निगम के अपने पत्र में किराये पर देने पर रोक, फिर भी ‘शंभवी कंप्यूटर’ का संचालन—अभ्युदय मिश्रा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
दुर्ग। सरकारी संपत्ति के आवंटन में नियम इसलिए बनाए जाते हैं ताकि व्यवस्था पारदर्शी रहे और किसी व्यक्ति विशेष को नियमों से परे लाभ न मिल सके। लेकिन दुर्ग नगर पालिक निगम के बाजार विभाग में सामने आया इंदिरा मार्केट की एक दुकान का मामला इन तमाम व्यवस्थाओं पर सवाल खड़ा कर रहा है।
इंदिरा मार्केट के सी-ब्लॉक में सीढ़ी के नीचे स्थित 60 वर्गफीट की दुकान को लेकर नगर निगम द्वारा जारी दस्तावेज में आवंटन की शर्तें साफ-साफ दर्ज हैं। निगम के पत्र में स्पष्ट है कि आवंटी स्वयं दुकान में व्यवसाय करेगा और किसी अन्य व्यक्ति को किराये पर नहीं देगा। शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में निगम को दुकान खाली कराकर कब्जा लेने का अधिकार भी दिया गया है।
इसके बावजूद वर्तमान में उक्त परिसर में ‘SHAMBHAVI COMPUTER’ के नाम से व्यवसाय संचालित होता दिखाई दे रहा है।
छह महीने पहले शिकायत, फिर भी दुकान जस की तस!
मामले की गंभीरता इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि यह कोई नई जानकारी नहीं है। शिकायतकर्ता द्वारा करीब छह माह पहले ही बाजार विभाग को मामले की जानकारी और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए जाने का दावा किया जा रहा है। इसके बाद भी यदि वर्तमान तस्वीर में दुकान उसी तरह संचालित दिखाई दे रही है, तो सवाल सीधे बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की कार्यप्रणाली पर उठना स्वाभाविक है।
आखिर छह महीने का समय किसी मामले की जांच के लिए पर्याप्त नहीं है तो कितना समय चाहिए?
यदि दुकान का संचालन नियमसम्मत है तो विभाग स्पष्ट करे कि वर्तमान संचालक की स्थिति क्या है।
यदि दुकान किराये पर दी गई है तो निगम की स्पष्ट शर्त के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
और यदि कार्रवाई की जा चुकी है तो उसका परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
मामला सिर्फ दुकान का नहीं, ‘मौन’ का है
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि दुकान में कंप्यूटर का कारोबार कौन कर रहा है। बड़ा सवाल यह है कि जब शिकायतकर्ता के अनुसार दस्तावेज छह महीने पहले ही विभाग के सामने रखे जा चुके थे, तब बाजार विभाग ने इस मामले को गंभीरता से क्यों नहीं लिया?
लगातार शिकायत के बावजूद यदि स्थिति जस की तस बनी रहती है, तो स्वाभाविक रूप से किसी को संरक्षण दिए जाने अथवा पर्दे के पीछे किसी प्रकार के लेनदेन की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि इसकी सच्चाई निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकती है।
अभ्युदय मिश्रा की चुप्पी अब सवाल बन गई
बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा को यह बताना चाहिए कि छह माह से उनके संज्ञान में बताए जा रहे इस मामले में अब तक क्या जांच हुई? किस अधिकारी ने स्थल निरीक्षण किया? मूल आवंटी कौन है? वर्तमान संचालक का मूल आवंटी से क्या संबंध है? क्या दुकान किराये पर दी गई है? और यदि आवंटन शर्तों का उल्लंघन मिला है तो दुकान खाली कराने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
निगम के दस्तावेज में नियम काले अक्षरों में लिखे हैं, दुकान सामने दिखाई दे रही है और शिकायत भी पुरानी है—फिर बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की कार्रवाई आखिर दिखाई क्यों नहीं दे रही?
अब जांच से ही खुलेगा ‘मौन’ का राज
मामले में यह जांच का विषय है कि छह माह पहले जानकारी मिलने के बावजूद कार्रवाई में देरी क्यों हुई और कहीं किसी व्यक्ति को अनुचित लाभ तो नहीं पहुंचाया गया। निगम प्रशासन को चाहिए कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर आवंटन से लेकर वर्तमान संचालन तक के दस्तावेजों की जांच करे और जिम्मेदारी तय करे।
क्योंकि सवाल एक 60 वर्गफीट की दुकान का नहीं है।
सवाल यह है कि निगम की संपत्ति पर नियम भारी हैं या फिर बाजार अधिकारी का मौन?