शौर्यपथ राजनीतिक | दुर्ग
दुर्ग शहर में मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai के संभावित 31 मई दौरे को लेकर राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच गया है। करोड़ों रुपए के विकास कार्यों की सौगात को लेकर अब “विकास किसका?” की लड़ाई खुलकर सामने आने लगी है। एक ओर मंत्री Gajendra Yadav समर्थक सोशल मीडिया में उन्हें “विकासशील पुरुष” साबित करने में जुटे हैं, तो दूसरी ओर महापौर Alka Baghmar के समर्थक इसे “शहरी सरकार की उपलब्धि” बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।
सोशल मीडिया पर चल रही इस राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो दुर्ग में विकास कार्यों के लिए आई राशि किसी सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि नेताओं के निजी संसाधनों से आई हो। जबकि शहर की जनता भली-भांति समझती है कि विकास के लिए आने वाला बजट जनता के टैक्स से संचालित शासन व्यवस्था का हिस्सा है, जिसे सरकार विभिन्न योजनाओं के तहत आवंटित करती है।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यदि वास्तविक उपलब्धियों की बात की जाए, तो दुर्ग को मिला आईटी पार्क एक ऐसा प्रोजेक्ट माना जा सकता है जिसे मंत्री गजेंद्र यादव की सक्रियता और प्रयासों से जोड़कर देखा जा रहा है। इसके अलावा सड़क चौड़ीकरण, उद्यान निर्माण, खेल मैदान या नालंदा परिसर जैसे कार्य सरकारों की नियमित विकास प्रक्रिया का हिस्सा माने जाते हैं। नालंदा परिसर तो राज्य सरकार की वह योजना है जिसे पूरे छत्तीसगढ़ में लागू किया जा रहा है।
दूसरी तरफ महापौर अलका बाघमार का कार्यकाल लगातार विवादों से घिरा रहा है। राजनीतिक गलियारों में उन्हें “सबसे विवादित महापौर” तक कहा जाने लगा है। नगर निगम की बैठकों से लेकर सड़क तक, कई ऐसे मामले सामने आए जिन्होंने शहरी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए।
कुआं चौक के गुमठी विवाद में कथित रूप से हाथ उठाने की चर्चा हो, देवनारायण चंद्राकर वार्ड में चयनात्मक अतिक्रमण कार्रवाई का मामला हो, या फिर प्रभावशाली लोगों पर नरमी बरतने के आरोप — विपक्ष ही नहीं, आम नागरिकों के बीच भी चर्चाओं का बाजार गर्म है। ओम ज्वैलर्स और अन्य कथित अतिक्रमण मामलों में नरमी तथा अवैध कब्जों के आरोपों से जुड़े लोगों के साथ मंच साझा करने जैसे मुद्दों ने भी महापौर की छवि पर असर डाला है।
इसके अलावा सुराना कॉलेज क्षेत्र की बदबूदार व्यवस्था, कसारीडीह नाले का अधूरा निर्माण, रविशंकर स्टेडियम में बन रहे उद्यान का धीमा कार्य, अवैध बाजारों का विस्तार, चौक-चौराहों पर बढ़ता अतिक्रमण और गुमठी आवंटन विवाद जैसे मुद्दे लगातार नगर निगम प्रशासन की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।
नगर निगम के बाजार विभाग प्रभारी शेखर चंद्राकर की कार्यप्रणाली को लेकर भी कई सवाल उठे, लेकिन महापौर की चुप्पी ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दी। आरोप यह भी लग रहे हैं कि निगम में अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर मौन रहना कहीं न कहीं अप्रत्यक्ष समर्थन जैसा संदेश दे रहा है।
अब पूरा राजनीतिक फोकस 31 मई पर टिक गया है। मुख्यमंत्री के दौरे में विकास कार्यों की प्रस्तुति किसके पक्ष में ज्यादा दिखाई देगी — “विकास की वीरांगना” कही जा रही महापौर अलका बाघमार के या “विकासशील मंत्री” की छवि गढ़ रहे गजेंद्र यादव के समर्थकों के?
फिलहाल दुर्ग की राजनीति में पोस्टर, सोशल मीडिया अभियान और समर्थकों की बयानबाजी ने माहौल को पूरी तरह चुनावी रंग दे दिया है। शहर की जनता विकास की वास्तविक तस्वीर तलाश रही है, जबकि सियासत श्रेय की लड़ाई में उलझी दिखाई दे रही है।