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बस्तर की माटी, संस्कृति और परम्परा का गौरव ? हरेली महोत्सव 2026 ने सहेजी लोककला, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत की अनमोल झलक

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कोंडागांव, छत्तीसगढ़ | 

छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक संपदा और हरियाली से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोक-संस्कृति, पारम्परिक कला, लोकगीत, लोकनृत्य, स्थानीय बोलियों, साहित्य और कृषि परम्पराओं से भी है। विशेष रूप से बस्तर अंचल की सांस्कृतिक विरासत अपने आप में एक जीवंत इतिहास है, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे लोक कलाकारों, साहित्यकारों, शिल्पकारों और समाज ने अपने जीवन और सृजन के माध्यम से संजोकर रखा है।

इसी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित, संवर्धित और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के उद्देश्य से कोंडागांव जिले में “बस्तर सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं कला परिषद” का गठन किया गया। स्थानीय कलाकारों एवं संस्कृति प्रेमियों की सर्वसम्मत सहमति से श्री गोकुल वैद्य को परिषद का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। परिषद का यह प्रयास बस्तर की लोक परम्पराओं, स्थानीय भाषाओं-बोलियों, साहित्य, कला और कलाकारों को एक सशक्त मंच प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

इसी सांस्कृतिक संकल्प को आगे बढ़ाते हुए बस्तर सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं कला परिषद, कोंडागांव द्वारा दिनांक 16 अगस्त 2026 को छत्तीसगढ़-बस्तर की माटी, संस्कृति, लोककला एवं कृषि परम्परा से जुड़े हमारे गौरवशाली हरेली (अमुस) तिहार के पावन अवसर पर “हरेली महोत्सव 2026” का भव्य आयोजन किया गया।

हरेली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि किसान, खेत, प्रकृति, पशुधन, कृषि औजार और धरती माता के प्रति हमारी कृतज्ञता का लोकपर्व है। इस अवसर पर आयोजित महोत्सव ने बस्तर की माटी में रची-बसी परम्पराओं को मंच पर जीवंत कर दिया।

? अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति

हरेली महोत्सव 2026 में मुख्य अतिथि माननीया सुश्री लता उसेंडी, विधायक कोंडागांव एवं उपाध्यक्ष, बस्तर विकास प्राधिकरण, माननीया सुश्री मोना सेन, अध्यक्ष, राज्य फिल्म विकास निगम, छत्तीसगढ़ शासन तथा माननीया श्रीमती शालिनी राजपूत, अध्यक्ष, हस्तशिल्प विकास बोर्ड, छत्तीसगढ़ शासन की गरिमामयी उपस्थिति रही।

वहीं विशिष्ट अतिथियों के रूप में छत्तीसगढ़ एवं बस्तर की कला-संस्कृति के गौरव—

पद्मश्री श्री पंडी राम मंडावी — काष्ठ शिल्पकार एवं जनजातीय वाद्य यंत्र विशेषज्ञ,

पद्मश्री श्रीमती ऊषा वारले — पंडवानी गायिका,

पद्मश्री श्री अजय कुमार मंडावी — काष्ठ शिल्पकार,

माननीय श्री राजेन्द्र बघेल — राष्ट्रपति पुरस्कृत अंतर्राष्ट्रीय बेलमेटल शिल्पकार,

श्री पंचुराम सागर — राष्ट्रपति पुरस्कृत अंतर्राष्ट्रीय बेलमेटल शिल्पकार,

श्री तीजु राम विश्वकर्मा — राष्ट्रपति पुरस्कृत अंतर्राष्ट्रीय लौह शिल्पकार,

श्री अविनाश प्रसाद — फिल्म निर्देशक,

श्री राकेश यादव — फिल्म अभिनेता,

श्री नरपती पटेल — अध्यक्ष, नगर पालिका परिषद, कोंडागांव,

तथा श्री जशकेतु उसेंडी — उपाध्यक्ष, नगर पालिका परिषद, कोंडागांव

की उपस्थिति ने समारोह की गरिमा को और अधिक बढ़ाया।

? मंच पर साकार हुई बस्तर की आत्मा

हरेली महोत्सव में छत्तीसगढ़ और बस्तर की लोक-संस्कृति का ऐसा मनोहारी रंग देखने को मिला, जिसमें लोकगीतों की मिठास, लोकनृत्यों की थिरकन, पारम्परिक वाद्य यंत्रों की गूंज और जनजातीय परम्पराओं की जीवंतता एक साथ दिखाई दी।

