September 11, 2026
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    Naresh Dewangan

    Naresh Dewangan

    कोंडागांव, शौर्यपथ। कल पूरे देश में शिक्षक दिवस बड़े ही धूमधाम से मनाया गया और बनाया भी जाना चाहिए क्योंकि शिक्षा ही इस देश का मूल आधार है शिक्षा के बिना जग अंधेरा है पर क्या आप किसी ने सोचा की हमारी शिक्षा व्यवस्था में कुछ शिक्षक ऐसे भी हैं जो बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, जिनको उस कुर्सी में बैठने के लिए और बच्चों की जीवन को बचाने व सुरक्षित करने के लिए सरकार उनके ऊपर 100000 ₹150000 का खर्चा कर रही है पर वो सोचते हैं पर जब बच्चों की को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने और उन्हें न्याय दिलाने की बात आती है तब ये अपना दरवाज़ा बंद कर लेते है। कभी बहाना करते हैं कि सीट फुल हो गया, तो कभी बहाना करते हैं कि आपका यह कागज नहीं है। वो ऐसा ही मामला ग्राम कोरोबेड़ा का है। यहां के बच्चो के सिर्फ माँ बाप नहीं होने का सजा इन्हें मिल रहा है और ये सजा, ये अपनी किस्मत से नहीं भोग रहे है हमारे शिक्षकों की वजह से भोग रहे हैं, कभी उन बच्चों को आधार कार्ड के कारण स्कूल से निकाल दिया गया जब आधार कार्ड बन गया तो जिला कलेक्टर के आदेश को नजरअंदाज करते हुए उन बच्चों को फिर से गाँव भेज दिया गया। गाँव के हॉस्टल में जब जाकर वह बोले कि इन्हें यहां रख के ही पढ़ाना है तो वहां के टीचर बोले कि हमारे पास सीट फूल हो गया है। आप अपने घर से पैदल आ जाओ, जो कि उनका घर 4 km दूर है टीचर को यह शब्द बोलने से पहले ये सोचना चाहिए कि यह सिर्फ दूर नहीं बीच में जंगल है, नदी है, नाले हैं। और बच्चों की उम्र मात्र 5 -6 साल है, यह घटना न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था पर आवाज़ उठाती है। ये घटना यह भी बताती है कि बिना माँ बाप के बच्चों का जीना इस समाज में इस देश में कितना मुश्किल है जहां इन्हें हर कदम पर यह एहसास दिलाया जाता है कि तुम्हारे लिए कोई नहीं है तुम अकेले हो यही दुनिया का सबसे बड़ा हकीकत है कि जहां पूरे समाज को पूरे प्रशासन को इनका परिवार बनके इनके लिए काम करना था वह इन्हें गली गली भटकने पर मजबूर कर दिया गया।

