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दुर्ग | नगर पालिक निगम | 04 अप्रैल
देशभर में स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 लागू कर दिए हैं। ये नियम 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी हो चुके हैं और इनके तहत कचरा प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक, जवाबदेह और प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया है।
इन नियमों का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब थोक अपशिष्ट उत्पादकों (Bulk Waste Generators) को अपने स्तर पर ही कचरे का प्रसंस्करण करना अनिवार्य कर दिया गया है, जिससे नगर निकायों पर भार कम होगा और शहरों में कचरे के ढेर की समस्या पर नियंत्रण लगेगा।
? “वेस्ट हायरेरकी” पर आधारित नई व्यवस्था
नए नियम Waste Hierarchy के सिद्धांत पर आधारित हैं, जिसमें प्राथमिकताएं इस क्रम में तय की गई हैं—
कचरे का न्यूनतम उत्पादन
पुनः उपयोग (Reuse)
पुनर्चक्रण (Recycle)
ऊर्जा पुनर्प्राप्ति
अंत में सुरक्षित निपटान
यह प्रणाली चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है।
? लैंडफिल पर सख्ती, छंटाई जरूरी
अब केवल गैर-पुनर्चक्रणीय और निष्क्रिय कचरा ही लैंडफिल में भेजा जाएगा।
यदि बिना छंटाई के कचरा भेजा गया, तो उस पर अधिक शुल्क लगाया जाएगा, जिससे स्रोत स्तर पर ही पृथक्करण को बढ़ावा मिलेगा।
? थोक अपशिष्ट उत्पादकों की नई परिभाषा
नए नियमों के तहत इन संस्थाओं को थोक अपशिष्ट उत्पादक माना जाएगा—
20,000 वर्ग मीटर या अधिक क्षेत्र वाले भवन
प्रतिदिन 40,000 लीटर से अधिक जल उपयोग करने वाले संस्थान
100 किलोग्राम या अधिक दैनिक कचरा उत्पन्न करने वाली इकाइयाँ
इसमें हाउसिंग सोसायटी, विश्वविद्यालय, होटल, वाणिज्यिक प्रतिष्ठान और सरकारी संस्थान शामिल हैं।
? चार श्रेणियों में अनिवार्य कचरा पृथक्करण
अब हर स्तर पर कचरे को इन चार भागों में बांटना अनिवार्य होगा—
गीला कचरा
सूखा कचरा
सैनिटरी कचरा
विशेष कचरा (ई-वेस्ट, बैटरी, ट्यूबलाइट आदि)
इससे रीसाइक्लिंग प्रक्रिया तेज होगी और प्रदूषण में कमी आएगी।
? थोक उत्पादकों की जिम्मेदारी तय
नियमों के अनुसार—
गीले कचरे का स्थल पर ही निपटान/कम्पोस्टिंग अनिवार्य
बाहर प्रसंस्करण की स्थिति में EBWGR प्रमाणपत्र आवश्यक
सुरक्षित संग्रहण, परिवहन और प्रसंस्करण की जिम्मेदारी स्वयं की
इसके साथ ही, एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से रियल-टाइम मॉनिटरिंग भी की जाएगी।
? क्यों महत्वपूर्ण हैं ये नियम?
