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“प्रेस क्लब या निजी साम्राज्य? दुर्ग में पत्रकारिता के नाम पर चल रही खींचतान” Featured

  • rounak group

चंद लोगों की एकाधिकार मानसिकता से बढ़ रहा आंतरिक द्वंद, जमीनी पत्रकारों में असंतोष

दुर्ग। शौर्यपथ।

लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है। समाज में पत्रकारों को केवल सूचना देने वाला माध्यम नहीं बल्कि एक जिम्मेदार और बुद्धिजीवी वर्ग के रूप में देखा जाता है, जो सत्ता, समाज और व्यवस्था को आईना दिखाने का कार्य करता है। परंतु जब स्वयं पत्रकारिता का मंच ही आंतरिक विवाद, एकाधिकार और गुटबाजी का शिकार हो जाए, तब यह स्थिति न केवल पत्रकारों के लिए बल्कि लोकतंत्र के लिए भी चिंता का विषय बन जाती है।

दुर्ग शहर का प्रेस क्लब प्रदेश के पुराने प्रेस क्लबों में गिना जाता है, लेकिन इन दिनों इसकी कार्यप्रणाली को लेकर पत्रकारों के बीच कई तरह की चर्चाएं और असंतोष सामने आ रहे हैं। आरोप यह भी है कि प्रेस क्लब का संचालन एक लोकतांत्रिक संस्था के रूप में नहीं बल्कि कुछ चुनिंदा लोगों की मर्जी से होता हुआ दिखाई देता है। यही कारण है कि कई पत्रकार स्वयं को इस व्यवस्था से उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

प्रेस क्लब में पहले भी हो चुकी है टूट

दुर्ग के पत्रकार जगत में यह कोई नई स्थिति नहीं है। कुछ वर्षों पहले भी मतभेद इतने बढ़ गए थे कि प्रेस क्लब दो हिस्सों में बंट गया था। समय के साथ स्थिति सामान्य होने की उम्मीद थी, लेकिन अब फिर से वैसी ही परिस्थितियां बनती दिखाई दे रही हैं।

हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि एक नए प्रेस क्लब के गठन की चर्चा भी सामने आ चुकी है। इतना ही नहीं, नए समूह को कमजोर करने या उसे तोड़ने के प्रयासों की बातें भी पत्रकारों के बीच चर्चा का विषय बन रही हैं।

अपनी लाइन बड़ी करने के बजाय दूसरे की छोटी करने की होड़

कहावत है कि आगे बढ़ने के लिए अपनी लाइन बड़ी करनी चाहिए, लेकिन दुर्ग के पत्रकार जगत में स्थिति इसके विपरीत नजर आती है। यहां आगे बढ़ने की बजाय दूसरे की पहचान और अवसर को छोटा करने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई दे रही है।

कई युवा और जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का कहना है कि इस मानसिकता के कारण उन्हें अपनी पहचान बनाने और आगे बढ़ने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

चुनाव प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में

प्रदेश के अधिकांश प्रेस क्लबों में नियमित चुनाव होते हैं और उनकी चर्चा पत्रकारों के बीच खुलकर होती है। छोटे कस्बों में भी प्रेस क्लब चुनाव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में दिखाई देते हैं।

लेकिन दुर्ग प्रेस क्लब के संबंध में कई पत्रकारों का कहना है कि यहां चुनाव तो होते हैं, पर इतनी “शांतिपूर्ण” तरीके से कि अधिकांश पत्रकारों को इसकी जानकारी तक नहीं हो पाती। यह स्थिति भी पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े करती है।

चाटुकारिता बनाम काबिलियत

पत्रकारों के बीच यह चर्चा भी आम है कि नियम-कायदे और सदस्यता से जुड़े निर्णय कुछ लोगों की पसंद-नापसंद पर आधारित दिखाई देते हैं। कई ऐसे लोग भी प्रेस क्लब से जुड़े बताए जाते हैं जो सक्रिय पत्रकारिता से दूर हैं, लेकिन सुविधाओं का लाभ लेने में आगे रहते हैं।

