जनशिकायतों का बढ़ता अंबार, आयुक्त से मुलाकात की स्पष्ट व्यवस्था नहीं, लंबित मामलों पर कार्रवाई की प्रतीक्षा; प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर उठ रहे सवाल।
दुर्ग/ शौर्यपथ विशेष /
दुर्ग नगर पालिक निगम के आयुक्त सुमित अग्रवाल को कुछ माह पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में पदोन्नति (Award of IAS) प्राप्त होना न केवल उनके व्यक्तिगत प्रशासनिक जीवन की उपलब्धि है, बल्कि दुर्ग नगर निगम के लिए भी गौरव का विषय माना गया। पूर्व आयुक्त लोकेश चंद्राकर और प्रकाश सर्वे के बाद वे ऐसे तीसरे आयुक्त हैं जिन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ है।
हालांकि, इस उपलब्धि के साथ ही नगर निगम की वर्तमान कार्यप्रणाली को लेकर कई प्रशासनिक और जनसरोकार से जुड़े प्रश्न भी सामने आ रहे हैं। शासन की सामान्य प्रक्रिया के अनुसार आईएएस अवार्ड प्राप्त अधिकारियों को प्रशिक्षण सहित अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना होता है, लेकिन फिलहाल श्री अग्रवाल दुर्ग नगर निगम आयुक्त का दायित्व संभाल रहे हैं। ऐसे में शहर में यह चर्चा भी है कि क्या वे अपने संभावित स्थानांतरण अथवा आगामी प्रशासनिक प्रक्रिया की प्रतीक्षा कर रहे हैं, अथवा नगर निगम के कार्यों को पहले की तरह गति देने की दिशा में कोई ठोस पहल करेंगे।
शहर के नागरिकों और शिकायतकर्ताओं की प्रमुख शिकायत यह है कि आयुक्त से मुलाकात की कोई स्पष्ट एवं व्यवस्थित व्यवस्था दिखाई नहीं देती। पिछले दिनों आयुक्त के निजी सहायक (पीए) से जुड़े विवाद के बाद उन्हें सेवा से पृथक कर दिया गया। इसके बाद से अब तक उस पद पर नियमित व्यवस्था नहीं होने के कारण आम नागरिकों को यह जानकारी नहीं मिल पाती कि आयुक्त किस समय कार्यालय में उपलब्ध रहेंगे अथवा जनसुनवाई कब होगी। परिणामस्वरूप प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग निगम कार्यालय पहुंचकर भी बिना मुलाकात लौटने को विवश हो रहे हैं।
नगर निगम से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण मामलों की जांच और निर्णय भी लंबे समय से लंबित बताए जा रहे हैं। शहर में अवैध अतिक्रमण, बाजार व्यवस्था, स्वच्छता, बदबू, विभिन्न निर्माण कार्यों तथा कथित अनियमितताओं से संबंधित शिकायतें लगातार उठ रही हैं, लेकिन इन पर अपेक्षित गति से कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है। इससे प्रशासनिक सक्रियता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
इसी क्रम में शौर्यपथ दैनिक समाचार पत्र द्वारा भी पूर्व में कथित गुमटी आवंटन, आश्रय स्थल संचालन तथा बकरी पालन परियोजना से जुड़े मामलों में नगर निगम आयुक्त को लिखित शिकायत देकर निष्पक्ष जांच की मांग की गई थी। समाचार पत्र ने आश्रय स्थल के आवंटन में पारदर्शिता तथा संबंधित समूह के पूर्व कार्यों की जांच की भी मांग उठाई थी। समाचार पत्र के अनुसार इन शिकायतों की जांच की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हो सकी है।
शौर्यपथ समाचार पत्र द्वारा उक्त मामलों को उठाने के बाद संबंधित पक्ष के एक व्यक्ति द्वारा संपादक को कथित रूप से धमकी दी गई, जिसकी शिकायत पुलिस में की गई है। यह मामला कानून-व्यवस्था से जुड़ा विषय है और इसकी जांच संबंधित एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में है। इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्थापित होगा।
वहीं यह भी चर्चा का विषय है कि आश्रय स्थल के संचालन हेतु निविदा प्रक्रिया प्रारंभ होने के काफी समय बाद भी अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। यदि ऐसा है तो संबंधित विभाग द्वारा प्रक्रिया में हो रही देरी के कारणों को सार्वजनिक किया जाना पारदर्शिता की दृष्टि से आवश्यक माना जा रहा है।
नगर निगम क्षेत्र में लगातार लंबित शिकायतों, प्रशासनिक निर्णयों में विलंब तथा नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दों के बीच जनप्रतिनिधियों के स्तर पर भी अपेक्षित समाधान नहीं निकल पाने की स्थिति में नागरिकों की निगाहें स्वाभाविक रूप से निगम आयुक्त पर टिकती हैं। ऐसे में यह अपेक्षा की जा रही है कि नगर निगम प्रशासन शिकायतों के निराकरण, जनसुनवाई की नियमित व्यवस्था, लंबित जांचों की स्थिति तथा विकास कार्यों की प्रगति को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या आईएएस अधिकारी बनने के बाद आयुक्त सुमित अग्रवाल अपने संभावित प्रशासनिक बदलाव तक वर्तमान व्यवस्था को इसी प्रकार संचालित होने देंगे, या फिर वे नगर निगम प्रशासन को नई गति देते हुए जनशिकायतों के त्वरित निराकरण, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस एवं प्रभावी कदम उठाएंगे। इसका उत्तर आने वाले दिनों में निगम प्रशासन की कार्यशैली से स्पष्ट होगा।