इन नियमों के लागू होने से—
नगर निगमों पर आर्थिक और संचालन भार कम होगा
कचरा प्रबंधन में जवाबदेही तय होगी
शहरों में लैंडफिल पर निर्भरता घटेगी
पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता को मजबूती मिलेगी
? सार:
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2026 केवल कचरा निपटान का ढांचा नहीं, बल्कि व्यवहार परिवर्तन की पहल है। अब “कचरा फेंकना” नहीं, बल्कि “कचरा प्रबंधित करना” हर नागरिक और संस्था की जिम्मेदारी बन गई है।
दुर्ग | शौर्यपथ समाचार
दुर्ग नगर निगम में पूर्व शहरी सरकार के कार्यकाल के दौरान स्ट्रीट वेंडर्स के लिए किए गए गुमटी आवंटन अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गए हैं। चर्च रोड और जिला अस्पताल परिसर के सामने किए गए इन आवंटनों में भारी अनियमितताओं और पक्षपात के आरोप सामने आ रहे हैं, जिनमें अब दुर्ग प्रेस क्लब के एक तथाकथित सदस्य का नाम भी चर्चा में है।
जानकारी के अनुसार, स्ट्रीट वेंडर्स के हित में राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (NULM) के तहत सर्वे कराकर गुमटियों का आवंटन किया गया था। लेकिन प्रारंभ से ही यह प्रक्रिया पारदर्शिता के अभाव और कथित भ्रष्टाचार के कारण विवादों में रही। आरोप है कि सर्वे में ऐसे लोगों को भी शामिल कर लिया गया, जो वास्तविक रूप से स्ट्रीट वेंडर नहीं थे।
सबसे चौंकाने वाला मामला जिला अस्पताल परिसर के सामने की गुमटियों से जुड़ा है, जहां एक प्रेस क्लब सदस्य ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए अपने रिश्तेदार के नाम पर गुमटी आवंटित करवा ली। यही नहीं, नगर निगम के एक कर्मचारी के बेटे के नाम पर भी इसी तरह का आवंटन किए जाने की बात सामने आई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही गुमटी का मूल्य कागजों में कम हो, लेकिन शहर के मुख्य मार्ग पर स्थित इन स्थानों की वास्तविक कीमत लाखों में है। ऐसे में फर्जी सर्वे के आधार पर आवंटन करना और बाद में उन्हें किराए पर देने की कोशिश करना गंभीर अनियमितता की ओर इशारा करता है।
इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि जब आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगी गई, तो संबंधित विभाग ने किसी भी प्रकार के आवंटन से इनकार कर दिया। इससे यह संदेह और गहरा गया कि कहीं न कहीं फाइलों को दबाने और तथ्यों को छिपाने का प्रयास किया गया।
हालांकि, हाल ही में अलका बाघमार के नेतृत्व वाली वर्तमान शहरी सरकार द्वारा चर्च रोड स्थित गुमटियों पर की गई कार्रवाई में संचालकों ने अपने दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि आवंटन NULM विभाग द्वारा ही किया गया था। इस खुलासे के बाद अब जिला अस्पताल परिसर की गुमटियों की जांच की मांग तेज हो गई है।
पूर्व में भी हुआ था खुलासा, पर नहीं हुई कार्रवाई
शौर्यपथ समाचार ने पहले ही इस पूरे गुमटी आवंटन घोटाले का खुलासा किया था, लेकिन उस समय की शहरी सरकार पर मामले को दबाने के आरोप लगे थे। अब जब वर्तमान सरकार ने जांच की प्रक्रिया शुरू की है, तो उम्मीद की जा रही है कि सभी संदिग्ध आवंटनों की निष्पक्ष जांच होगी।