    जिला कलक्टर ने कोशिश भी किया। आदेश भी किया पर जो जवाबदार अधिकारी है, उन्हें कोई मतलब नहीं सिर्फ उनके बच्चे अच्छे स्कूलों में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ लें, डॉ इंजीनियर कमिश्नर बन जाए।हमें गरीबों के बच्चों से क्या लेना है?इन्हें मानसिकता के साथ आज पुरा सिस्टम कार्य कर रहा है, यह मात्र सिर्फ दो बच्चों की कहानी नहीं है।यह उन तमाम जरूरतमंद, यह तमाम अनाथ तमाम गरीब और गरीबी से जूझ रहे उन बच्चों की कहानी है जो पढ़ना तो चाहते हैं, पर उन्हें मजबूर किया जाता है कि तुम्हारे लिए शिक्षा नहीं बनी है।और यही बच्चे जब शिक्षा से वंचित रह जाते हैं कोई गलत काम करते हैं नशा करते हैं या किसी और घटना को अंजाम दे देते हैं। तो यही प्रशासन अपने लाखों और करोड़ों की बिल्डिंग में बैठकर तक चर्चा करते हैं। ये हमारे क्षेत्र का हमारे जिले का लॉयन ऑर्डर कैसे बिगड़ रहा है कौन है यह है ये गुंडा कौन है यह नशेड़ी है, और उठाकर उसे जेल भेज दिया जाता है पर क्या उसकी आपबीती जानने का या उसे पहचानने का या किस कारण से आज उसका यह हालत हुई है इसके ऊपर कभी किसी ने सोचा है किसी ने चर्चा किया है इसका कारण भी यही समाज है यही प्रशासन है जब वो न समझ था तो स्कूल स्कूल घूम रहा था कि मुझे कोई पढ़ा लो उस समय कोई पढ़ाने वाला नही था और ना ही कोई सहारा देने वाला था हमें उन चीजों में भी विचार करना और सोचने की उतनी ही जरूरी है की हम प्रशासन के सबसे बड़े पद और प्रतिष्ठा में बैठकर। हमने उन नौजवान, वो अनाथ, उन गरीब जरूरतमंद बच्चों के लिए क्या किया है। कि आज वो बर्बादी के सबसे ऊंचे पायदान पर पहुंच गये। वो नहीं पहुंचे, उन्हें हमारे सिस्टम ने हमारे समाज भी उतना ही जिम्मेदार है जितना उस बच्चे की मजबूरी जिम्मेदार थी ये हम सभी के लिए प्रश्नवाचक चिन्ह है।क्या हमने अपने समाज के लिए अपने बच्चों के लिए क्या किया है?

    सुकमा, शौर्यपथ। जिले के कोंटा ब्लॉक में जगदलपुर की टीम एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए ब्लॉक शिक्षा अधिकारी को 10 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया है। कार्रवाई के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है।

    जानकारी के अनुसार, कोंटा विकासखंड शिक्षा कार्यालय में पदस्थ खंड शिक्षा अधिकारी चंद्र कुमार यारदा पर एक महिला कर्मचारी से एरियर्स की राशि निकलवाने के एवज में रिश्वत मांगने का आरोप है। महिला कर्मचारी ने इसकी शिकायत जगदलपुर की टीम एंटी करप्शन ब्यूरो से की थी।

    शिकायत के सत्यापन के बाद जगदलपुर की ACB की टीम ने योजना के तहत कार्रवाई की। बताया जा रहा है कि जैसे ही महिला कर्मचारी ने अधिकारी को 10 हजार रुपये की रिश्वत दी, मौके पर पहुंची ACB की टीम ने चंद्र कुमार यारदा को रिश्वत की रकम के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया।

    ACB की टीम द्वारा आरोपी अधिकारी के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है। इस कार्रवाई के बाद सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं।

    By - नरेश देवांगन 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। सुशासन के दावों के बीच वन मंत्री के गढ़ में ही कुशासन की तस्वीर सामने आई है। साय सरकार सरकारी धन की बर्बादी रोकने और लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई की बात करती है, लेकिन वन मंत्री केदार कश्यप के विभाग से जुड़े वन विद्यालय जगदलपुर में सरकारी निर्माण सामग्री की दुर्दशा विभागीय निगरानी पर सवाल खड़े कर रही है। मंत्री के लगातार बस्तर दौरे के बावजूद जिला मुख्यालय पर ही यदि सरकारी सामग्री खराब होने की स्थिति में पहुंच जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर निगरानी हो कहां रही है और जिम्मेदारी किसकी है?

    वन विद्यालय जगदलपुर में निर्माण कार्य के लिए मंगाया गया बड़ी मात्रा में सीमेंट उचित रखरखाव के अभाव में बोरियों में ही जमकर पत्थर जैसा हो गया है। मौके पर पड़े ढेर को देखकर इसकी मात्रा लगभग 800 बोरी से अधिक होने का अनुमान है। हालांकि वास्तविक मात्रा विभागीय रिकॉर्ड और भौतिक सत्यापन के बाद ही स्पष्ट होगी।

    विभागीय सूत्रों के अनुसार, यहां बाउंड्रीवाल के साथ ऑडिटोरियम निर्माण का कार्य भी प्रस्तावित था। निर्माण अधूरा रहने के बाद सीमेंट को शेड के नीचे रखा गया, लेकिन पर्याप्त सुरक्षित भंडारण नहीं होने के कारण नमी आदि से सीमेंट खराब होने की स्थिति सामने आई है।

     

    सीमेंट खराब हुआ या सरकारी धन?

