Print this page

नफरत की नींव या निष्पक्षता की कसौटी? अतिक्रमण के नाम पर भेदभाव और 'लोकप्रियता" के पोस्टर बनाम जमीनी सच्चाई Featured

  • Ad Content 1

दुर्ग / शौर्यपथ विशेष
31 जनवरी को महापौर श्रीमती अलका बाघमार का जन्मदिन शहर में बड़े पैमाने पर पोस्टर-बैनरों के साथ मनाया गया। इन पोस्टरों में दुर्ग को "बुलडोजर की सरकार" वाला शहर बताया गया, अतिक्रमण पर सख्त कार्रवाई के दावे किए गए और महापौर को "विकास की वीरांगना" के रूप में प्रस्तुत किया गया। बधाइयों और प्रशंसा के इस शोर-शराबे के बीच यह संदेश देने की कोशिश की गई कि शहर की बड़ी समस्याओं का समाधान हो चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग तस्वीर पेश करती है।

पोस्टर बनाम जमीनी सच्चाई
शहर की आम जनता, जो रोज़ जाम, अव्यवस्था और असमान कार्रवाई का सामना करती है, उसके लिए पोस्टरों में दिखाई जा रही कहानी वास्तविकता से मेल नहीं खाती। सवाल यह है कि क्या अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई वास्तव में निष्पक्ष और समान है, या फिर यह सिर्फ चुनिंदा इलाकों और वर्गों तक सीमित होकर लोकप्रियता का माध्यम बन गई है।

कपड़ा लाइन और कुआं चौक: 10 मीटर की दूरी, नीति में भारी अंतर
कपड़ा लाइन क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को महापौर के सशक्त नेतृत्व का उदाहरण बताया जा रहा है। यह भी तथ्य है कि लगभग आठ महीने की लगातार कोशिशों के बाद वहाँ कार्रवाई सफल हो पाई। लेकिन इस कार्रवाई को जिस तरह एक विशेष समुदाय से जोड़कर प्रस्तुत किया गया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए।
वहीं, कपड़ा लाइन से मात्र 10 मीटर दूर स्थित कुआं चौक पर स्थिति बिल्कुल विपरीत नजर आती है। वहाँ ठेले, गुमठियाँ, चाट-फल की दुकानें और खुलेआम चौक के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा दिखाई देता है, जिससे यातायात पूरी तरह बाधित रहता है, फिर भी वहाँ कार्रवाई नाममात्र की क्यों रह जाती है, यह सवाल जनता के मन में लगातार बना हुआ है।

शुल्क लेकर लौट आना: कार्रवाई या समझौता?
सूत्रों और प्रत्यक्ष स्थिति के अनुसार, कुआं चौक क्षेत्र में निगम का अतिक्रमण अमला कुछ रस्मी शुल्क वसूलकर औपचारिकता निभाता है और फिर लौट आता है। यदि यही सच्चाई है, तो यह गंभीर सवाल खड़े करता है कि क्या कानून सबके लिए समान है, या फिर कार्रवाई का पैमाना नाम, पहचान और नज़दीकी के आधार पर तय हो रहा है।

संवादहीनता पर उठते सवाल
महापौर स्वयं को संवेदनशील नेतृत्व और परिवार की मुखिया के रूप में प्रस्तुत करती हैं, लेकिन कपड़ा लाइन में आठ महीनों तक चली कार्रवाई के दौरान व्यापारियों, सड़क पर व्यवसाय कर रहे परिवारों और यातायात व रोज़ी-रोटी के संतुलन को लेकर कोई प्रत्यक्ष संवाद या समझाइश सामने नहीं आई। यह संवादहीनता प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करती है।

भेदभाव से उपजता अविश्वास
जब एक ही सड़क और एक ही समस्या पर कहीं कठोरता और कहीं संरक्षण दिखाई देता है, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं रह जाती, बल्कि समाज में अविश्वास और नफरत का संदेश देती है। ऐसी स्थिति शहर की सामाजिक एकता और प्रशासन पर भरोसे को कमजोर करती है।

लोकप्रियता पोस्टरों से नहीं, न्याय से बनती है
आज जिन लोगों को संरक्षण या मंच मिल रहा है, उन्हें यह नीति भले ही अच्छी लगे, लेकिन आम जनता सब कुछ देख और समझ रही है। शायद यही वह समय है जब महापौर को अपने शपथ ग्रहण के शब्द—"बिना भेदभाव के कार्यवाही"—को व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है।

अगला जन्मदिन: पोस्टरों से नहीं, विश्वास से
शहर की जनता यह नहीं चाहती कि हर जन्मदिन पोस्टरों और अतिशयोक्ति से भरा हो। जनता की अपेक्षा है कि कार्रवाई निष्पक्ष हो, नियम सबके लिए एक हों और नेतृत्व स्वयं उदाहरण बने। ताकि अगले जन्मदिन पर महापौर को पोस्टरों की नहीं, बल्कि जनता की सच्ची शुभकामनाएँ मिलें—एक ऐसी विकास की वीरांगना के रूप में, जो सच में अवैध अतिक्रमण के खिलाफ बिना भेदभाव खड़ी हो।
अब फैसला महापौर की सोच और कार्यप्रणाली पर है, और पूरा शहर इस फैसले का इंतज़ार कर रहा है।

Rate this item
(0 votes)
शौर्यपथ