दुर्ग। बरसात आते ही शंकर नगर के रहवासियों के लिए बारिश राहत नहीं, बल्कि जलभराव की चिंता लेकर आती है। शंकर नाला और उसके आसपास का क्षेत्र लंबे समय से जलभराव की समस्या से जूझता रहा है। सवाल यह नहीं कि बारिश कितनी हुई, सवाल यह है कि हर साल एक जैसी समस्या सामने आने के बावजूद स्थायी समाधान की दिशा में जवाबदेही तय क्यों नहीं होती?
नगर निगम में वार्ड का निर्वाचित पार्षद जनता का सबसे निकटस्थ जनप्रतिनिधि होता है। सड़क, नाली, जलभराव, सफाई और स्थानीय नागरिक समस्याओं को निगम के सामने मजबूती से रखना उसकी महत्वपूर्ण राजनीतिक-सार्वजनिक जिम्मेदारियों में आता है। ऐसे में शंकर नगर के रहवासियों का यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि बरसों से बरसात में वही संकट दोहराया जा रहा है तो वार्ड स्तर पर समाधान के लिए कितनी प्रभावी पहल हुई?
लेकिन कहानी सिर्फ शंकर नगर तक सीमित नहीं है।
शंकर चंद्राकर के पास वार्ड प्रतिनिधित्व के साथ नगर निगम की बाजार व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारी भी रही है। यही कारण है कि अब सवाल व्यक्तिगत राजनीति से ज्यादा जवाबदेही और कार्यप्रणाली का बन गया है।
एक तरफ वार्ड में पानी, दूसरी तरफ शहर के बाजारों में सवाल
इंदिरा मार्केट दुर्ग का प्रमुख व्यापारिक केंद्र है और वहां अतिक्रमण, पार्किंग तथा यातायात संबंधी समस्याओं पर नगर निगम को समय-समय पर कार्रवाई करनी पड़ी है। 2025 में निगम की ओर से इंदिरा मार्केट में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भी दर्ज हुई थी।
इसके बावजूद आज भी बाजार व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं। हाल की रिपोर्टों में सड़क और बरामदे तक कथित कब्जे को लेकर भी सवाल सामने आए हैं।
यहीं से बाजार विभाग की भूमिका पर प्रश्न खड़ा होता है—
क्या कार्रवाई केवल अभियान के दिन दिखाई देनी चाहिए या बाजार व्यवस्था की निगरानी पूरे वर्ष चलनी चाहिए?
अगर सड़क पर दुकान फैलती है, बरामदा घिरता है, पार्किंग प्रभावित होती है या निगम की संपत्ति के उपयोग को लेकर विवाद सामने आता है, तो नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि संबंधित विभाग ने क्या कार्रवाई की, कितने नोटिस दिए, कितने प्रकरण दर्ज हुए और कितने मामलों में वास्तव में कब्जा हटाया गया?
ओम ज्वैलर्स से लेकर अन्य कथित कब्जों तक—नियम सबके लिए समान हैं या नहीं?
इंदिरा मार्केट में कुछ व्यापारिक प्रतिष्ठानों द्वारा सड़क अथवा सार्वजनिक आवागमन क्षेत्र तक सामान फैलाने और कथित अतिक्रमण के आरोप सामने आते रहे हैं। शौर्यपथ की पूर्व रिपोर्टों में भी बाजार क्षेत्र में अतिक्रमण और निगम की संपत्ति के उपयोग को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
यदि किसी व्यापारी ने वास्तव में निगम की भूमि अथवा सार्वजनिक मार्ग पर अनधिकृत कब्जा किया है, तो नियम के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि कब्जे की बात तथ्यहीन है, तो निगम को दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
मुद्दा किसी व्यापारी को निशाना बनाना नहीं है। मुद्दा यह है कि नियम लागू करने में समानता दिखाई देती है या नहीं।
राम रसोई, पार्किंग, गुमठियां और बाजार की व्यवस्था—सवालों की फेहरिस्त लंबी
बाजार क्षेत्र से जुड़े नागरिक सवालों में सड़क उपयोग, पार्किंग, गुमठियों, अस्थायी बाजार, दुकानों के विस्तार और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल जैसे मुद्दे लगातार सामने आते रहे हैं।
ऐसे में बाजार प्रभारी से जनता का सीधा सवाल होना चाहिए—
कितने अवैध कब्जों की पहचान हुई?