    सवाल यह है कि सीमेंट कब और कितनी मात्रा में खरीदा गया, उसकी कीमत कितनी थी, निर्माण कार्य कब से बंद है और सामग्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी किस अधिकारी-कर्मचारी की थी? सरकारी पैसा लगाकर खरीदा गया सीमेंट निर्माण में इस्तेमाल होने से पहले ही पत्थर बन जाए, तो इसे महज संयोग मानें या निगरानी की नाकामी—इसका जवाब जांच से मिलना चाहिए।

    प्रशासन को तत्काल मौके का भौतिक सत्यापन कर सीमेंट की वास्तविक मात्रा, खरीद बिल-वाउचर, स्टॉक रजिस्टर, निर्माण कार्य और भंडारण व्यवस्था की जांच करनी चाहिए। यदि जांच में लापरवाही प्रमाणित होती है तो संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

    वही इस मामले पे जनता का कहना है की “सरकारी धन कोई निजी संपत्ति नहीं, जनता की गाढ़ी कमाई है; इसकी बर्बादी पर जवाबदेही तय होना जरूरी है।”

     

    इस मामले पर वन विद्यालय जगदलपुर के संचालक शमा फारुकी से जब फ़ोन पे जानकारी चाही गई तो उनका कहना है की सीमेंट ठीक है, ओर काम जल्द हि चालू हो जायेगा।

    " लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है की पत्थर बन चुके सीमेंट से जिम्मेदार अधिकारी निर्माण कार्य शुरू कैसे करेंगे? "

    जगदलपुर में एक सप्ताह के भीतर खाद विभाग की दूसरी बड़ी कार्रवाई, अवैध चावल कारोबारियों में मचा हड़कंप

    जगदलपुर, शौर्यपथ। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत गरीब एवं पात्र राशन कार्डधारकों को निःशुल्क वितरित किए जाने वाले चावल की अवैध खरीदी-बिक्री के खिलाफ खाद विभाग ने शुक्रवार को बड़ी कार्रवाई करते हुए शहर के भवानी चाट भंडार के पीछे स्थित दीप्ती बाड़ा के एक गोदाम से लगभग 378 बोरा (करीब 186 क्विंटल) पीडीएस चावल, लगभग 3 क्विंटल चना, 100 पीडीएस बारदाना तथा लोडिंग में लगे 12 चक्का ट्रक (CG 04 LC 9409) को जब्त किया है। बताया जा रहा है कि ट्रक रायपुर का है और कार्रवाई के समय उसमें चावल लोड किया जा रहा था।

    जानकारी के अनुसार खाद विभाग को गुप्त सूचना मिली थी कि गोदाम से बड़ी मात्रा में पीडीएस चावल बाहर भेजने की तैयारी चल रही है। सूचना मिलते ही विभाग की टीम ने मौके पर दबिश दी और कार्रवाई को अंजाम दिया। जब्त चावल को सुरक्षित रखने के लिए निकटस्थ शासकीय उचित मूल्य दुकान में रखवाया गया, जबकि ट्रक को आगे की वैधानिक कार्रवाई के लिए कोतवाली थाना पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया है। पूरे मामले की रिपोर्ट जिला कलेक्टर को भेजी गई है।

    विभाग के अनुसार, इस मामले का संबंध मोहम्मद जिलानी नामक व्यक्ति से बताया जा रहा है। मामले की जांच जारी है और जांच के आधार पर आगे की वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

    खाद विभाग की एक सप्ताह के भीतर यह दूसरी बड़ी कार्रवाई मानी जा रही है। लगातार हो रही छापेमार कार्रवाई से शहर में पीडीएस चावल की अवैध खरीदी-बिक्री से जुड़े लोगों में हड़कंप मच गया है। विभाग के सख्त रुख से ऐसे कारोबार में संलिप्त लोगों के बीच भय का माहौल देखा जा रहा है।

