दुर्ग | विशेष रिपोर्ट
शहर के सबसे व्यस्त व्यावसायिक केंद्र इंदिरा मार्केट में इन दिनों अतिक्रमण को लेकर दोहरी नीति का आरोप तेज होता जा रहा है। एक ओर नगर निगम छोटे ठेले-खोमचे वालों पर कार्रवाई कर “शहर को व्यवस्थित” करने का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर ओम ज्वैलर्स द्वारा कथित रूप से किए गए खुलेआम अतिक्रमण ने शहरी सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बरामदा जनता के लिए, कब्जा ज्वैलर्स के लिए?
नगर निगम परिसर में बनाए गए बरामदे का उद्देश्य आम जनता की आवाजाही को सुगम बनाना था, लेकिन आरोप है कि ओम ज्वैलर्स ने इस सार्वजनिक स्थान पर अवैधानिक कब्जा कर लिया है। इतना ही नहीं, दुकान के बाहर सड़कों तक सुरक्षा कर्मियों की बैठकों के जरिए 5 से 10 फीट तक सड़क घेर लेने की बात सामने आ रही है।
यह स्थिति न केवल यातायात और आम लोगों की सुविधा को प्रभावित कर रही है, बल्कि नगर निगम के नियमों की खुली अवहेलना भी प्रतीत होती है।
“कार्रवाई गरीबों पर, खामोशी अमीरों पर?”
स्थानीय व्यापारियों और नागरिकों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि
छोटे दुकानदारों पर चालानी कार्रवाई तुरंत होती है
लेकिन बड़े प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई “फाइलों” में ही अटक जाती है
महापौर श्रीमती अलका बाघमार की कार्यशैली को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या अतिक्रमण हटाने की नीति में आर्थिक हैसियत के आधार पर भेदभाव किया जा रहा है?
वायरल वीडियो और ‘घमंड’ का आरोप
हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें कथित रूप से ओम ज्वैलर्स के संचालक द्वारा मीडिया पर टिप्पणी की गई कि “विज्ञापन नहीं मिलने पर खबरें चलाई जा रही हैं।”
इस बयान के बाद यह धारणा और मजबूत हुई है कि पैसे के प्रभाव का खुला प्रदर्शन किया जा रहा है।
प्रशासन की जानकारी के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं?
मीडिया रिपोर्ट्स और प्रशासनिक चर्चाओं से यह संकेत मिल रहा है कि संबंधित विभाग को इस अतिक्रमण की जानकारी है, इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई न होना कई सवाल खड़े करता है:
क्या नियम सिर्फ कमजोरों के लिए हैं?
क्या प्रभावशाली लोगों को “छूट” मिल रही है?
या फिर पर्दे के पीछे कोई और खेल चल रहा है?
बाजार की अव्यवस्था या बहाना?
ओम ज्वैलर्स द्वारा बाजार की अव्यवस्था को मुद्दा बनाकर अपने कब्जे को सही ठहराने की कोशिश भी चर्चा में है। लेकिन सवाल यह है कि
क्या अव्यवस्था के नाम पर नियमों का उल्लंघन जायज हो जाता है?
जनता पूछ रही है—क्या सब बराबर हैं?
महापौर अलका बाघमार ने शपथ के समय बिना भेदभाव के कार्य करने का वादा किया था, लेकिन एक साल बाद जमीनी हकीकत को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि:
क्या नगर निगम ओम ज्वैलर्स पर कार्रवाई करेगा?
क्या अतिक्रमण विभाग “बड़े नामों” तक पहुंचेगा?
या फिर कार्रवाई का दायरा सिर्फ गरीबों तक ही सीमित रहेगा?
निष्कर्ष:
इंदिरा मार्केट का यह मामला केवल अतिक्रमण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता की परीक्षा बन चुका है।
अब देखना यह है कि
अलका बाघमार “समान कानून” की मिसाल पेश करती हैं या ओम ज्वैलर्स का कब्जा यूं ही शहर की व्यवस्था पर सवाल बनकर खड़ा रहेगा।