शौर्यपथ विशेष
दुर्ग नगर निगम की बाजार व्यवस्था इन दिनों सवालों के घेरे में है। एक ओर प्रदेश के मुखिया Vishnu Deo Sai लगातार सुशासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई का संदेश दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दुर्ग निगम का बाजार विभाग मानो लापरवाही और निष्क्रियता का नया उदाहरण बनता जा रहा है।
31 मई को मुख्यमंत्री के दुर्ग आगमन से पहले अब शहर में एक ही चर्चा तेज हो चुकी है — क्या शहरी सरकार केवल स्वागत, होर्डिंग और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित रहेगी, या फिर बाजार विभाग की वर्षों से चली आ रही अव्यवस्थाओं पर भी कोई सख्त कदम उठाए जाएंगे?
बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा का कार्यकाल लगातार विवादों और सवालों से घिरा रहा है। चाहे बाजार क्षेत्र में अवैध कब्जों का मामला हो, बस स्टैंड में नियम विरुद्ध “राम रसोई” संचालन का मुद्दा हो, इंदिरा मार्केट की दुकानों के किराया आवंटन में कथित अनियमितता हो, गुमटी घोटाले पर लीपापोती का आरोप हो या फ्लेक्स-बैनर प्रकरण में राजस्व हानि पर ठोस कार्रवाई की अनुशंसा न करना — हर मामले में बाजार विभाग की भूमिका कठघरे में नजर आई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शहर के आम नागरिकों को छोटी-छोटी बातों पर नोटिस और कार्रवाई का सामना करना पड़ता है, तब रसूखदारों और अवैध कब्जाधारियों पर बाजार विभाग की “मौन नीति” आखिर किसके संरक्षण में चल रही है?
चर्चगेट क्षेत्र में स्कूल शिक्षा मंत्री के सेवा सदन के सामने लगने वाले अवैध बाजार को लेकर भी निगम की निष्क्रियता शहरवासियों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। शहर की यातायात व्यवस्था प्रभावित हो रही है, व्यापारियों में असंतोष है, लेकिन जिम्मेदार विभाग मानो आंख मूंदकर बैठा है।
अब सवाल सीधे तौर पर महापौर Alka Baghmar की कार्यप्रणाली पर भी उठने लगे हैं। क्या मुख्यमंत्री के दौरे से पहले केवल विकास कार्यों की चमक दिखाई जाएगी और भ्रष्टाचार, अव्यवस्था तथा विभागीय निष्क्रियता पर पर्दा डाल दिया जाएगा? या फिर जनता को यह संदेश दिया जाएगा कि शहरी सरकार भी सुशासन के मुद्दे पर उतनी ही गंभीर है जितनी प्रदेश सरकार?
दुर्ग की जनता अब प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया पोस्ट से आगे जवाब चाहती है। क्योंकि शहर में विकास के दावों से ज्यादा चर्चा आज बाजार विभाग की अव्यवस्था, निगम की चुप्पी और कार्रवाई के अभाव की हो रही है।
मुख्यमंत्री करोड़ों के विकास कार्यों की सौगात लेकर आ रहे हैं, लेकिन शहर की जनता की निगाह इस बात पर टिकी है कि क्या उनके आने से पहले निगम प्रशासन “सफाई अभियान” केवल सड़कों तक सीमित रखेगा या फिर विभागीय भ्रष्टाचार और निष्क्रियता पर भी झाड़ू चलेगी?