    सूत्रों के हवाले से यह भी जानकारी सामने आई है कि संबंधित व्यक्ति के परिवार के एक सदस्य द्वारा शासकीय उचित मूल्य (राशन) दुकान का संचालन किए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में जांच के दौरान यह भी स्पष्ट किया जाना महत्वपूर्ण होगा कि कहीं कथित अवैध चावल खरीदी-बिक्री के साथ-साथ पात्र हितग्राहियों के लिए आवंटित पीडीएस राशन के वितरण में किसी प्रकार की अनियमितता या हेराफेरी तो नहीं हुई। इस संबंध में वास्तविक स्थिति जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

    पीडीएस का चावल शासन द्वारा गरीब और जरूरतमंद परिवारों को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। ऐसे चावल का अवैध भंडारण, परिवहन अथवा व्यापार न केवल शासन की जनकल्याणकारी योजना को प्रभावित करता है, बल्कि पात्र हितग्राहियों के अधिकारों पर भी सीधा असर डालता है। अब इस मामले में जांच पूरी होने और दोषियों पर होने वाली कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।

    By- नरेश देवांगन 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। बोधघाट थाना क्षेत्र से हाटकचोरा एवं करकापाल जाने वाले मार्ग के दोनों ओर संबंधित विभाग द्वारा विभिन्न स्थानों पर "कचरा फेंकना मना है" संबंधी सूचना बोर्ड लगाए गए हैं। इन बोर्डों का उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकने की प्रवृत्ति को रोकना और स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाना बताया जाता है।

    हालांकि, मार्ग से गुजरने वाले कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन स्थानों पर ऐसे बोर्ड लगाए गए हैं, उनमें से कई स्थानों के आसपास कचरा दिखाई देता है। इससे यह प्रश्न उठ रहा है कि केवल सूचना बोर्ड लगाने से अपेक्षित परिणाम प्राप्त हो रहे हैं या नहीं।

    स्थानीय नागरिकों के अनुसार स्वच्छता बनाए रखने के लिए जागरूकता के साथ-साथ नियमित निगरानी, कचरा संग्रहण की पर्याप्त व्यवस्था तथा नियमों के प्रभावी पालन की भी आवश्यकता है। उनका मानना है कि यदि प्रतिबंध संबंधी सूचनाओं के साथ व्यवहारिक प्रबंधन की व्यवस्था मजबूत हो, तो सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकने की समस्या में कमी लाई जा सकती है।

    क्षेत्र के कुछ लोगों का यह भी कहना है कि सूचना बोर्ड लगाने पर सार्वजनिक धन खर्च किया गया है, इसलिए समय-समय पर इसके प्रभाव का मूल्यांकन किया जाना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि अभियान अपने उद्देश्य की पूर्ति कर रहा है या नहीं।

    स्वच्छता से जुड़े मुद्दों पर कार्य करने वाले जानकारों का मानना है कि किसी भी जागरूकता अभियान की सफलता केवल संदेश प्रसारित करने से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन और जनभागीदारी से तय होती है। ऐसे में संबंधित क्षेत्रों में स्वच्छता व्यवस्था की नियमित समीक्षा किए जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

    By- नरेश देवांगन 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। बस्तर जिले में अवैध खनिज उत्खनन और परिवहन पर लगाम कसने के लिए खनिज विभाग द्वारा लगातार सख्त और प्रभावी कार्रवाई की जा रही है। संचालक खनिज एवं बस्तर कलेक्टर के निर्देश पर चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत जिला खनिज जांच उड़नदस्ता दल ने विभिन्न क्षेत्रों में औचक निरीक्षण कर अवैध कारोबारियों पर बड़ी कार्रवाई करते हुए 36 वाहनों को जब्त किया है।