प्रेस क्लब की साख पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने दुर्ग प्रेस क्लब की साख पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। जहां एक ओर कई वरिष्ठ और प्रतिष्ठित पत्रकार अपनी निष्पक्षता और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं, वहीं कुछ लोगों के कृत्य पूरे संगठन की छवि को धूमिल कर रहे हैं।
अब देखना यह होगा कि नगर निगम का बाजार विभाग जिला अस्पताल परिसर के सामने स्थित गुमटियों का निरीक्षण कब करता है और क्या इस कथित गुमटी घोटाले में शामिल लोगों पर ठोस कार्रवाई होती है या नहीं। फिलहाल, यह मामला शहर में चर्चा और जनचिंता का बड़ा विषय बना हुआ है।
रायपुर /* बस्तर की भौगोलिक विषमताओं और कठिन परिस्थितियों के बीच विकास की एक ऐसी नई इबारत लिखी गई है, जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक नामुमकिन थी। ककनार घाटी के नीचे बसे सुदूर गांव कुधूर, धरमाबेड़ा, चंदेला, ककनार और पालम जो कभी वामपंथी आतंक के गढ़ माने जाते थे, आज मुख्यमंत्री ग्रामीण बस सेवा के माध्यम से मुख्यधारा से जुड़ गए हैं। इन गांवों के निवासियों के लिए पक्की सड़क का निर्माण एक ऐसा सपना था, जिसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था, क्योंकि घाटी की दुर्गम ढलान और माओवाद के साये ने विकास के हर रास्ते को अवरुद्ध कर रखा था। लेकिन आज उन्हीं संकरी पगडंडियों और चुनौतीपूर्ण रास्तों पर बनी नई सड़क में बस का दौड़ना बस्तर की बदलती तस्वीर का सबसे सशक्त प्रमाण है। ज्ञात हो कि बस्तर जिले में मुख्यमंत्री ग्रामीण बस सेवा योजना की शुरूआत बीते 04 अक्टूबर 2025 को केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह और मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के द्वारा की गई थी। मुख्यमंत्री ग्रामीण बस सेवा योजना के माध्यम से जिले के चार चयनित मार्गों पर बस सेवा संचालित की जा रही है।
मुख्यमंत्री ग्रामीण बस सेवा योजना के तहत शुरू हुई यह बस सेवा केवल एक वाहन नहीं, बल्कि विश्वास और विकास की एक कड़ी है। क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकार रायपुर द्वारा स्वीकृत समय-सारणी के अनुसार यह बस प्रतिदिन कोण्डागांव जिले के मर्दापाल से अपनी यात्रा शुरू करती है और ककनार घाटी के नीचे बसे उन गांवों को जोड़ती है जहाँ कभी पैदल चलना भी जोखिम भरा था। घाटी के इन दुर्गम अंचलों से होते हुए बस धरमाबेड़ा और ककनार जैसे पड़ावों को पार कर संभाग मुख्यालय जगदलपुर पहुँचती है। इससे उन लोगों का सफर अब सुगम हो गया है जिन्होंने दशकों तक केवल सड़क और बस का इंतजार किया था।
वामपंथी समस्या के कमजोर पड़ने और सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के चलते अब इन संवेदनशील इलाकों में सड़कों का निर्माण संभव हो पाया है। पक्की सड़कों के इस जाल ने न केवल परिवहन को आसान बनाया है, बल्कि ककनार घाटी के नीचे बसे ग्रामीणों के मन से अलगाव का डर भी खत्म कर दिया है। अब शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार के लिए ग्रामीणों को मीलों का सफर तय नहीं करना पड़ता। यह निरंतर बस सेवा इस बात का प्रतीक है कि बस्तर का वह हिस्सा जो कभी अंधेरे में खोया हुआ माना जाता था, अब पूरी रफ्तार के साथ प्रगति की राह पर अग्रसर है। घाटी की ऊंचाइयों से उतरकर यह बस आज हर ग्रामीण के घर तक शासन की योजनाओं और खुशहाली का संदेश पहुँचा रही है। इस बारे में चंदेला के सरपंच श्री तुलाराम नाग कहते हैं कि