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पानी के मामले में आखिर कब तक बाढ़ बनेगी ढाल?

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सामान्य सभा में जल प्रभारी लीना देवांगन से सवाल—तीन महीने की बाढ़ का जवाब देकर नौ महीने की पानी समस्या पर क्यों चुप्पी?

दुर्ग। दुर्ग नगर निगम की सामान्य सभा में पेयजल व्यवस्था को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर शहर की जल आपूर्ति व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। निर्धारित समय पर पानी नहीं मिलने की शिकायत पर जब पार्षद ने जल विभाग की प्रभारी श्रीमती लीना देवांगन से जवाब मांगा और अधिकारियों से लिखित जवाब देने की मांग की, तो पानी की देरी के पीछे बाढ़ की स्थिति को कारण बताया गया।

बाढ़ और अत्यधिक बारिश के दौरान जलापूर्ति प्रभावित होना स्वाभाविक परिस्थितियों से जुड़ा विषय हो सकता है। लेकिन सामान्य सभा में उठे सवाल का मूल मुद्दा इससे आगे का है—यदि बाढ़ के कारण साल में लगभग तीन महीने जल वितरण प्रभावित होता है, तो बाकी नौ महीनों में समय पर और निर्धारित अवधि में पानी नहीं मिलने की शिकायतों का कारण क्या है?

यही सवाल सामान्य सभा में चर्चा के दौरान सामने आया, लेकिन इस पर स्पष्ट जवाब सामने नहीं आ सका।

तीन महीने की बाढ़, नौ महीने का सवाल अनुत्तरित

जल विभाग की ओर से बाढ़ को पानी की देरी का कारण बताया जाना अपनी जगह है, लेकिन नगर निगम की जलापूर्ति व्यवस्था केवल बरसात के तीन महीनों तक सीमित नहीं है।

शहर के नागरिकों को वर्षभर निर्धारित समय और पर्याप्त दबाव के साथ पेयजल उपलब्ध कराना नगर निगम की नियमित जिम्मेदारी है। ऐसे में यदि किसी वार्ड में निर्धारित समय पर पानी नहीं पहुंच रहा है तो उसके पीछे पाइपलाइन, मोटर-पंप, टंकी, वाल्व संचालन, बिजली आपूर्ति, वितरण व्यवस्था अथवा विभागीय मॉनिटरिंग में से वास्तविक कारण क्या है—इसकी जानकारी जनता के सामने आनी चाहिए।

खास बात यह है कि जल विभाग से जुड़ी ऐसी समस्याओं पर पहले भी नगर निगम स्तर पर समीक्षा होती रही है। एक पूर्व समीक्षा में महापौर श्रीमती अलका बाघमार ने अधिकारियों को इंटकवेल से फिल्टर प्लांट तक मशीनरी की नियमित निगरानी और प्राकृतिक कारणों को छोड़कर मानवीय कारणों से पानी की आपूर्ति प्रभावित न होने देने के निर्देश दिए थे।

जब प्रभारी के वार्ड में ही सवाल खड़ा हो तो जवाबदेही किसकी?

सामान्य सभा में चर्चा के दौरान यह सवाल भी महत्वपूर्ण बनकर सामने आया कि यदि जल विभाग की प्रभारी के ही वार्ड में निर्धारित समय पर पानी नहीं पहुंच रहा है, तो विभागीय व्यवस्था की निगरानी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

यह किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का विषय नहीं, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही तय करने का सवाल है।

और जब पार्षदों द्वारा अधिकारियों के फोन नहीं उठाने अथवा शिकायतों का समय पर जवाब नहीं मिलने की बात भी सामान्य सभा में सामने आती है, तब सवाल और गंभीर हो जाता है कि जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच शिकायतों के समाधान की प्रभावी व्यवस्था आखिर कितनी सक्रिय है?

डेढ़ साल बाद भी वही सवाल—कहां है स्थायी समाधान?

महापौर श्रीमती अलका बाघमार के नेतृत्व वाली नगर निगम की वर्तमान परिषद को लगभग डेढ़ साल से अधिक समय हो चुका है। इस अवधि में जल आपूर्ति से संबंधित समस्याओं पर समीक्षा और निर्देश दिए जाने के बावजूद यदि सामान्य सभा में पार्षदों को निर्धारित समय पर पानी नहीं मिलने की शिकायत दोहरानी पड़ रही है, तो अब केवल कारण बताने के बजाय स्थायी समाधान की कार्ययोजना सामने आना जरूरी है।

हालांकि यह भी तथ्य है कि हालिया महीनों में निगम स्तर पर जलापूर्ति और तकनीकी समस्याओं की समीक्षा की गई है तथा अधिकारियों को मशीनरी, मोटर-पंप और पाइपलाइन संबंधी व्यवस्थाओं की निगरानी के निर्देश दिए गए थे।

ऐसे में सामान्य सभा का ताजा सवाल यह है कि निर्देशों का असर जमीन पर कितना दिखाई दे रहा है?

महापौर के सामने अब सीधी चुनौती—जिम्मेदारी तय होगी या जवाब फिर टलेगा?

शहर की जनता ने महापौर के रूप में श्रीमती अलका बाघमार को अपना प्रतिनिधि चुना है। इसलिए जलापूर्ति जैसी बुनियादी नागरिक सुविधा को लेकर उठने वाले सवालों पर अंतिम प्रशासनिक जवाबदेही की निगाह स्वाभाविक रूप से महापौर और निगम प्रशासन की ओर जाती है।

अब देखना यह है कि सामान्य सभा में सामने आए इन सवालों के बाद महापौर जल विभाग की कार्यप्रणाली की समीक्षा कर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका तय करती हैं या नहीं, तथा निर्धारित समय पर पानी उपलब्ध कराने के लिए कोई ठोस समयबद्ध व्यवस्था सामने आती है या नहीं।

जनता को बहाना नहीं, पानी चाहिए

बाढ़ हो, तकनीकी खराबी हो, बिजली की समस्या हो या पाइपलाइन में लीकेज—हर परिस्थिति का सामना करने के लिए नगर निगम के पास वैकल्पिक व्यवस्था और स्पष्ट आपात योजना होना जरूरी है।

क्योंकि नागरिकों के लिए सवाल यह नहीं है कि पानी क्यों नहीं आया। सवाल यह है कि पानी समय पर क्यों नहीं आया और अगली बार भी यही समस्या न हो, इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय हुई?

दुर्ग की सामान्य सभा में उठा यह सवाल अब केवल एक पार्षद के वार्ड का सवाल नहीं रह गया है। यह शहर की वर्षभर की पेयजल व्यवस्था, विभागीय जवाबदेही और ‘सुशासन’ के दावों की जमीनी कसौटी से जुड़ा सवाल बन चुका है।

नोट: हालिया उपलब्ध रिपोर्टों में 30 सितंबर 2026 की सामान्य सभा में पेयजल सहित विभिन्न नागरिक सुविधाओं पर चर्चा प्रस्तावित होने की पुष्टि मिलती है। � साथ ही सितंबर 2026 में महापौर अलका बाघमार और आयुक्त लीना कोसम द्वारा जलभराव/जलनिकासी की व्यवस्थाओं का निरीक्षण भी रिपोर्ट हुआ है। 

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