    खनिज विभाग की इस सक्रियता को जिले में प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और राजस्व संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विभागीय टीम ने उपनपाल, देवड़ा, कोडेनार, बड़ेआमाबाल, कोरपाल, बेलगांव, धरमपुरा, जगदलपुर, कुम्हरावंड, पिपलावंड, बजावंड, बडांजी, तारापुर और बनियागांव सहित कई क्षेत्रों में लगातार निरीक्षण किया। जांच के दौरान अवैध रूप से रेत एवं चुना पत्थर का उत्खनन, परिवहन और भंडारण करते पाए जाने पर संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की गई।

    कार्रवाई के दौरान जब्त किए गए सभी वाहनों को पुलिस अभिरक्षा में सौंप दिया गया है, वहीं चार भंडारणकर्ताओं के खिलाफ भी प्रकरण दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जा रही है। खनिज विभाग ने स्पष्ट किया है कि अवैध खनिज गतिविधियों में संलिप्त लोगों के खिलाफ छत्तीसगढ़ गौण खनिज नियमावली 2015 एवं खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम 1967 के तहत कठोर दंडात्मक कार्रवाई जारी रहेगी।

    खनिज विभाग की इस मुहिम से अवैध खनिज कारोबारियों में हड़कंप मचा हुआ है, वहीं आम लोगों में प्रशासन की सक्रियता को लेकर सकारात्मक संदेश गया है। विभागीय अधिकारियों की सतर्कता और मैदान स्तर पर लगातार निगरानी से यह साफ संकेत मिला है कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

    इस अभियान में खनि अधिकारी शिखर चेरपा, सहायक खनि अधिकारी जागृत गायकवाड, खनि निरीक्षक अंकित पुरी, अनि सिपाही डिकेश्वर खरे, नगर सैनिक विजय कश्यप, कृष्णा बघेल एवं सहदेव बघेल सहित जिला खनिज जांच उड़नदस्ता दल के सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    कोंडागांव, शौर्यपथ।  छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद कोंडागांव जिला 2012 से जिला घोषित हो गया था जिसके बाद से अब तक जिले में सभी जिलेवासियों को शासन की सभी योजनाओं को पूरा किया जा रहा है । मगर एक तरफ ध्यान दिया जाए तो एक बड़ी बात सामने आती है देश एक कठनाई से गुजर रहा है जहाँ पेट्रोल व डीजल की किल्लत देखा जा रहा है।

    वही अगर बात करे कोंडागांव की तो  

    न्यायालय कैदियों को जगदलपुर या नारायणपुर जेल भेजती है जो कोंडागांव मुख्यालय से 60 से 50 किलोमीटर दूर पड़ता है जहाँ रोजना कैदियों को लाने में मशक्कत की जाती है अगर कोंडागांव जिला मुख्यालय में भी एक जेल या उप जेल बन जाए तो पुलिस को राहत मिलेगी।

    समस्या क्या है?

    कोंडागांव को 2012 में जिला घोषित किया गया था

    इसके बावजूद यहां अभी तक जिला जेल/उप-जेल नहीं है

    कोर्ट (न्यायालय) से कैदियों को जगदलपुर या नारायणपुर भेजा जाता है

    यह दूरी लगभग 50–60 किलोमीटर है

    इससे क्या दिक्कतें हो रही हैं?

    पुलिस को रोज कैदियों को ले जाने में अधिक मेहनत और संसाधन खर्च

    पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच आर्थिक बोझ

    सुरक्षा जोखिम भी बढ़ता है (लंबी दूरी पर ट्रांजिट)

    कैदियों और उनके परिजनों को असुविधा

    अब देखने वाली बात होगी कि शौर्यपथ की इस खबर से जिला प्रशासन व शासन क्या कदम उठाएगी।

    By- नरेश देवांगन 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। डिमरापाल आयुष औषधालय में नियमित उपस्थिति को लेकर शिकायत के बाद अब मामले में एक नया पहलू सामने आया है। विभागीय सूत्रों एवं संबंधित पक्षों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, शिकायत के बाद जिला आयुष अधिकारी द्वारा संबंधित चिकित्सा अधिकारी से चर्चा की गई, जिसमें कथित रूप से नियमित उपस्थिति प्रभावित होने के पीछे “अत्यधिक गर्मी” एवं व्यक्तिगत कारणों का उल्लेख किया गया।

