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राजनीतिक आलोचना की हद पार हुई तो कार्रवाई तय! पीएम मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

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अगर आलोचना है अधिकार, तो अपमान की सीमा कहां से शुरू होती है? त्रिपुरा हाईकोर्ट ने एफआईआर और चार्जशीट रद्द करने से किया इनकार

अगरतला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई कथित आपत्तिजनक और मानहानिकारक टिप्पणी के मामले में त्रिपुरा हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए एफआईआर और चार्जशीट रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में राजनीतिक आलोचना का अधिकार है, लेकिन आलोचना के नाम पर अभद्र, अपमानजनक या मानहानिकारक भाषा का इस्तेमाल स्वतः कानूनी संरक्षण का हकदार नहीं हो जाता।

राजनीतिक विरोध की आजादी, लेकिन भाषा की भी एक सीमा

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राजनीतिक आलोचना और व्यक्तिगत अपमान के बीच अंतर को महत्वपूर्ण माना। अदालत के मुताबिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी जनप्रतिनिधि अथवा सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और आलोचना करना नागरिकों का अधिकार है। हालांकि, इस अधिकार की आड़ में किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जो कानून के दायरे में आपत्तिजनक या मानहानिकारक हो।

प्रधानमंत्री के संवैधानिक पद का भी अदालत ने किया उल्लेख

अदालत ने प्रधानमंत्री के पद की संवैधानिक गरिमा का उल्लेख करते हुए सोशल मीडिया पर कथित अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल को गंभीरता से लिया। कोर्ट की टिप्पणियों का सार यह रहा कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की राजनीतिक आलोचना और उसके प्रति अभद्र अथवा मानहानिकारक टिप्पणी—दोनों को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता।

एफआईआर और चार्जशीट रद्द करने की मांग को झटका

मामले में कंटेंट क्राइटर की ओर से एफआईआर तथा जांच के बाद दाखिल चार्जशीट को रद्द करने की मांग की गई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने इस स्तर पर आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने से इनकार कर दिया। यानी अब मामला आगे कानूनी प्रक्रिया के तहत बढ़ेगा और आरोपों की न्यायिक जांच का रास्ता खुला रहेगा।

सोशल मीडिया यूजर्स के लिए भी बड़ा संदेश

यह फैसला सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी कानूनी सीमाओं को लेकर महत्वपूर्ण बहस को सामने लाता है। अदालत ने संकेत दिया कि लोकतंत्र में सवाल पूछना और आलोचना करना अपराध नहीं है, लेकिन अभद्र एवं मानहानिकारक भाषा को केवल 'राजनीतिक अभिव्यक्ति' बताकर कानूनी कार्रवाई से बचा नहीं जा सकता।

फैसले का मूल संदेश साफ है—सत्ता की आलोचना लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ कानूनी मर्यादा भी जुड़ी है।

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