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“अभ्युदय मिश्रा की ‘जांच एक्सप्रेस’ में ब्रेक ही नहीं! शिकायतें पहुंचीं, फाइल चली… कार्रवाई फिर भी नहीं!” Featured

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सरकार की मंशा अच्छी, लेकिन अफसर की कार्यप्रणाली पर सवाल; गुमठी घोटाले से लेकर इंदिरा मार्केट की दुकानों तक शिकायतें, फिर भी नतीजा सिफर

शौर्यपथ विशेष 

   दुर्ग। सरकार शहर की व्यवस्था सुधारने और सुशासन का दावा भले ही करती रहे, लेकिन जब जिम्मेदार विभाग ही अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने लगे तो सरकार की अच्छी मंशा भी सवालों के घेरे में आ जाती है। दुर्ग नगर निगम का बाजार विभाग इन दिनों कुछ ऐसे ही सवालों के बीच खड़ा नजर आ रहा है। विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर बाजार क्षेत्र में चर्चा है और सबसे ज्यादा सवाल बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की कार्यशैली को लेकर उठ रहे हैं।

शहर में अवैध बाजार संचालन, गुमठियों से जुड़े कथित आर्थिक अनियमितताओं और इंदिरा मार्केट में दुकानों के अवैध संचालन जैसी शिकायतें सामने आने के बावजूद लंबे समय तक प्रभावी कार्रवाई नहीं होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कई मामलों में कार्रवाई के बजाय मामला ‘जांच चल रही है’ कहकर आगे बढ़ाया जाता रहा। अब सवाल यह है कि आखिर यह जांच कब पूरी होगी और शिकायतों पर वास्तविक कार्रवाई कब दिखाई देगी?

शिकायत आई, जांच बैठी... फिर मामला कहां गया?

बाजार विभाग की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा कटाक्ष यही है कि शिकायतों के बाद कार्रवाई की जगह जांच की प्रक्रिया ही जैसे अंतिम कार्रवाई बन गई हो। विभाग से जुड़े मामलों को लेकर शिकायतकर्ताओं और बाजार क्षेत्र के लोगों में यह धारणा बनती जा रही है कि शिकायत दर्ज होने के बाद फाइल आगे बढ़ने के बजाय जांच के नाम पर लंबित हो जाती है।

विशेष रूप से लाखों रुपये की कथित गुमठी अनियमितता को लेकर उपलब्ध दस्तावेजों और शिकायतों के बावजूद ठोस कार्रवाई सामने नहीं आने से बाजार विभाग की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लग रहा है। हालांकि इन आरोपों की वास्तविकता और जिम्मेदारी तय करने के लिए विभागीय स्तर पर निष्पक्ष जांच जरूरी है।

परिषद और उच्च अधिकारियों तक सही जानकारी पहुंच रही है या नहीं?

बाजार विभाग को लेकर एक और गंभीर आरोप यह है कि कुछ शिकायतों और जांचों की वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी परिषद की बैठक अथवा उच्च अधिकारियों तक नहीं पहुंचने की बातें सामने आ रही हैं। यदि ऐसा है तो यह केवल किसी एक अधिकारी की कार्यप्रणाली का विषय नहीं रहेगा, बल्कि निगम की निर्णय प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा।

निविदा प्रक्रिया से जुड़े कुछ मामलों में भी उच्च अधिकारियों अथवा निविदा समिति के समक्ष संपूर्ण जानकारी रखे बिना प्रक्रिया आगे बढ़ाए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। यदि जांच में यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह गंभीर प्रशासनिक विषय होगा और इसकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

कार्यालय में अधिकारी की मौजूदगी भी बनी चर्चा का विषय

बाजार विभाग के कुछ कर्मचारियों के बीच अधिकारी की कार्यालय में उपलब्धता को लेकर भी चर्चा होने की बात सामने आ रही है। कर्मचारियों का दावा है कि अधिकारी कई बार विभागीय कार्य के बजाय घर पर अधिक समय बिताते हैं तथा उच्च अधिकारियों अथवा महापौर द्वारा बुलाए जाने पर भी कार्यालय में पहुंचने में काफी समय लगने की स्थिति बनती है।

हालांकि फोन लोकेशन अथवा व्यक्तिगत उपस्थिति से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इन आरोपों की सत्यता केवल निष्पक्ष प्रशासनिक जांच या आधिकारिक उपस्थिति रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकती है। यदि निगम प्रशासन चाहे तो अधिकारी की उपस्थिति, फाइल मूवमेंट, शिकायतों के निपटारे की समयसीमा और विभागीय कार्यों की प्रगति का रिकॉर्ड इसकी वास्तविक तस्वीर सामने ला सकता है।

बाजार बदहाल, विभाग ‘जांच’ में व्यस्त?

शहर के बाजारों की अव्यवस्था का सीधा असर आम नागरिकों, व्यापारियों और निगम की छवि पर पड़ता है। लेकिन शिकायतों के लगातार सामने आने के बावजूद यदि विभागीय स्तर पर केवल जांच का आश्वासन मिलता रहे तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे कि जांच व्यवस्था सुधारने के लिए है या शिकायतों को ठंडे बस्ते में डालने के लिए?

दुर्ग नगर निगम में पूर्व आयुक्त सुमित अग्रवाल के कार्यकाल के दौरान शहर की व्यवस्थाओं को लेकर जो सवाल उठे, उनके बाद अब नए निगम आयुक्त आईएएस लीना कोसम से व्यवस्थाओं में सुधार की उम्मीद की जा रही है। ऐसे में बाजार विभाग उनके लिए भी एक महत्वपूर्ण परीक्षा बन सकता है।

अब आयुक्त के सामने असली सवाल

नवनियुक्त आयुक्त लीना कोसम के सामने सवाल केवल बाजार विभाग की व्यवस्था सुधारने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या शिकायतों की फाइलों को सिर्फ ‘जांच’ के नाम पर चलाया जाता रहेगा या जिम्मेदारी तय कर परिणाम भी सामने लाए जाएंगे?

बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवालों की निष्पक्ष जांच, लंबित शिकायतों की समीक्षा, गुमठी प्रकरण से जुड़े दस्तावेजों की जांच, इंदिरा मार्केट की दुकानों की वैधता की पड़ताल और निविदा प्रक्रिया की समीक्षा यदि एक साथ कराई जाए तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है।

क्योंकि सवाल सिर्फ एक अधिकारी का नहीं है।

सवाल यह है कि जिस बाजार विभाग के जिम्मे शहर के बाजारों की व्यवस्था है, अगर वही विभाग शिकायतों के बोझ तले दबा रहे और हर सवाल का जवाब सिर्फ ‘जांच चल रही है’ हो, तो फिर जनता किससे उम्मीद करे?

और सबसे बड़ा सवाल—

“सरकार सुशासन चाहती है… लेकिन क्या बाजार विभाग ‘जांच-शासन’ से बाहर निकलकर कभी कार्रवाई भी करेगा?”

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Last modified on Tuesday, 08 September 2026 19:52
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