    सूत्रों के अनुसार, संबंधित चिकित्सा अधिकारी ने चर्चा के दौरान कहा कि अत्यधिक तापमान के कारण लंबे समय तक अस्पताल में बैठने में कठिनाई होती है। इस पर जिला आयुष अधिकारी ने कथित तौर पर नाराजगी व्यक्त करते हुए यह कहा कि शासकीय सेवा में निर्धारित समय तक उपस्थित रहकर मरीजों को सेवाएं देना आवश्यक दायित्व है और अन्य अधिकारी-कर्मचारी भी समान परिस्थितियों में कार्य कर रहे हैं।

    बताया जा रहा है कि इसके बाद संबंधित चिकित्सा अधिकारी द्वारा पारिवारिक परिस्थितियों, विशेषकर अपनी स्कूली बेटी की देखभाल का उल्लेख करते हुए नियमित उपस्थिति में कठिनाई होने की बात कही गई। साथ ही यह भी चर्चा में आया कि उनकी व्यक्तिगत परिस्थितियों की जानकारी विभागीय स्तर पर होने के कारण उन्हें ऐसे स्थान पर पदस्थ किया गया, जहां आवागमन अपेक्षाकृत सुगम हो। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकारी अस्पताल “व्यक्तिगत सुविधा केंद्र” बनते जा रहे हैं? यदि व्यक्तिगत कारणों और मौसम को आधार बनाकर नियमित ड्यूटी प्रभावित होगी, तो दूरदराज के मरीज आखिर किस भरोसे सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की ओर देखें?

    सबसे हैरान करने वाली बात यह बताई जा रही है कि बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अनुपस्थित रहने के बावजूद हाजिरी में अनुपस्थिति दर्ज नहीं होती। हालांकि, इन बिंदुओं की आधिकारिक पुष्टि विभागीय जांच के बाद ही संभव होगी।

    अब मुख्य प्रश्न यह है कि यदि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में नियमित सेवाएं प्रभावित होती हैं, तो इसका सीधा असर ग्रामीण मरीजों पर पड़ता है। ऐसे में आमजन की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विभाग इस मामले में तथ्यात्मक जांच कर क्या निष्कर्ष निकालता है और नियमानुसार क्या कदम उठाए जाते हैं।

    By- नरेश देवांगन 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। सरकार आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए भरसक प्रयास कर रही है, योजनाएं बन रही हैं, बजट खर्च हो रहा है—लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ गैर-जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों की कार्यशैली इन प्रयासों पर सवाल खड़े करती दिख रही है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं मानो जनता का पैसा और सरकारी मंशा, दोनों ही कागज़ों में बेहतर और जमीन पर कमजोर पड़ रहे हों। सबसे चिंताजनक यह है कि जिन अधिकारियों को जिले में निरीक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है, उन्हें भी यह सब या तो दिखाई नहीं दे रहा, या फिर प्राथमिकता में नहीं है।

    इसी क्रम में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र काकलूर से सामने आई जानकारियों ने व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर यह बात सामने आई है कि केंद्र में पदस्थ आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी द्वारा नियमित रूप से ड्यूटी का निर्वहन नहीं किया जा रहा है, जिससे मरीजों को निरंतर सेवाएं मिल पाना प्रभावित हो रहा है।

    मामले को और गंभीर बनाते हुए विभागीय सूत्रों का दावा है कि संबंधित महिला चिकित्सा अधिकारी महीने में एक बार आ जाएं तो ही “बहुत” माना जाता है, जबकि कभी-कभार तो वे लंबे समय तक अनुपस्थित रहती हैं। सूत्र यह भी बताते हैं कि उनके पति—जो स्वयं अन्य स्थान पर पदस्थ बताए जाते हैं—सप्ताह में एक बार आकर उपस्थिति रजिस्टर, ओपीडी रजिस्टर सहित अन्य आवश्यक प्रविष्टियां भरते नजर आते हैं। यदि यह तथ्यात्मक रूप से सही है, तो यह व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