मंच पर प्रस्तुत रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कलाकारों ने अपनी प्रतिभा के माध्यम से बस्तर की उस सांस्कृतिक आत्मा को अभिव्यक्त किया, जो सदियों से जल, जंगल, जमीन, प्रकृति और सामुदायिक जीवन के साथ जुड़ी हुई है।

पारम्परिक वेशभूषा में सजे कलाकार, लोकवाद्यों की धुन पर थिरकते कदम, जनजातीय नृत्य की ऊर्जा और लोकगीतों की स्वर-लहरियाँ पूरे वातावरण को बस्तर की माटी की सुगंध से भर रही थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो बस्तर की संस्कृति स्वयं मंच पर उतरकर अपनी कहानी सुना रही हो।

? कलाकारों का सम्मान — हमारी संस्कृति का सम्मान

इस महोत्सव की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक रहा हमारे उन लोक कलाकारों, शिल्पकारों और संस्कृति साधकों का सम्मान, जिन्होंने अपना जीवन छत्तीसगढ़ की पारम्परिक कला एवं सांस्कृतिक विरासत को समर्पित किया है।

काष्ठ शिल्प, बेलमेटल शिल्प, लौह शिल्प, जनजातीय वाद्य यंत्र, पंडवानी, लोकनृत्य और लोकसंगीत जैसे क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले कलाकारों का सम्मान वास्तव में केवल व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि उनकी कला, उनकी परम्परा और बस्तर की सांस्कृतिक अस्मिता का सम्मान है।

समारोह के दौरान सम्मान एवं स्मृति-चिह्न प्रदान किए जाने के अनेक भावुक और गौरवपूर्ण क्षण कैमरे में कैद हुए। ये तस्वीरें आने वाले समय में इस बात की साक्षी रहेंगी कि कोंडागांव ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को केवल याद नहीं किया, बल्कि उसे सम्मान के साथ मंच भी दिया।

? संस्कृति तभी जीवित रहती है, जब नई पीढ़ी उससे जुड़ती है

आज आधुनिकता और तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश के बीच स्थानीय बोलियों, पारम्परिक कलाओं, लोकगीतों, लोकनृत्यों और मौखिक साहित्य के संरक्षण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।

बस्तर सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं कला परिषद का प्रयास इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें, अपने लोक कलाकारों को सम्मान दें, स्थानीय भाषाओं और बोलियों को बचाएँ तथा बच्चों और युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ें।

क्योंकि संस्कृति केवल संग्रहालयों में रखी कोई वस्तु नहीं है।

संस्कृति हमारी पहचान है।

संस्कृति हमारी स्मृति है।

संस्कृति हमारी जड़ों की आवाज है।

और संस्कृति ही आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सबसे अनमोल विरासत है।

? हरेली महोत्सव का संदेश

हरेली महोत्सव 2026 ने यह संदेश दिया कि कृषि और संस्कृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। खेतों में अन्न उगाने वाला किसान हो या अपनी कला से बस्तर की पहचान बनाने वाला कलाकार—दोनों हमारी धरती और हमारी परम्परा के सच्चे संवाहक हैं।

कोंडागांव की धरती पर आयोजित यह आयोजन निश्चित रूप से केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बस्तर की अस्मिता, गौरवशाली परम्पराओं और लोकजीवन को संरक्षित करने का एक सांस्कृतिक संकल्प था।

आज जब हम इन तस्वीरों को देखते हैं तो इनमें केवल मंच, कलाकार और सम्मान समारोह दिखाई नहीं देते, बल्कि इनके पीछे बस्तर की सदियों पुरानी संस्कृति, लोकजीवन की सरलता, कलाकारों का समर्पण और अपनी पहचान को बचाए रखने का संकल्प दिखाई देता है।

“हमारी संस्कृति • हमारी पहचान • हमारा अभिमान”

हरेली महोत्सव 2026 की ये स्मृतियाँ कोंडागांव और बस्तर की उस जीवंत सांस्कृतिक यात्रा की अमिट तस्वीरें हैं, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

बस्तर की माटी को नमन।

लोक कलाकारों को नमन।

हमारी संस्कृति और परम्पराओं को नमन।

हरेली तिहार की हार्दिक शुभकामनाएँ। ??

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