नई दिल्ली / भारत में इन दिनों ईडी की जाँच पर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है . विपक्षी पारितियो का आरोप है कि केंद्र सरकार ईडी का इस्तमाल कर विपक्ष को परेशां कर रही है और अपरोक्ष दबाव बना रही है . महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के समय भी कुछ ऐसी ही बात सामने आयी थी कि ईडी के दबाव के कारण एकनाथ शिंदे विधायको के साथ अलग हुए है . छत्तीसगढ़ में नान घोटाले की जांच अभी ठन्डे बस्ते में है जहां पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह पर आरोप लगा है तो शराब घोटाले की जाँच तेजी से चल रही है . दिल्ली के dy cm मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद मामले ने और टूल पकड लिया है .
दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी की चर्चा है. सिसोदिया की गिरफ्तारी सीबीआई ने शराब नीति में कथित घोटाले की जांच को लेकर की है. सिसोदिया कोई अकेले नेता नहीं है जिन पर सीबीआई ने शिकंजा कसा है. सीबीआई और ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) के निशाने पर विपक्ष के कई बड़े नेता आ चुके हैं. 9 साल में 95 प्रतिशत विपक्षी नेता ईडी और सीबीआई के शिकंजे में हैं. इन नेताओं की लिस्ट कई बड़े विपक्षी नेता -सोनिया गांधी, राहुल गांधी, डीके शिवकुमार, संजय राउत, बड़े नामों के अलावा कई बड़े और दिग्गज नेताओं के नाम शामिल हैं.
बीते कुछ समय से विपक्ष का एक बड़ा तबका बार-बार ये दोहराता आया है मोदी सरकार केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्ष को 'काबू' करने के लिए कर रही है. ये इल्जाम कोई नया नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में एक टिप्पणी की थी सीबीआई सरकार का तोता है. तब देश में यूपीए की सरकार थी.
इंडियन एक्सप्रेस में छपी 2022 की रिपोर्ट ये बताती है कि 18 सालों में ईडी ने 147 प्रमुख राजनेताओं की जांच की थी, जिनमें से पिछले 9 सालों में 95 प्रतिशत से ज्यादा विपक्षी नेता थे. यानी 2014 के बाद से नेताओं के खिलाफ ईडी के इस्तेमाल में चार गुना बढ़ोतरी हुई है. इस दौरान 121 राजनेता जांच के दायरे में आए जिनमें 115 से ज्यादा विपक्षी नेता हैं.
ईडी की केसबुक में भी विपक्षी राजनेताओं और उनके करीबी रिश्तेदारों की संख्या में तेज वृद्धि देखी गई है. ये सभी विपक्षी नेता 2014 में एनडीए-2 सरकार के सत्ता में आने के बाद से इसकी जांच के दायरे में आए हैं.