दुर्ग। प्रदेश में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय 'सुशासन' की नई इबारत लिखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन दुर्ग नगर निगम में बैठा 'बाजार विभाग' उनके इन दावों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की संदिग्ध कार्यशैली और बाजार प्रभारी शेखर चंद्राकर की रहस्यमयी चुप्पी ने आज शहर की व्यवस्था को नरक बना दिया है। सवाल यह है कि ये अधिकारी और जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हैं या फिर सफेदपोश रसूखदारों के 'चाटुकार' बनकर रह गए हैं?
राम रसोई: 'सेवा' की आड़ में ज़मीन का खेल और मिश्रा-चंद्राकर का मौन
बस स्टैंड स्थित 'राम रसोई' का मामला इस वक्त शहर में चर्चा का विषय है। प्रतिष्ठित व्यापारी चतुर्भुज राठी, जिनके पास धन-संपत्ति का अंबार है, उन्होंने राम रसोई के नाम पर बस स्टैंड की बेशकीमती ज़मीन हथिया ली। अनुबंध के मुताबिक दोनों समय भोजन देना था, लेकिन हकीकत में केवल एक समय की औपचारिकता निभाई जा रही है।
हैरत की बात यह है कि अनुबंध की समय सीमा खत्म हुए महीनों बीत गए, शिकायतें फाइलों में दफन हैं, लेकिन बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा कभी फाइल 'परिषद' में होने का बहाना बनाते हैं तो कभी 'सचिवालय' का। सचिवालय ने साफ कर दिया है कि फाइल उनके पास नहीं है। तो क्या मिश्रा जी ने यह फाइल टेबल के नीचे मिलने वाले 'काले धन' के बदले कहीं छिपा दी है?
सत्ता का सुख या सुशासन का अपमान?
महापौर श्रीमती अलका बाघमार खुद को विकास की वीरांगना कहलवाना पसंद करती हैं, लेकिन उनके नाक के नीचे बाजार प्रभारी शेखर चंद्राकर सत्ता की मलाई चाटने में व्यस्त हैं। चुनावी सीजन में बड़े-बड़े वादे करने वाले चंद्राकर अब रसूखदार कब्जेधारियों के सामने नतमस्तक क्यों हैं? छोटे गरीबों की गुमटियों पर बुलडोजर चलाने वाला निगम प्रशासन 'राम रसोई' के अवैध कब्जे के सामने 'भीगी बिल्ली' क्यों बन जाता है?
भाजपा की साफ-सुथरी छवि पर रसूखदारों का 'पोस्टर वार'
चतुर्भुज राठी जैसे व्यापारी, जो भाजपा कार्यालयों में नजर आते हैं और महापौर के पोस्टर लगाकर खुद को पार्टी का हितैषी बताते हैं, क्या उन्हीं के दबाव में अभ्युदय मिश्रा और शेखर चंद्राकर ने घुटने टेक दिए हैं? यदि मुख्यमंत्री के सुशासन का डंका बज रहा है, तो दुर्ग निगम के ये 'सिपहसालार' भाजपा की छवि को क्यों धूमिल कर रहे हैं?
कटाक्ष: दुर्ग निगम के इतिहास में शायद अभ्युदय मिश्रा पहले ऐसे बाजार अधिकारी होंगे, जिनके पास घोटालों की पूरी लिस्ट है, लेकिन कार्रवाई करने के नाम पर उन्हें 'लकवा' मार जाता है। वहीं शेखर चंद्राकर का मौन यह साबित कर रहा है कि उनके लिए जनता के हित नहीं, बल्कि खास लोगों से करीबी ज्यादा अहम है।
अगली किश्त में होगा बड़ा खुलासा...
बाजार विभाग का यह सड़ांध भरा खेल यहीं खत्म नहीं होता। इंदिरा मार्केट की पार्किंग में चल रही अवैध वसूली और उस पर अभ्युदय मिश्रा की 'सहमति वाली चुप्पी' का कच्चा चिट्ठा हम अगले अंक में खोलेंगे।
देखना होगा कि क्या महापौर अलका बाघमार सत्ता सुख का त्याग कर इन लापरवाह अधिकारियों पर चाबुक चलाती हैं, या फिर जनता यूं ही इन झूठे वादों के जाल में फंसकर त्रस्त रहेगी?