    सूत्रों के अनुसार, यह सब संभव होने के पीछे स्थानीय स्तर पर “संरक्षण” की चर्चा भी है, जिसमें विकासखंड चिकित्सा अधिकारी की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, यह पहलू जांच का विषय है और आधिकारिक पुष्टि के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

    ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकारी स्वास्थ्य संस्थान अब जिम्मेदारी से अधिक “व्यवस्था के भरोसे” चल रहे हैं? और क्या निगरानी तंत्र केवल कागज़ों तक सीमित रह गया है? यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन है, बल्कि आमजन के विश्वास के साथ भी गंभीर समझौता है।

    अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं—क्या पारदर्शी जांच और कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगा।

    नरेश देवांगन 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए सरकारी घोषणाएं तेज़ हैं, मगर डिमरापाल में तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती दिख रही है। सवाल सीधा है—जब अस्पताल ही नियमित रूप से संचालित न हो, तो मरीज इलाज कहां कराएं? योजनाओं की चमक और ज़मीनी हकीकत के बीच यह फासला न सिर्फ व्यवस्थाओं पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि आयुर्वेद की साख पर भी असर डाल सकता है। और सबसे दिलचस्प बात—निगरानी तंत्र को जैसे यह सब दिखता ही नहीं, या दिखता है तो दर्ज नहीं होता।

    इसी कड़ी में शासकीय आयुर्वेद औषधालय डिमरापाल चर्चा में है, जहां सेवाएं कथित तौर पर “हफ्ते में एक-दो दिन” तक सिमट गई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि डॉक्टर की नियमित अनुपस्थिति के चलते उन्हें छोटे-छोटे इलाज के लिए भी इधर-उधर भटकना पड़ता है, जबकि रजिस्टरों में सब कुछ ‘समय पर’ और ‘नियमित’ बताया जाता है।

    “शौर्यपथ” टीम के निरीक्षण में सोमवार से बुधवार तक चिकित्सा अधिकारी मौजूद नहीं मिलीं। गुरुवार—सियान जतन —पर अस्पताल में उपस्थिति दर्ज कर सेवाएं दी जाती दिखीं। ग्रामीणों के शब्दों में, “यहां इलाज नहीं, हाजिरी का कैलेंडर चलता है।”

    सूत्रों के अनुसार, उपस्थिति और ओपीडी आंकड़ों के बीच अंतर की आशंका जताई जा रही है। संबंधित चिकित्सा अधिकारी ने अनौपचारिक बातचीत में पारिवारिक कारणों—विशेषकर छोटे बच्चों की देखभाल—का हवाला देते हुए बताया कि वे प्रतिदिन उपस्थित नहीं हो पातीं। साथ ही यह भी संकेत दिया कि मरीजों की संख्या कम होने के बावजूद नियमित आंकड़े प्रस्तुत करने का दबाव रहता है, जिसके चलते प्रविष्टियों में अंतर आ सकता है। सवाल यह है कि अगर आंकड़े ही इलाज बन जाएं, तो मरीज का भरोसा किस पर टिका रहेगा?

    मामले की सूचना जिला आयुर्वेद अधिकारी को दिए जाने पर त्वरित कार्रवाई का आश्वासन मिला और 20 दिन पहले शिकायत भी सौंपी गई। लेकिन “तत्काल” शब्द फिलहाल फाइलों में ही सक्रिय नजर आता है—स्थानीय स्तर पर किसी ठोस कार्रवाई की पुष्टि अब तक सामने नहीं आई है। ऐसे में यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या व्यवस्था में ‘सब ठीक है’ मान लेना ही नई कार्यप्रणाली बन गई है?

    अब नजरें इस बात पर हैं कि क्या जिम्मेदार अधिकारी इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर आवश्यक कार्रवाई करेंगे, या फिर डिमरापाल का औषधालय यूं ही कागज़ों में रोज़ खुलता रहेगा और ज़मीन पर हफ्ते में एक-दो दिन ही दिखाई देगा।

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