कुछ मामलों में यह भी आरोप सामने आते हैं कि अपने स्वयं के प्रकाशन होने के बावजूद दूसरे मीडिया संस्थानों से जुड़ाव दिखाकर सदस्यता बनाए रखने की प्रवृत्ति भी देखी जा रही है।

भिलाई का उदाहरण, दुर्ग में अलग तस्वीर

दुर्ग जिला मुख्यालय के समीप भिलाई शहर में प्रेस क्लब की पहचान प्रदेश स्तर पर एक संगठित और सक्रिय संस्था के रूप में देखी जाती है। वहां पत्रकारों के बीच सामूहिकता और संवाद का माहौल दिखाई देता है।

इसके विपरीत दुर्ग के पत्रकार जगत में लगातार बढ़ती दूरी और गुटबाजी की चर्चा चिंता का विषय बनती जा रही है।

सम्मान से तिरस्कार तक का सफर

एक समय था जब दुर्ग के वरिष्ठ पत्रकारों का सम्मान न केवल पत्रकारों के बीच बल्कि समाज और राजनीतिक क्षेत्र में भी अत्यंत ऊंचा था। लेकिन बदलते समय के साथ अब कुछ वरिष्ठ पत्रकारों के प्रति असंतोष की भावना भी सामने आने लगी है।

कई लोग खुलकर तो नहीं बोलते, लेकिन दबे स्वर में यह जरूर कहते हैं कि वरिष्ठता का अर्थ मार्गदर्शन होना चाहिए, न कि एकाधिकार।

सभी पत्रकार एक जैसे नहीं

यह भी सच है कि दुर्ग के पत्रकार जगत में आज भी अनेक ऐसे पत्रकार हैं जिनकी ईमानदारी, जमीनी रिपोर्टिंग और निष्पक्ष लेखन के कारण समाज में सम्मान है। उनके काम की सराहना भी होती है और उन्हें आदर्श के रूप में देखा जाता है।

लेकिन कुछ विवादित प्रवृत्तियों के कारण पूरी बिरादरी की छवि प्रभावित होती है। जैसा कि कहा जाता है — एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है।

जमीनी पत्रकारों की चिंता

दुर्ग शहर में सक्रिय पत्रकारों की संख्या सैकड़ों में है। इसका प्रमाण यह भी है कि शासन-प्रशासन और राजनीतिक दल अपनी प्रेस विज्ञप्तियां सभी पत्रकारों को भेजते हैं।इसके बावजूद यदि कुछ लोग खुद को ही प्रतिनिधि मानने का दावा करें तो यह स्थिति जमीनी स्तर पर काम कर रहे पत्रकारों के लिए निराशाजनक बन जाती है।

प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती 

शासन प्रशासन द्वारा पत्रकारिता से जुड़े पत्रकारों के लिए कई सुविधाएं भी समय समय पर प्रदान की जाती हैं ऐसे में भविष्य में कुछ ऐसा होगा तो अन्य पत्रकारों द्वारा भी सुविधाओं का दावा किया जाएगा ऐसे में प्रशासन के सामने किसे सुविधा दे किसे नहीं यह फैसला लेना मुश्किल होगा हो सकता है सुविधाओं को ही ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए क्योंकि एक पक्ष के लिए फैसला लेना प्रशासन की नजर में भी अनुचित होगा जिसका नुकसान जमीनी स्तर से जुड़े सभी पत्रकारों को हो तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी 

भविष्य के लिए चेतावनी

फिलहाल यह विवाद सांकेतिक रूप में ही दिखाई दे रहा है, लेकिन यदि समय रहते संवाद और पारदर्शिता का रास्ता नहीं अपनाया गया तो यह खुला संघर्ष भी बन सकता है।

और यदि ऐसा हुआ तो इसका सबसे बड़ा नुकसान पत्रकारिता की साख और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की गरिमा को होगा।

नोट: लेख दुर्ग के पत्रकारों की स्थिति के अनुसार, समाचार पत्र किसी भी क्लब और संस्था से परोक्ष/अपरोक्ष रुप संबंधित नहीं है 

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