जिले के सबसे बड़े अस्पताल पर उठे गंभीर सवाल, रेफर संस्कृति और अव्यवस्था से मरीज बेहाल
दुर्ग। जिले का सबसे बड़ा शासकीय स्वास्थ्य संस्थान कहलाने वाला जिला अस्पताल दुर्ग आज स्वयं गंभीर सवालों के घेरे में खड़ा नजर आ रहा है। करोड़ों रुपये की शासकीय सुविधाओं, संसाधनों और योजनाओं के बावजूद मरीजों को राहत मिलने की बजाय परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि यदि किसी मरीज को सामान्य आंख का उपचार भी कराना हो और उसे शुगर अथवा बीपी जैसी सामान्य बीमारी हो, तो जिला अस्पताल के कई चिकित्सक तत्काल “हायर सेंटर रेफर” का रास्ता दिखाने लगते हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि जब प्रदेश सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयासरत है, तब जिला मुख्यालय के सबसे बड़े अस्पताल में आखिर मरीजों को उपचार देने की इच्छाशक्ति क्यों दिखाई नहीं दे रही?
क्या सिर्फ “सामान्य मरीजों” का अस्पताल बनकर रह गया जिला अस्पताल?
सूत्रों और मरीजों की शिकायतों के अनुसार अस्पताल में ऐसी स्थिति बन चुकी है मानो यहां केवल वही मरीज स्वीकार्य हों जो “पर्ची से ठीक हो जाएं।” शुगर और बीपी जैसी बीमारियां आज लगभग हर तीसरे-चौथे व्यक्ति में सामान्य रूप से पाई जाती हैं, जिन्हें नियंत्रित कर उपचार देना चिकित्सा प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा माना जाता है। निजी चिकित्सकों का भी मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में मरीजों का इलाज संभव है।
लेकिन आरोप यह है कि जिला अस्पताल के कई चिकित्सक मरीजों को संभालने और जोखिम लेकर उपचार करने की बजाय तत्काल रायपुर रेफर करना अधिक आसान समझते हैं।
टेस्ट कराओ, मेडिकल फिटनेस लो… फिर भी इलाज नहीं!
सबसे अधिक नाराजगी इस बात को लेकर सामने आ रही है कि मरीजों से पहले अनेक प्रकार की जांचें करवाई जाती हैं, मेडिकल फिटनेस दस्तावेज भी लिए जाते हैं, लेकिन अंत में इलाज से मना कर दिया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि उपचार करना ही नहीं था, तो मरीजों को दिनों तक जांच और कागजी प्रक्रिया में क्यों उलझाया गया?
ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी उम्मीद लेकर आने वाले मरीज आर्थिक, मानसिक और शारीरिक रूप से टूटते नजर आ रहे हैं।
सिविल सर्जन की भूमिका पर भी सवाल
वर्तमान में डॉ. मिंज जिला अस्पताल में सिविल सर्जन के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन अस्पताल परिसर की व्यवस्थाओं, मरीजों की परेशानियों और चिकित्सकीय मनमानी पर उनकी प्रशासनिक पकड़ को लेकर भी अब गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं।
जब इस विषय पर चर्चा की गई तो जवाब “मामले को देखते हैं” तक सीमित बताया गया। इससे यह धारणा और मजबूत हो रही है कि अस्पताल प्रशासन या तो समस्याओं से अनभिज्ञ है या फिर कार्रवाई की इच्छाशक्ति नहीं दिखा रहा।
जच्चा-बच्चा केंद्र में भी रेफर संस्कृति?
विश्वस्त सूत्रों के अनुसार जिले के सबसे बड़े जच्चा-बच्चा केंद्र में भी बीपी और शुगर का हवाला देकर गर्भवती महिलाओं को बाहर रेफर किए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। जबकि कई मामलों में वही मरीज बाद में दुर्ग शहर के छोटे निजी नर्सिंग होम में उपचार लेकर स्वस्थ हो जाते हैं।
यदि यह स्थिति सही है तो यह केवल चिकित्सा व्यवस्था पर नहीं, बल्कि शासन द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र में किए जा रहे करोड़ों रुपये के खर्च पर भी बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
अस्पताल परिसर में अव्यवस्था का अंबार
जिला अस्पताल परिसर की व्यवस्थाओं को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं।
अस्पताल परिसर में बाहरी एजेंटों की सक्रियता
मरीजों को निजी नर्सिंग होम की ओर मोड़ने की चर्चाएं
दवाइयों के लिए बाहर भटकते मरीज
परिसर के भीतर अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियां
इन सबके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की निष्क्रियता लोगों को हैरान कर रही है।
लिफ्ट तक नहीं, मरीज सीढ़ियों के सहारे
इतने बड़े अस्पताल में आज भी समुचित लिफ्ट सुविधा का अभाव मरीजों की परेशानी बढ़ा रहा है। बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और गंभीर मरीज बार-बार जांच एवं उपचार के लिए सीढ़ियां चढ़ने को मजबूर हैं।
विडंबना यह है कि निजी नर्सिंग होम के लिए जहां लिफ्ट जैसी सुविधाएं आवश्यक मानी जाती हैं, वहीं जिले के सबसे बड़े शासकीय अस्पताल में यह मूलभूत सुविधा तक प्रभावी रूप में नजर नहीं आती।
सुशासन तिहार बनाम जमीनी हकीकत
एक ओर प्रदेश में सुशासन और जनकल्याण के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दुर्ग जिला अस्पताल की स्थिति उन दावों को खुली चुनौती देती दिखाई दे रही है। जिले में कैबिनेट मंत्री, दर्जा प्राप्त मंत्री और राष्ट्रीय स्तर के जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी के बावजूद यदि जिला अस्पताल की स्थिति ऐसी है, तो ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे अस्पतालों की हालत क्या होगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
सबसे बड़ा सवाल… जवाबदेह कौन?
जिला अस्पताल आखिर मरीजों के उपचार के लिए है या सिर्फ रेफर करने के लिए?
क्या सरकारी अस्पतालों में जिम्मेदारी से ज्यादा “औपचारिकता” हावी हो चुकी है?
क्या करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मरीजों को भरोसेमंद इलाज नहीं मिल पाएगा?
और सबसे बड़ा प्रश्न — क्या जिला अस्पताल प्रशासन एवं सिविल सर्जन इस पूरी व्यवस्था की नैतिक जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं?
दुर्ग की जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि व्यवस्था में ठोस सुधार और जिम्मेदारों पर कार्रवाई चाहती है।