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दुर्ग निगम में ‘चाय-नाश्ता मॉडल’ की कार्यवाही: अतिक्रमण बढ़ता गया, आयुक्त मौन रहे, महापौर निष्क्रिय दिखीं Featured

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कपड़ा लाइन में दिखावटी कार्रवाई, कुआं चौक-गढ़ कलेवा-पोस्ट ऑफिस क्षेत्र में खुलेआम अवैध गुमठियां, ₹200-₹500 के चालान में निपट रहा कानून

दुर्ग नगर पालिक निगम का अतिक्रमण विभाग एक बार फिर अपनी कार्यप्रणाली को लेकर सवालों के घेरे में है। जिस विभाग की जिम्मेदारी शहर को अतिक्रमण मुक्त रखने की है, वह अब कार्यवाही के नाम पर केवल चाय-नाश्ते तक सीमित नजर आ रहा है।

कपड़ा लाइन में हर बार वही कुछ दुकानदारों पर कार्रवाई कर अपनी “सक्रियता” साबित करने वाला निगम अमला, कुआं चौक जैसे व्यस्त इलाके में सड़कों तक फैले ठेले-गुमठियों पर पूरी तरह मौन दिखाई देता है। यातायात बाधित हो रहा है, आम नागरिक परेशान हैं, लेकिन अतिक्रमण विभाग की आंखें मानो बंद हैं।

पांडे जूस सेंटर द्वारा सड़क तक सामान फैलाने की कई बार लिखित व मौखिक शिकायतों के बावजूद, कार्रवाई केवल ₹200 से ₹500 के औपचारिक चालान तक सिमट जाती है। यह कार्रवाई नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बचने का तरीका प्रतीत होती है।

सबसे गंभीर मामला पोस्ट ऑफिस के बगल, शासकीय गढ़ कलेवा के सामने स्थापित अवैध गुमठी का है। यह गुमठी न केवल अवैध है, बल्कि विवादों से भी घिरी रही है। इसके बावजूद इसी गुमठी से हजारों रुपये के चाय-नाश्ते के बिल जिला पंचायत में पास होना, कई बड़े सवाल खड़े करता है।

जब यहां केवल चाय के अलावा कुछ भी उपलब्ध नहीं, तो आखिर इतने बड़े बिल किस आधार पर पास हो रहे हैं? और इस अवैध गुमठी को बचाने के लिए कौन अधिकारी अपनी संवैधानिक शक्तियों का दुरुपयोग कर रहा है—यह अब जांच का विषय बन चुका है।

हैरानी की बात यह है कि निगम का अतिक्रमण अमला इस गुमठी तक “कार्रवाई” के लिए पहुंचता तो है, लेकिन तस्वीरें खिंचवाकर बिना किसी ठोस कार्रवाई के लौट आता है। यह दृश्य साफ संकेत देता है कि कार्रवाई केवल कागजों और कैमरों तक सीमित है।

शहर में ऐसे कई कबाड़ी व्यवसाय भी संचालित हो रहे हैं, जिनके पास न तो निगम की अनुज्ञप्ति है और न ही वैध लाइसेंस। लाइसेंस विभाग, राजस्व विभाग और अतिक्रमण विभाग—तीनों को जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई न होना, मिलीभगत की आशंकाओं को और मजबूत करता है।

इस पूरे घटनाक्रम की सीधी प्रशासनिक जिम्मेदारी निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल पर आती है। प्रशासनिक मुखिया होने के नाते निगम के कार्यों की निगरानी, कर्मचारियों पर नियंत्रण और निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित करना उनकी संवैधानिक व नैतिक जिम्मेदारी है। लेकिन लगातार सामने आ रही भेदभावपूर्ण कार्रवाइयों ने आयुक्त की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं।

वहीं जनप्रतिनिधि के रूप में महापौर अलका बाघमार की चुप्पी और निष्क्रियता भी अब चर्चा का विषय बन चुकी है। जनता के हितों से जुड़े इतने गंभीर मामलों पर मौन रहना, शहरी सरकार की मुखिया की भूमिका पर सवाल खड़े करता है।

आज निगम कर्मचारियों से लेकर आम नागरिकों तक के बीच यही चर्चा है कि—

क्या दुर्ग नगर निगम में कानून सबके लिए बराबर है? या फिर अतिक्रमण पर कार्रवाई केवल कमजोरों तक सीमित रह गई है?

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