दुर्ग। शौर्यपथ।
शहर को सुंदर, स्वच्छ और अतिक्रमण-मुक्त बनाने को लेकर दुर्ग नगर निगम और शहरी सरकार की मुखिया महापौर श्रीमती अलका बाघमार द्वारा जारी की जा रही प्रेस विज्ञप्तियाँ देखने-पढ़ने में जितनी प्रशंसनीय लगती हैं, जमीनी हकीकत उससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। नगर निगम के अतिक्रमण विभाग द्वारा की जा रही कार्रवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुर्ग में कानून सभी के लिए समान है या फिर यह अमीर-गरीब देखकर लागू किया जा रहा है?
शहरी सरकार के निर्देश पर हाल ही में गरीब पसरा व्यापारियों और फुटपाथ पर रोजी-रोटी कमाने वालों पर कड़ी कार्रवाई की गई। उनका सामान जब्त कर लिया गया, वर्षों से चला आ रहा छोटा-सा व्यवसाय छीन लिया गया। दो वक्त की रोटी कमाने वाले इन लोगों को “अतिक्रमण-मुक्त शहर” के नाम पर बेरोजगार कर दिया गया।
परंतु इसी शहर के इंदिरा मार्केट स्थित गणेश मंदिर के सामने एक बिल्कुल अलग तस्वीर देखने को मिलती है। यहां सड़क की जमीन पर बड़े पैमाने पर ‘राम रसोई’ का संचालन खुलेआम किया जा रहा है। जनहित का नाम लिया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यहां एक होटलनुमा व्यावसायिक संचालन हो रहा है, जहां बाकायदा ₹20 प्रति थाली की तय कीमत रखी गई है।
जनहित के कार्यों पर किसी को आपत्ति नहीं, बल्कि यह सराहनीय है कि शहर के बड़े व्यापारी समाजसेवा में आगे आए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनहित के नाम पर सड़क की जमीन पर कब्जा जायज हो जाता है?
अगर यही नियम है, तो शहर में दर्जनों संस्थाएं हैं जो जनसेवा करती हैं—क्या सभी को सड़कों पर कब्जा करने की छूट दी जाएगी?
संविधान की नजर में अमीर और गरीब एक समान हैं, फिर दुर्ग में यह भेदभाव क्यों?
क्या नगर निगम की कार्रवाई सिर्फ गरीबों के लिए है और प्रभावशाली लोगों के लिए नियम बदल जाते हैं?
इतना ही नहीं, निगम कर्मचारियों से मिली जानकारी के अनुसार महापौर अलका बाघमार ने नगर निगम के व्यावसायिक परिसरों के बरामदों में व्यापार करने की अनुमति भी दे दी है। बड़ा सवाल यह है कि—
➡️ क्या किसी महापौर को यह संवैधानिक अधिकार है कि वह आम जनता के लिए बने बरामदों को दुकानों में तब्दील करने की अनुमति दे?
➡️ क्या दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में संविधान चलेगा या महापौर का निजी आदेश?