पिता ने नौकरी के लिए अपनाई ‘हल्बा’ पहचान, जमीन के लिए ‘कलार’—बेटी को अनुकंपा नियुक्ति में फिर उठा बड़ा सवाल
कोंडागांव/बीजापुर | विशेष रिपोर्ट (शौर्यपथ)
छत्तीसगढ़ के कोंडागांव और बीजापुर जिलों से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि जाति प्रमाण पत्र की पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामला एक ही व्यक्ति द्वारा अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग जाति का उपयोग कर लाभ लेने और उसके बाद उसकी संतान को अनुकंपा नियुक्ति मिलने से जुड़ा है।
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, कोंडागांव जिले के एरला क्षेत्र में जमीन मालिक मेहतु राम सेठिया (पिता घासीराम) ने जमीन संबंधी दस्तावेजों में अपनी जाति ‘कलार’ दर्ज कराई। वहीं, बीजापुर जिले में जाकर उन्होंने स्वयं को ‘हल्बा’ (अनुसूचित जाति) बताकर आदिवासी विकास विभाग के अंतर्गत कन्या आश्रम ईलमिडी में जलवाहक के पद पर 1 फरवरी 1994 को नियुक्ति प्राप्त की।
यहां तक मामला केवल फर्जी जाति के सहारे सरकारी नौकरी पाने तक सीमित था, लेकिन असली सवाल उनकी मृत्यु के बाद खड़ा हुआ।
अनुकंपा नियुक्ति में भी गड़बड़ी?
मेहतु राम की मृत्यु के पश्चात उनकी पुत्री कुमारी कमला सेठिया को 15 फरवरी 2013 को कलेक्टर कार्यालय, बीजापुर (आदिवासी शाखा) द्वारा जारी पत्र क्रमांक 8766 के तहत सहायक ग्रेड-3 के पद पर नियुक्त किया गया। हैरानी की बात यह है कि इस नियुक्ति में बेटी की जाति ‘कलार’ दर्शाई गई है।
अब बड़ा सवाल यह उठता है कि—
- जब पिता की नौकरी ‘हल्बा’ (SC) जाति के आधार पर थी, तो बेटी को ‘कलार’ (OBC/अन्य) जाति में अनुकंपा नियुक्ति कैसे मिली?
- क्या नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान जाति सत्यापन नहीं किया गया?
- क्या यह महज लापरवाही है या फिर सुनियोजित मिलीभगत?
नियम क्या कहते हैं?
सामान्यतः अनुकंपा नियुक्ति में मृतक कर्मचारी की सेवा शर्तों और मूल दस्तावेजों के आधार पर ही आश्रित को नौकरी दी जाती है। ऐसे में जाति का अंतर गंभीर अनियमितता की ओर संकेत करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी प्राप्त की है, तो यह न केवल आपराधिक कृत्य है बल्कि उसकी सेवा भी अवैध मानी जा सकती है।
प्रशासन पर उठते सवाल
इस पूरे प्रकरण में संबंधित विभाग, सहायक आयुक्त कार्यालय और नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की भूमिका संदेह के घेरे में है। सवाल यह भी है कि—
- क्या दस्तावेजों की जांच केवल औपचारिकता बनकर रह गई है?
- क्या “लेन-देन” के जरिए नियमों को दरकिनार किया गया?
गंभीर अपराध और सिस्टम की विफलता
एक ही व्यक्ति द्वारा नौकरी के लिए अलग जाति और जमीन के लिए अलग जाति का उपयोग करना, फिर उसी परिवार के सदस्य को अलग आधार पर सरकारी नौकरी मिलना—यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि उन पात्र उम्मीदवारों के साथ भी अन्याय है जो सही तरीके से अवसर पाने के हकदार थे।
अब आगे क्या?
यह मामला सामने आने के बाद प्रशासन के लिए निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करना आवश्यक हो गया है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो न केवल नियुक्ति रद्द हो सकती है बल्कि संबंधित अधिकारियों पर भी विभागीय और कानूनी कार्रवाई तय मानी जा रही है।
(शौर्यपथ की पड़ताल जारी है… )