करीब दो साल पहले तक इस ईलाके में माओवादी समस्या के कारण विकास थम सी गई थी लेकिन आज सड़क बन जाने के साथ ही विकास को एक नई दिशा मिल चुकी है। इस ईलाके में स्कूल, आंगनबाड़ी केन्द्र, स्वास्थ्य केन्द्र की सेवाओं के साथ ही उचित मूल्य दुकान में खाद्यान्न एवं अन्य जरूरी सामग्री सुलभ हो रही है वहीं समीपस्थ ग्राम ककनार में साप्ताहिक बाजार की रौनक देखते ही बनती है। क्षेत्र के ककनार सरपंच श्री बलीराम बघेल बताते हैं कि पहले उन्हे अपने तहसील मुख्यालय लोहण्डीगुड़ा और जिला मुख्यालय तक जाने मे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। लेकिन अब सड़क के बन जाने से बारहमासी आवागमन की सुविधा मिल रही है।
ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के कई खिलाड़ियों ने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में शानदार प्रदर्शन कर ओलंपियनों और टैलेंट स्काउट्स का ध्यान खींचा
रायपुर / ओडिशा ने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026 में पुरुष और महिला दोनों वर्गों में हॉकी का स्वर्ण पदक जीतकर अपने दबदबे को साबित किया। रायपुर के सरदार वल्लभ भाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम में खेले गए फाइनल में पुरुष टीम ने झारखंड को 4-1 से हराया, जबकि महिला टीम ने रोमांचक मुकाबले में मिजोरम को 1-0 से मात दी। पुरुष वर्ग में झारखंड को रजत और छत्तीसगढ़ को कांस्य मिला, जबकि महिला वर्ग में झारखंड ने कांस्य पदक हासिल कर पोडियम पूरा किया।
रायपुर में खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026 में ओडिशा की यह दोहरी स्वर्णिम सफलता केवल एक खेल उपलब्धि नहीं, बल्कि यह इस बात का सशक्त उदाहरण है कि कैसे हॉकी ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में जीवन को नई दिशा दे रही है। खेल प्रतिभा के भंडार माने जाने वाले पूर्वोत्तर राज्यों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जहां मिजोरम की टीम ने फाइनल तक जगह बनाई।
ओडिशा की पुरुष टीम ने फाइनल में झारखंड को 4-1 से हराया, जबकि महिला टीम ने कड़े मुकाबले में मिजोरम को 1-0 से पराजित किया। झारखंड और छत्तीसगढ़ की टीमें भी पोडियम तक पहुंचीं, जो इन क्षेत्रों से उभरती प्रतिभा की गहराई को दर्शाता है। लेकिन पदकों से आगे बढ़कर असली कहानी उन गांवों, जंगलों और समुदायों में छिपी है, जहां हॉकी पहचान और अवसर दोनों बन चुकी है। दशकों से हॉकी जनजातीय संस्कृति का हिस्सा रही है। बच्चे पेड़ की टहनियों से स्टिक बनाकर ऊबड़-खाबड़ मैदानों पर नंगे पांव खेलते हैं। प्रतिभा हमेशा मौजूद थी, लेकिन उसे आगे बढ़ाने का रास्ता नहीं था—जो अब बदल रहा है।
केंद्रीय खेल मंत्रालय और राज्यों द्वारा संचालित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, बेहतर बुनियादी ढांचे और संगठित जमीनी कार्यक्रमों के चलते अब एक मजबूत खेल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित हो रहा है। 1992 बार्सिलोना ओलंपिक में भारतीय टीम का हिस्सा रहे पूर्व ओलंपियन अजीत लकड़ा, जो वर्तमान में बिलासपुर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के मुख्य कोच हैं, इस बदलाव को करीब से देख रहे हैं। उन्होंने कहा, “ग्रासरूट से लेकर जूनियर और फिर सीनियर स्तर तक पूरी प्रणाली धीरे-धीरे मजबूत हो रही है। खासकर जनजातीय क्षेत्रों के खिलाड़ी इससे काफी लाभान्वित हो रहे हैं। उनकी प्राकृतिक प्रतिभा को अब सही मार्गदर्शन और प्रशिक्षण के जरिए निखारा जा रहा है।”
