापौर को सार्वजनिक रूप से जिम्मेदार ठहराया था। लेकिन आज जब अनुबंध खत्म हो चुका है और नियमों के उल्लंघन के बावजूद संस्था का संचालन जारी रहा, तब बाजार विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। नियमों के अनुसार केवल पंजीकृत संस्थाओं को ही इस प्रकार की सुविधा दी जा सकती है, बावजूद इसके न तो समय पर कार्रवाई हुई और न ही अवैध अतिक्रमण हटाए गए।   

    स्थिति यह है कि राम रसोई की आड़ में बस स्टैंड की लगभग उतनी ही अतिरिक्त जमीन पर अन्य लोगों द्वारा कब्जा कर लिया गया है, जिससे यातायात दबाव, पार्किंग अव्यवस्था और आम नागरिकों की परेशानी बढ़ती जा रही है। इतना ही नहीं, गणेश मंदिर के सामने सड़क पर कथित रूप से किए गए अवैध निर्माण ने एक पुराने मंदिर को पूरी तरह ढक दिया है, लेकिन इस पर भी निगम प्रशासन सहित धर्म के रक्षक भी मौन है जो कही ना कही धनवानों के आगे नतमस्तक नजर आ रहे है की चुप्पी सवालों के घेरे में है।

    राजनीतिक और नैतिक प्रश्न तब और गहरे हो जाते हैं जब राम रसोई के संचालक(संरक्षक) चतुर्भुज राठी और शहरी सरकार की मुखिया श्रीमती अलका बाघमार का एक साथ मंच साझा करना सामने आता है। इससे यह संकेत मिलता है कि जिन अनियमितताओं पर पहले आरोप लगाए गए, उन्हीं मामलों में अब शहरी सरकार असहज या बेबस नजर आ रही है।
अब गेंद पूरी तरह MIC के पाले में है। परिषद के 12 सदस्य, जिन्हें शहरी सरकार के ‘मंत्री’ कहा जाता है, यह तय करेंगे कि क्या शासन के नियमों के विरुद्ध एक गैर-पंजीकृत संस्था को फिर से बस स्टैंड जैसी कीमती जमीन मुफ्त या रियायती रूप में दी जाएगी, या फिर जनहित, यातायात व्यवस्था और नियमों की मर्यादा को प्राथमिकता दी जाएगी।

   पुरानी सरकार पर आरोप लगाना आसान था, लेकिन अब जब फैसला वर्तमान शहरी सरकार के हाथ में है, तो जनता यह देखना चाहती है कि क्या महापौर और MIC जनहित में कठोर निर्णय लेंगे या फिर पूर्व सरकार की कथित गलतियों को दोहराते हुए हर चूक का ठीकरा एक बार फिर अतीत पर फोड़ा जाएगा।

परिषद की बैठक न सिर्फ राम रसोई के भविष्य का, बल्कि शहरी सरकार की नीयत और नीति का भी आईना साबित होगी।

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शौर्यपथ