दुर्ग। नगर पालिक निगम दुर्ग के वार्ड नंबर 38, मिलपारा में विकास के दावों की पोल खुल गई है। तीन-चार महीने पहले जिस 'आकांक्षा शौचालय' का उद्घाटन बड़े तामझाम और जोश के साथ किया गया था, वह आज जनता के लिए सफेद हाथी साबित हो रहा है। विडंबना यह है कि सरकारी कागजों और प्रेस विज्ञप्तियों में जिस विकास की गाथा गाई जा रही है, धरातल पर उस पर ताला जड़ा हुआ है।
नीलेश अग्रवाल की अनुभवहीनता जनता पर भारी
शहर की स्वास्थ्य व्यवस्था के बदहाल होने का सीधा आरोप स्वास्थ्य प्रभारी नीलेश अग्रवाल की कार्यप्रणाली पर लग रहा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि स्वास्थ्य प्रभारी की निष्क्रियता और अनुभवहीनता के कारण जनसुविधाएं दम तोड़ रही हैं। चर्चा आम है कि अनुभव की कमी के बावजूद, केवल महापौर श्रीमती अलका बाघमार का कट्टर समर्थक होने के नाते उन्हें यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। हाल ही में हुई सामान्य सभा में भी भाजपा पार्षदों ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाए थे, जो विभाग की विफलता को प्रमाणित करते हैं।
कचरों का ढेर और बदबू बना शहर का चेहरा
महापौर अलका बाघमार के कार्यकाल में दुर्ग शहर की स्थिति 'बदहाली' की ओर अग्रसर है। जगह-जगह कचरों के ढेर और दुर्गंधयुक्त वातावरण अब शहर की नई पहचान बनती जा रही है। बावजूद इसके, निष्क्रिय स्वास्थ्य प्रभारी को महापौर का परोक्ष समर्थन मिलना पूरी शहरी सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करता है। जनता अब खुलेआम यह कहने लगी है कि महापौर का ध्यान जनहित के बजाय भेदभावपूर्ण राजनीति पर अधिक है।
सुशासन के दावों के विपरीत शहरी सरकार का रुख
एक ओर प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय 'जीरो टॉलरेंस' और सुशासन की नीति पर चलते हुए भ्रष्ट और लापरवाह अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दुर्ग की शहरी सरकार इस मंशा के ठीक विपरीत कार्य कर रही है। हैरानी की बात यह है कि स्थानीय सांसद विजय बघेल, जिनकी पसंद पर महापौर प्रत्याशी का चयन हुआ था, वे भी शहर की इस बदहाली पर मौन साधे हुए हैं। सांसद की यह चुप्पी उनकी संवेदनहीनता को दर्शाती है।
मिलपारा का बंद शौचालय केवल एक भवन नहीं, बल्कि नगर निगम के खोखले वादों का प्रतीक है। यदि जल्द ही स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी किसी अनुभवी हाथों में नहीं सौंपी गई, तो दुर्ग शहर की स्थिति और भी भयावह हो सकती है।