लकड़ा का मानना है कि यह संरचित सहयोग एक सकारात्मक श्रृंखला बना रहा है। उन्होंने कहा, “जब बच्चे यहां आकर सीखते हैं और अच्छा प्रदर्शन करते हैं, तो वे दूसरों को प्रेरित करते हैं। इससे लगातार नए खिलाड़ी सामने आ रहे हैं।” जो क्षेत्र कभी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों और नक्सलवाद से प्रभावित थे, वहां अब खेल के माध्यम से एक शांत बदलाव देखने को मिल रहा है। हॉकी एक सेतु बनकर इन समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ रही है। खेल मंत्रालय का ‘अस्मिता’ कार्यक्रम अधिक से अधिक महिला खिलाड़ियों को जोड़कर उन्हें मुख्यधारा में ला रहा है।
1984 लॉस एंजेलिस ओलंपिक में भारतीय टीम का हिस्सा रहे पूर्व ओलंपियन मनोहर टोपनो, जिन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की पुरुष टीमों को कोचिंग दी है, ने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स जैसी पहल के जमीनी प्रभाव को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “मैं इस ग्रासरूट टूर्नामेंट के आयोजन के लिए साई का धन्यवाद करना चाहता हूं। हमारे समुदायों के लड़के और लड़कियां आगे बढ़ रहे हैं और खुद को नई पहचान दे रहे हैं। अगर हम ऐसे ही आगे बढ़ते रहे, तो एक दिन ये खिलाड़ी भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे।”
टोपनो ने प्रतिभा के पीछे की एक अहम सच्चाई पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, “हमारे जनजातीय समुदायों में हॉकी स्वाभाविक रूप से खेली जाती है। अगर हम इन क्षेत्रों पर ध्यान दें, तो हमारे खिलाड़ी आगे बढ़ेंगे और देश का नाम रोशन करेंगे।” एक और महत्वपूर्ण बदलाव खेल विज्ञान, फिजियोथेरेपी और वीडियो विश्लेषण जैसी सुविधाओं का पहुंचना है, जो पहले केवल शीर्ष स्तर तक सीमित थीं। अब दूरदराज के क्षेत्रों के खिलाड़ी भी पेशेवर प्रशिक्षण वातावरण का लाभ उठा रहे हैं। पारंपरिक स्वाभाविक खेल और आधुनिक कोचिंग का यह मेल प्रदर्शन के नए स्तर खोल रहा है।
झारखंड की पूर्व खिलाड़ी और हॉकी इंडिया की सदस्य असृता लकड़ा ने कहा, “इन क्षेत्रों के बच्चों के खून में हॉकी बसती है, इसलिए वे स्वाभाविक रूप से इस खेल की ओर आकर्षित होते हैं। खेलो इंडिया जैसे प्लेटफॉर्म ने उन्हें दिशा दी है।”
उन्होंने आगे कहा, “बेहतर सुविधाओं, प्रशिक्षण और एक्सपोजर के कारण अब खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच रहे हैं। उनका मनोबल बढ़ा है और प्रदर्शन में स्पष्ट सुधार दिख रहा है।”
अब इसका प्रभाव केवल कहानियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नतीजों, प्रतिनिधित्व और बढ़ती महत्वाकांक्षा में साफ दिखाई दे रहा है। जनजातीय खिलाड़ी अब सिर्फ भाग लेने वाले नहीं, बल्कि दावेदार, चैंपियन और भविष्य के अंतरराष्ट्रीय सितारे बन रहे हैं।
रायपुर में ओडिशा का यह स्वर्णिम प्रदर्शन एक बड़े आंदोलन का प्रतीक है—जहां गांव उत्कृष्टता के केंद्र बन रहे हैं और हॉकी एक पूरी पीढ़ी के सपनों को नई दिशा दे रही है। बस्तर के धूल भरे मैदानों से लेकर रायपुर के भरे स्टेडियम तक, इन खिलाड़ियों की यात्रा न केवल भारतीय हॉकी, बल्कि जनजातीय भारत के सामाजिक ताने-बाने को भी बदल रही है।
