विधानसभा चुनाव की चर्चाओं के बीच राजनीतिक विश्लेषकों की राय—यदि सक्रिय राजनीति में आना है तो किसी एक दल के साथ स्पष्ट वैचारिक प्रतिबद्धता दिखानी होगी, अन्यथा समाजसेवा की सर्वस्वीकार्य छवि ही सबसे बड़ी पूंजी बनी रहेगी।
शौर्यपथ राजनितिक विश्लेषण
दुर्ग शहर के प्रमुख व्यापारी एवं समाजसेवी इंद्रजीत सिंह 'छोटूÓ इन दिनों एक बार फिर राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में हैं। हाल ही में उनके जन्मदिवस का भव्य आयोजन और उसमें विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की बड़ी भागीदारी ने यह चर्चा तेज कर दी है कि क्या वे भविष्य में विधानसभा चुनाव की राजनीति में कदम रख सकते हैं।
प्रदेश की वर्तमान राजनीति पर नजर डालें तो मुकाबला मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच सिमटता दिखाई देता है। क्षेत्रीय दलों का प्रभाव लगातार कम हुआ है और मतदाताओं का झुकाव भी दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों के इर्द-गिर्द केंद्रित होता जा रहा है। ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में यदि कोई नया चेहरा चुनावी राजनीति में उतरना चाहता है, तो उसके लिए केवल लोकप्रिय होना पर्याप्त नहीं, बल्कि किसी एक राजनीतिक विचारधारा के साथ स्पष्ट रूप से खड़ा होना भी आवश्यक माना जाता है।
इंद्रजीत सिंह 'छोटूÓ की सबसे बड़ी ताकत उनकी सामाजिक सक्रियता और जनसंपर्क है। वर्षों से वे विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और जनहित के कार्यों में सक्रिय रहे हैं, जिसके कारण उन्हें लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेताओं और समाज के विभिन्न वर्गों का सम्मान मिलता है। यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी भी है।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजसेवा और सक्रिय राजनीति की कार्यशैली अलग-अलग होती है। समाजसेवी सभी वर्गों के बीच समान स्वीकार्यता बनाए रख सकता है, लेकिन राजनीति में अंतत: किसी एक दल, उसकी विचारधारा और संगठन के साथ स्पष्ट प्रतिबद्धता दिखानी पड़ती है।
वर्तमान समय में भाजपा अपने लंबे समय से कार्य कर रहे संगठनात्मक कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देती रही है। वहीं कांग्रेस को लेकर कभी यह धारणा रही कि वह बाहरी या तथाकथित "हेलीकॉप्टर प्रत्याशियों" को भी अवसर देती है, लेकिन बदलते राजनीतिक माहौल में कांग्रेस संगठन भी अब लंबे समय से संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। ऐसे में किसी भी नए चेहरे के लिए केवल लोकप्रियता के आधार पर टिकट प्राप्त करना पहले की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इंद्रजीत सिंह 'छोटूÓ के समर्थकों की संख्या भी कम नहीं है, लेकिन यह भी एक चर्चा का विषय है कि उनके अधिकांश समर्थक व्यापारी और परिचित वर्ग से जुड़े दिखाई देते हैं जिनकी सामजिक एवं आम जनता से दुरी स्पष्ट नजर आता है । यदि वे भविष्य में राजनीति को अपना लक्ष्य बनाते हैं तो उन्हें ऐसा मजबूत संगठन तैयार करना होगा, जो उनकी अनुपस्थिति में भी आम जनता की समस्याओं को सुने, उनके बीच लगातार सक्रिय रहे और राजनीतिक आधार को मजबूत करे जिनकी आज कमी है ।
राजनीतिक गलियारों में यह भी कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में अभी पर्याप्त समय शेष है। यदि इंद्रजीत सिंह 'छोटूÓ वास्तव में राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं, तो उन्हें अभी से किसी एक दल और उसकी विचारधारा के प्रति अपना स्पष्ट झुकाव दिखाना होगा। राजनीति में लंबे समय तक दोनों पक्षों के साथ समान दूरी या समान निकटता बनाए रखने की रणनीति अब पहले जैसी प्रभावी नहीं मानी जाती।
दूसरी ओर, यदि वे राजनीति से दूरी बनाकर केवल समाजसेवा के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं, तो उनकी निष्पक्ष और सर्वस्वीकार्य छवि और अधिक मजबूत हो सकती है। समाजसेवा के क्षेत्र में उनकी पहचान किसी राजनीतिक सीमा में बंधे बिना लगातार विस्तार पा सकती है और यही उनकी सबसे बड़ी विरासत भी बन सकती है।
अंतत: फैसला इंद्रजीत सिंह 'छोटूÓ को ही करना है कि वे अपनी पहचान एक सफल समाजसेवी के रूप में आगे बढ़ाना चाहते हैं या फिर सक्रिय राजनीति की चुनौतियों को स्वीकार कर किसी राजनीतिक दल के साथ नई पारी शुरू करेंगे। आने वाले समय में उनका निर्णय न केवल उनकी राजनीतिक दिशा तय करेगा, बल्कि दुर्ग की राजनीति में भी नई चर्चाओं को जन्म दे सकता है।