"शौर्यपथ : एक अखबार नहीं, एक बेटे का जीवित स्वरूप"
समय का पहिया निरंतर चलता रहता है, लेकिन कुछ तिथियाँ, कुछ क्षण और कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं जो जीवन भर हमारे साथ चलती हैं। आज शौर्यपथ दैनिक समाचार अपने 9वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। पाठकों के लिए यह एक अखबार हो सकता है, लेकिन मेरे और मेरे परिवार के लिए यह हमारी पूरी दुनिया है—हमारे बेटे शौर्य का जीवंत अस्तित्व।
शौर्य.. सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि हमारे जीवन का वह उजाला था, जिसे हमने 13 वर्षों तक अपनी हर सांस के साथ जिया। ईश्वर का वह आशीर्वाद जब तक हमारे पास था, हमने उसे एक राजकुमार की तरह पाला, उसके हर सपने, हर इच्छा को पूरा करने का प्रयास किया। वह हमारे जीवन की धड़कन था, हमारे घर की मुस्कान था।
उसके जीवनकाल में शौर्यपथ एक साप्ताहिक समाचार पत्र के रूप में प्रकाशित होता था। वह मासूमियत से पूछता—
"पापा, हमारा पेपर रोज कब आएगा? अभी तो हफ्ते में सिर्फ एक दिन आता है..."
मैं उसे समझाता कि रोज अखबार निकालना आसान नहीं होता। लेकिन शायद उस मासूम सवाल में ही एक सपना छिपा था—एक ऐसा सपना, जिसे हम तब समझ नहीं पाए।
फिर एक दिन ऐसा आया, जिसने हमारी पूरी दुनिया को बदल दिया। शौर्य हमें छोड़कर चला गयाज् एक ऐसी खामोशी देकर, जिसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं। उसके जाने के बाद जीवन जैसे ठहर सा गया था, लेकिन उसी ठहराव में हमने उसके उस अधूरे सपने को महसूस किया।
और फिर, उसके जाने के मात्र 40 दिन बाद, 1 अप्रैल 2019 को हमने एक निर्णय लिया—
शौर्यपथ अब साप्ताहिक नहीं, बल्कि दैनिक समाचार पत्र बनेगा।
यह निर्णय सिर्फ एक प्रकाशन का विस्तार नहीं था, यह एक पिता-माता का अपने बेटे के सपने को जीवित रखने का संकल्प था।
उस दिन से आज तक, हर सुबह जब शौर्यपथ हमारे घर पहुंचता है, तो ऐसा लगता है जैसे शौर्य खुद हमें जगाने आया हो। हर पन्ने में उसकी झलक, हर शब्द में उसकी आवाज, और हर खबर में उसका अस्तित्व महसूस होता है।
इन वर्षों में दुनिया ने बहुत कुछ देखा—विशेषकर वैश्विक महामारी का वह कठिन दौर, जब हर व्यवस्था लडख़ड़ा रही थी। लेकिन उन परिस्थितियों में भी शौर्यपथ का प्रकाशन नहीं रुका। क्योंकि यह सिर्फ एक अखबार नहीं था, यह हमारे बेटे का जीवित रूप था—जो हर सुबह हमारे साथ होना ही था।
इन 9 वर्षों में शौर्यपथ ने अपने नाम के अनुरूप, बिना किसी भय और बिना किसी द्वेष के, सच्चाई को सामने लाने का प्रयास किया है। समाज में जो घटित हो रहा है, उसे निष्पक्षता और ईमानदारी से पाठकों तक पहुंचाना हमारा कर्तव्य रहा है। इस मार्ग पर हमें सराहना भी मिली, और आलोचना भी—लेकिन हमने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
आज, जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि यह यात्रा अकेली नहीं रही। प्रदेश के 17 जिलों में जुड़े हमारे पत्रकार साथी—जो आज एक परिवार की तरह शौर्यपथ से जुड़े हैं—इस यात्रा के सच्चे सहभागी हैं। हम उन सभी का हृदय से आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने हर परिस्थिति में हमारा साथ दिया।
हम अपने सम्मानित पाठकों के भी ऋणी हैं, जिनका विश्वास और स्नेह ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। यही विश्वास हमें हर दिन और बेहतर करने की प्रेरणा देता है।
और अंत में..
शौर्य बेटा.. तू हमारे साथ नहीं है, लेकिन तेरा नाम, तेरा सपना, और तेरी यादें हमें हर दिन जीने का सहारा देती हैं।
तेरी बहन सिद्धि, जो उस समय मात्र 4 वर्ष की थी, आज 12 साल की हो गई है—लेकिन आज भी तुझे महसूस करती है, तुझसे बातें करती है, और तेरी यादों के साथ बड़ी हो रही है।
हम सब तुझे बहुत चाहते हैं...
जहां भी रहो, खुश रहो।