चार दुकानों की जांच में भारी स्टॉक कमी उजागर, जिला खाद्य विभाग की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल
दुर्ग। दुर्ग नगर निगम क्षेत्र की शासकीय उचित मूल्य दुकानों में सामने आ रही करोड़ों रुपये के राशन घोटाले जैसी गंभीर अनियमितताओं ने जिला खाद्य विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। विडंबना यह है कि विभागीय जांच प्रतिवेदनों में बार-बार एक ही व्यक्ति का नाम सामने आने, लाखों रुपये मूल्य के खाद्यान्न की कमी पाए जाने और स्वयं जांच अधिकारियों द्वारा अनियमितताओं की पुष्टि किए जाने के बावजूद अब तक किसी भी प्रकार की आपराधिक कार्रवाई या एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।
जिला खाद्य विभाग के रिकॉर्ड में उपलब्ध चार अलग-अलग जांच प्रतिवेदनों का अध्ययन करने पर चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। इन सभी मामलों में किसी न किसी रूप में नवीन राजपूत का नाम दुकान संचालन और खाद्यान्न वितरण से जुड़ा हुआ पाया गया है।
पहली जांच : 490 क्विंटल से अधिक चावल का अंतर
24 जनवरी 2025 को आईडी 431001006 की आकस्मिक जांच में ऑनलाइन स्टॉक और भौतिक स्टॉक के बीच भारी अंतर पाया गया। जांच प्रतिवेदन के अनुसार लगभग 490.66 क्विंटल चावल तथा 14 लीटर केरोसिन भौतिक रूप से कम पाया गया। विक्रेता ने इस संबंध में कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया और बताया कि वह केवल नवीन राजपूत के निर्देश पर खाद्यान्न वितरण करता है।
दूसरी जांच : 1169 क्विंटल चावल का अंतर
7 दिसंबर 2024 को आईडी 431001025 की जांच में स्थिति और भी गंभीर मिली। विभागीय प्रतिवेदन के अनुसार 1169.72 क्विंटल चावल, 1.12 क्विंटल शक्कर, 4.19 क्विंटल नमक तथा 21 लीटर केरोसिन स्टॉक में कम पाया गया।
जांच के दौरान विक्रेता ने स्वीकार किया कि वह केवल खाद्यान्न वितरण का कार्य करता है और संचालन संबंधी निर्देश नवीन राजपूत द्वारा दिए जाते हैं।
तीसरी जांच : मोहन नगर पश्चिम दुकान में 431 क्विंटल चावल कम
20 फरवरी 2025 को आईडी 431001017 की जांच में भी 431.03 क्विंटल चावल भौतिक रूप से कम पाया गया। यहां स्वयं नवीन राजपूत का कथन दर्ज किया गया जिसमें उन्होंने तकनीकी कारणों और एपीएल-बीपीएल स्टॉक के मिश्रित प्रदर्शन का तर्क दिया।
प्रश्न यह है कि यदि वास्तव में तकनीकी समस्या थी तो इसकी सूचना तत्काल विभाग को क्यों नहीं दी गई? और यदि दी गई थी तो उसका रिकॉर्ड कहां है?
चौथी जांच : दुकान का पूरा संचालन नवीन राजपूत के हाथ में होने की स्वीकारोक्ति
आईडी 431001073 की जांच रिपोर्ट सबसे गंभीर मानी जा रही है।
प्रतिवेदन में उल्लेख है कि:
दुकान की अध्यक्ष को स्टॉक और रिकॉर्ड की जानकारी नहीं थी।
नियुक्त विक्रेता कार्य नहीं कर रही थी।
किसी अन्य व्यक्ति के मोबाइल पर OTP प्राप्त कर ई-पॉस मशीन संचालित की जा रही थी।
नवीन राजपूत ने स्वीकार किया कि दुकान का पूर्ण संचालन उनके द्वारा किया जाता है।
उन्होंने कम पाए गए खाद्यान्न की भरपाई दो माह में करने की बात भी कही।
यह स्वीकारोक्ति अपने आप में कई गंभीर प्रशासनिक और आपराधिक प्रश्न खड़े करती है।
आखिर एफआईआर क्यों नहीं?
यदि कोई सामान्य नागरिक हजार या दो हजार रुपये की चोरी के आरोप में पकड़ा जाता है तो पुलिस तत्काल अपराध दर्ज कर कार्रवाई करती है। लेकिन यहां विभागीय रिकॉर्ड में सैकड़ों-हजारों क्विंटल खाद्यान्न की कमी दर्ज होने, बार-बार अनियमितताएं सामने आने और लाखों रुपये मूल्य के सरकारी राशन का हिसाब नहीं मिलने के बावजूद अब तक एफआईआर दर्ज नहीं होना आश्चर्यजनक है।
जानकारी के अनुसार अप्रैल 2025 तक जिले में लगभग 9 करोड़ रुपये मूल्य के खाद्यान्न की कमी से संबंधित मामलों का संज्ञान विभाग द्वारा लिया जा चुका था। यदि यह तथ्य सही है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतने बड़े वित्तीय नुकसान के मामलों में आपराधिक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या कलेक्टर को पूरी सच्चाई बताई जा रही है?
जिले में लगातार सामने आ रही जांच रिपोर्टों और विभागीय नोटशीटों के बावजूद यदि कार्रवाई केवल नोटिस, जवाब-तलब और फाइलों तक सीमित है तो यह भी जांच का विषय है कि कहीं जिला प्रशासन और कलेक्टर स्तर तक मामलों की गंभीरता को कम करके तो प्रस्तुत नहीं किया जा रहा।
क्योंकि उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि अनियमितताएं कोई एक बार की घटना नहीं बल्कि लगातार सामने आ रही हैं।
नई दुकानों का आवंटन और पुराने सवाल
इसी बीच नई राशन दुकानों के आवंटन की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। ऐसे समय में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिन मामलों में जांच प्रतिवेदन तैयार हो चुके हैं, वहां जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध क्या दंडात्मक कार्रवाई होगी?
क्या लाखों रुपये मूल्य के राशन की कमी को केवल विभागीय नोटिसों तक सीमित कर दिया जाएगा?
क्या दोषियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज होगी?
क्या राशन घोटाले की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा होगी?
जनता जानना चाहती है जवाब
दुर्ग शहर प्रदेश के वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों का राजनीतिक केंद्र माना जाता है। ऐसे में सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्था में सामने आई गंभीर अनियमितताओं पर यदि कठोर कार्रवाई नहीं होती तो इससे पूरे तंत्र की विश्वसनीयता प्रभावित होगी।
अब निगाहें जिला प्रशासन, कलेक्टर दुर्ग और खाद्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर टिकी हैं। जनता यह जानना चाहती है कि सरकारी राशन के लाखों रुपये के इस कथित खेल में आखिर जिम्मेदार कौन है और उन पर कार्रवाई कब होगी?
क्योंकि जांच प्रतिवेदन तो बहुत कुछ कह रहे हैं, लेकिन कार्रवाई अब भी सवालों के घेरे में है।