नई दिल्ली। निजी भूमि पर बने मंदिरों की संपत्तियों के प्रबंधन और कथित नीलामी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार तथा मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह याचिका 237 वंशानुगत पुजारियों और निजी मंदिरों के मालिकों की ओर से दायर की गई है।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस आलोक आराधे की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की शिकायतों पर संबंधित पक्षों से जवाब तलब किया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि निजी भूमि पर बने मंदिरों की संपत्तियों की सरकारी स्तर पर नीलामी की जा रही है और वर्ष 1974 के एक शासनादेश के आधार पर जिला कलेक्टरों को इन मंदिरों का प्रबंधक बना दिया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये मंदिर उनके पूर्वजों द्वारा निजी भूमि पर स्थापित किए गए थे और हमेशा से निजी मंदिर रहे हैं। उनका आरोप है कि अब प्रशासन मंदिरों की जमीन की नीलामी की कार्रवाई कर रहा है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार ने सवाल किया कि यदि वर्ष 1974 से ही राजस्व अभिलेखों में जिला कलेक्टरों का नाम दर्ज था, तो याचिकाकर्ताओं ने इतने वर्षों तक इस पर आपत्ति क्यों नहीं उठाई।
खंडपीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि "कई मामलों में पुजारी मंदिरों की संपत्तियों का दुरुपयोग कर रहे हैं। वास्तव में यह संपत्ति देवता की होती है।"
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि प्रथम दृष्टया इस विवाद के समाधान के लिए दीवानी अदालत (सिविल कोर्ट) का रास्ता अधिक उपयुक्त हो सकता है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार ने अपने मथुरा दौरे का उल्लेख करते हुए कहा कि लगभग 22 वर्ष पहले मंदिर की स्थिति काफी खराब थी, जबकि हालिया दौरे में सरकारी प्रबंधन के बाद रखरखाव में उल्लेखनीय सुधार दिखाई दिया।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि एक स्वतंत्र प्राधिकरण या अधिकरण गठित किया जाए, जो यह तय करे कि संबंधित मंदिर निजी हैं या सार्वजनिक। साथ ही वर्ष 1974 के शासनादेश और उससे जुड़े राजस्व अभिलेखों को रद्द करने, वंशानुगत पुजारियों के नाम पुनः दर्ज करने तथा मंदिर की संपत्तियों की नीलामी, ध्वस्तीकरण या किसी भी प्रकार की सरकारी दखलअंदाजी पर अंतरिम रोक लगाने की भी मांग की गई है।
ध्यान दें: सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले में केवल नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ताओं की मांगों पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया गया है।