राम रसोई के स्थापना दिवस समारोह में जुटे शहर के बड़े जनप्रतिनिधि, लेकिन कथित अवैध कब्जे और अनुबंध संबंधी शिकायतों पर अब तक कार्रवाई नहीं; उठ रहे हैं दोहरे मापदंडों के सवाल।
दुर्ग। शौर्यपथ विशेष
दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में अतिक्रमण और अवैध कब्जों के खिलाफ चल रही कार्रवाई के बीच एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने शहरी सरकार की कार्यप्रणाली और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर में चर्चा का विषय बने राम रसोई के स्थापना दिवस समारोह में प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री ललित चंद्राकर, दुर्ग नगर निगम की महापौर अलका बाघमार सहित कई जनप्रतिनिधि मंच साझा करते नजर आए। आयोजन के केंद्र में रहे राम रसोई के संचालक एवं शहर के व्यापारी चतुर्भुज राठी, जिन पर कथित रूप से शासकीय भूमि पर कब्जा और अनुबंध संबंधी अनियमितताओं के आरोप लगाए जा रहे हैं।
विडंबना यह है कि जिन मामलों में आम नागरिकों और छोटे व्यवसायियों पर तत्काल कार्रवाई की जाती है, उसी प्रकार के आरोपों के बावजूद प्रभावशाली लोगों के खिलाफ प्रशासनिक सख्ती दिखाई नहीं दे रही है। यही कारण है कि अब आम जनता यह पूछ रही है कि क्या दुर्ग में कानून की दो अलग-अलग किताबें चल रही हैं?
अवैध कब्जे के आरोप, लेकिन मंच पर सम्मान
जानकारी के अनुसार इंदिरा मार्केट स्थित भव्य गणेश मंदिर के सामने संचालित राम रसोई को लेकर लंबे समय से शिकायतें की जा रही हैं। आरोप है कि शासकीय सड़क और सार्वजनिक क्षेत्र का उपयोग कर संचालन किया जा रहा है, जिससे गणेश मंदिर की दृश्य भव्यता प्रभावित हुई है। इतना ही नहीं, बस स्टैंड क्षेत्र में अनुबंध अवधि समाप्त होने के बाद भी कब्जा जारी रखने जैसे आरोपों की शिकायतें भी संबंधित विभागों को सौंपे जाने की बात सामने आई है।
इसके बावजूद स्थापना दिवस समारोह में शहर के प्रमुख जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि शिकायतों की गंभीरता से अधिक महत्व राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव को दिया जा रहा है।
गणेश मंदिर की भव्यता पर भी सवाल
धर्म और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की बात करने वाली राजनीति के बीच यह प्रश्न भी उठ रहा है कि यदि किसी धार्मिक स्थल की पहचान और भव्यता प्रभावित हो रही है तो जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों ने इस विषय पर अब तक कोई सार्वजनिक पहल क्यों नहीं की?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि गणेश मंदिर के सामने किए गए कथित कब्जे ने मंदिर की दृश्यता को प्रभावित किया है। यदि यही कार्य किसी गरीब ठेला संचालक या छोटे व्यापारी द्वारा किया गया होता तो क्या प्रशासन इतनी ही उदारता दिखाता?
सुशासन बनाम स्थानीय हकीकत
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय लगातार सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की बात कर रहे हैं। प्रदेशभर में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के मामलों में कार्रवाई भी हो रही है। लेकिन दुर्ग में सामने आ रहे ऐसे मामले यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या स्थानीय स्तर पर मुख्यमंत्री की मंशा को कमजोर किया जा रहा है?
जब शिकायतें दर्ज हैं, दस्तावेज सौंपे जा चुके हैं और आरोप सार्वजनिक रूप से चर्चा का विषय बने हुए हैं, तब जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया आगे क्यों नहीं बढ़ रही?
जनता के बीच उठ रहे सवाल
क्या अतिक्रमण की परिभाषा व्यक्ति की आर्थिक हैसियत देखकर तय होगी?
क्या जनप्रतिनिधियों की मंचीय उपस्थिति शिकायतों को कमजोर करने का संकेत है?
क्या गणेश मंदिर के सामने हुए कथित कब्जे की निष्पक्ष जांच होगी?
क्या नगर निगम समान कानून और समान कार्रवाई का उदाहरण प्रस्तुत कर पाएगा?
बड़ा सवाल:
"दुर्ग में बुलडोजर का रास्ता शायद अब गूगल मैप से नहीं, प्रभावशाली लोगों की पहचान देखकर तय होता है। गरीब की गुमटी पर कानून जाग जाता है, लेकिन रसूखदारों के कब्जे के सामने कानून को शायद मंच की पहली पंक्ति में बैठा दिया जाता है।"
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि निगम प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी शिकायतों पर निष्पक्ष कार्रवाई करते हैं या फिर यह मामला भी राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक चुप्पी के बीच खो जाएगा।