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विकास ठप्प, ठेकेदार गायब, निगम खजाना खाली—दुर्ग में ! सवाल यह नहीं कि गड़बड़ी कहाँ है, सवाल यह है कि जवाबदेही किसकी है?

  • rounak group

सुशासन का पोस्टर दुर्ग में फ टा हुआ,आयुक्त की कलम चल रही, शहर ठहर गया!


दुर्ग । शौर्यपथ ।

साल 2024 की दीपावली के बाद दुर्ग नगर पालिक निगम प्रशासन की कमान आयुक्त सुमित अग्रवाल के हाथों में आई। प्रदेश में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा "सुशासन" का दावा किया जा रहा है, लेकिन दुर्ग निगम क्षेत्र की जमीनी हकीकत इस दावे को आईना दिखाती नजर आ रही है। बड़े-बड़े वादों के सहारे भारतीय जनता पार्टी ने शहरी सरकार पर कब्जा तो कर लिया, पर शहर का विकास मानो फ ाइलों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सिमट कर रह गया है।
यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि दुर्ग निगम क्षेत्र में पसरी बदहाली की तस्वीर है। बीते लगभग एक वर्ष में विकास कार्य लगभग ठप्प हैं, ठेकेदार नजर नहीं आ रहे और निगम आर्थिक किल्लत से जूझ रहा है। इसके उलट, शहर भर में अव्यवस्थाओं का साम्राज्य तेजी से फैलता दिख रहा है, जिसने आयुक्त सुमित अग्रवाल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
चर्च रोड के पास अवैध बाजार, समृद्धि बाजार क्षेत्र में नियमों को ताक पर रखकर चल रही गतिविधियां, सुराना कॉलेज के सामने बदबूदार माहौल और संभावित बीमारियों का खतरा—ये सब निगम प्रशासन की कार्यशैली पर सीधा प्रश्नचिन्ह हैं। बड़े दुकानदारों के अवैध कब्जे आयुक्त की नजरों से ओझल हैं, जबकि गरीबों के ठेले-गुमठियों पर अतिक्रमण के नाम पर सख्ती दिखाई देती है। यही नहीं, अवैध रूप से हुए राम रसोई अनुबंध के मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई न होना, चयनात्मक प्रशासन की ओर इशारा करता है।
शहर के मध्य स्थित चौपाटी की बदहाल हालत "हमने बनाया, हम ही संवारेंगे" जैसे नारों की पोल खोल रही है। सड़कों पर आवारा मवेशियों की फौज, जगह-जगह गड्ढे, बदहाल चौक-चौराहे और नागरिकों को पीने के लिए दूषित जल—ये सब नगर निगम की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हैं। सुशासन तिहार में आवेदकों को गलत या भ्रामक जवाब देना और कार्रवाई के नाम पर चपरासियों व प्लेसमेंट कर्मचारियों को नोटिस थमाना, जबकि उच्च अधिकारियों को बचाने की रणनीति अपनाना, प्रशासनिक निष्पक्षता पर गहरी चोट है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि दुर्ग निगम क्षेत्र में भाजपा की शहरी सरकार होने के बावजूद, और यहीं भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. सरोज पाण्डेय, दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री ललित चंद्राकर तथा छत्तीसगढ़ शासन के कैबिनेट मंत्री गजेंद्र यादव का निवास स्थान होने के बावजूद, शहर की यह बदहाली आज चर्चा का विषय बनी हुई है।
ऐसे में आमजन के बीच यह सवाल गूंज रहा है—दुर्ग में ज्यादा ताकतवर कौन है? आयुक्त या फि र जनप्रतिनिधि?
शहर की अव्यवस्था, विकास की रफ्तार पर ब्रेक और निगम अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ कथित भेदभावपूर्ण कार्रवाई ने आयुक्त सुमित अग्रवाल की नैतिक जिम्मेदारी पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। अब निगाहें प्रदेश के उपमुख्यमंत्री अरुण साव और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय पर टिकी हैं—क्या वे दुर्ग निगम क्षेत्र की सुध लेंगे, या फिर "सुशासन" केवल सोशल मीडिया और विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाएगा?
दुर्ग की जनता आज जवाब चाहती है—क्योंकि सवाल सिर्फ विकास का नहीं, भरोसे का भी है।

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शौर्यपथ

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