कितनों पर नोटिस जारी हुआ?
कितनों पर कार्रवाई हुई?
कितने प्रकरण लंबित हैं?
और कितने मामलों में निगम की संपत्ति वापस ली गई?
यही आंकड़े किसी भी जनप्रतिनिधि की कार्यप्रणाली पर बहस को व्यक्तिगत आरोपों से निकालकर तथ्यों के धरातल पर ला सकते हैं।
सत्ता में आने से पहले भ्रष्टाचार के सवाल, सत्ता में आने के बाद मौन क्यों?
राजनीति में विपक्ष में रहते हुए व्यवस्था की कमियां गिनाना आसान होता है। असली परीक्षा तब होती है जब वही व्यवस्था सुधारने की जिम्मेदारी सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधि के हाथ आती है।
आज सवाल यह नहीं होना चाहिए कि शंकर चंद्राकर किस दल से हैं।
सवाल यह होना चाहिए—
जिस जिम्मेदारी के लिए जनता ने प्रतिनिधि चुना, उस जिम्मेदारी का परिणाम जमीन पर कितना दिखाई दे रहा है?
यदि विपक्ष में रहते हुए भ्रष्टाचार और अव्यवस्था मुद्दा थे, तो सत्ता में आने के बाद उन्हीं समस्याओं पर कार्रवाई का रिकॉर्ड भी सार्वजनिक होना चाहिए।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सुशासन सरकार के लिए भी यह स्थानीय स्तर की अग्निपरीक्षा
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार सुशासन और जवाबदेह प्रशासन की बात करती है। लेकिन सुशासन का वास्तविक परीक्षण राजधानी के बड़े मंचों पर नहीं, बल्कि शंकर नगर की जलभराव वाली गलियों और इंदिरा मार्केट की सड़कों पर होता है।
यदि कोई वार्ड हर बरसात में जलभराव झेलता है, यदि बाजार में बार-बार अतिक्रमण हटाने की नौबत आती है और यदि नागरिकों को अपनी मूलभूत समस्याओं के लिए बार-बार आवाज उठानी पड़ती है, तो यह केवल एक पार्षद का नहीं, बल्कि पूरी स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय है।
सरकार को यह देखना होगा कि सुशासन की नीतियां फाइलों से निकलकर वार्डों तक पहुंच भी रही हैं या नहीं।
जनता को बहिष्कार नहीं, जवाब चाहिए
किसी जनप्रतिनिधि का राजनीतिक मूल्यांकन जनता अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत करती है। लेकिन उससे पहले जनता का अधिकार है कि उसे अपने प्रतिनिधि से काम का हिसाब मिले।
शंकर नगर के लोग पूछ सकते हैं—
जलभराव रोकने के लिए अब तक क्या हुआ?
नाले की सफाई और जलनिकासी की स्थायी योजना क्या है?
कितने प्रस्ताव निगम में रखे गए?
कितनी राशि स्वीकृत हुई?
काम कब शुरू होगा?
और बाजार के व्यापारी तथा आम नागरिक पूछ सकते हैं—
अतिक्रमण पर समान कार्रवाई कब होगी?
पार्किंग की स्थायी व्यवस्था क्या है?
गुमठियों और अस्थायी बाजारों का नियमन कैसे होगा?
निगम की संपत्तियों का उपयोग किन नियमों के तहत हो रहा है?
इन सवालों के जवाब यदि दस्तावेजों और कार्रवाई के आंकड़ों के साथ सामने आते हैं तो तस्वीर अपने आप साफ हो जाएगी।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे तीखा व्यंग्य किसी संपादक की कलम नहीं, बल्कि जनता का सीधा सवाल होता है—
“हमें आश्वासन नहीं, अपने वार्ड और अपने बाजार की जमीन पर दिखाई देने वाला काम चाहिए।”