देबी ने सात साल की उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया था, इसके बाद उन्हें अपने चाचा-चाची के साथ रहना पड़ा और आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा
बोकाखात में 'खेलो इंडिया सेंटर' के एक कोच के कहने पर साल 2022 में देबी ने पावर लिफ्टिंग छोड़कर कुश्ती को अपनाया
रायपुर /'जब हालात मुश्किल होते हैं, तो मजबूत लोग आगे बढ़ते हैं- यह एक मशहूर कहावत है जो खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन करने की ललक को बयां करती है। असम की महिला पहलवान देबी डायमारी की कहानी बाधाओं को पार करने की इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। आखिरकार देबी को उन सभी प्रयासों का फल तब मिला, जब उन्होंने यहां 'खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स' में महिलाओं की 62 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता।
असम के गोलाघाट जिले के सिसुपानी स्थित दिनेशपुर गांव की रहने वाली 28 वर्षीय देबी ने सात साल की उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया था। इसके बाद उन्हें अपने चाचा-चाची के साथ रहना पड़ा और आर्थिक तंगी के चलते अपनी ट्रेनिंग जारी रखने के लिए उन्हें छोटे-मोटे काम भी करने पड़े। बोडो ट्राइब से आने वाली देबी कहती हैं, '' इस पदक के पीछे मेरी कड़ी मेहनत है। मैंने चार साल पहले ही 2022 में गोलाघाट जिले के बोकाखात में काजीरंगा के बगल में खेलो इंडिया सेंटर में कुश्ती शुरू की थी। इसमें प्रैक्टिस करने के लिए मुझे सेंटर के आसपास रूम लेकर रहना पड़ा। रूम का 1000 रुपया किराया देने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे, इसलिए मुझे एक साल तक पार्ट टाइम जॉब भी करना पड़ा।''
वह आगे कहती हैं, '' पहले तो मुझे 2022 में 2500 रुपये मासिक वेतन पर ईजी बाजार (बोकाखात) स्टोर में काम करना पड़ा और फिर 2023 में काजीरंगा में स्थित बोन विला रिसॉर्ट में करीब 7000 रुपये के मासिक वेतन पर जॉब करना पड़ा। वहां पर मैं स्वीमिंग पूल की देखभाल और सफाई करती थीं।'' उन्होंने आगे कहा, ''सारा दिन काम करने के बाद शाम को सिर्फ दो घंटे के लिए मैं कुश्ती की प्रैक्टिस कर पाती थी। मैंने जितना भी किया, उसके बदले मुझे ये रजत मिला। लेकिन मैं इससे संतुष्ट नहीं हूं और मैं अब और कड़ी मेहनत करके आगे गोल्ड जीतना चाहती हूं।''
कुश्ती में मैट पर उतरने से पहले देबी पॉवरलिफ्टिंग और आर्म रेसलिंग करती थीं। लेकिन साल 2022 में उनकी मुलाकात असम टीम के कोच अनुस्तूप नाराह (ANUSTUP NARAH) से हुई, जिनके मार्गदर्शन में रहकर वह कुश्ती की दांव पेंच सीखी हैं। कोच अनुस्तूप कहते हैं, '' 2022 में जब बोकाखात में पंजा टूर्नामेंट हुआ था तो उस दौरान वह मुझे मिली और मैंने उन्हें देखते ही कह दिया कि तुम रेसलिंग करो। उसने सोच विचार के बाद मुझे हां- कह दिया और फिर मैंने उन्हें सबसे पहले सेंटर के पास ही रहने के लिए कहा ताकि ट्रेनिंग के लिए पर्याप्त समय मिल सके। वह बोली कि सर यहां तो रूम लेकर रहना पड़ेगा और मेरे पास इतने पैसे तो नहीं है। फिर मैंने गोलाघाट जिले के कुश्ती सहायक सचिव से कहकर देबी को काम दिलवाया और एक साइकिल भी दिलवाई। देबी उसी साइकिल से जॉब करने लगी और फिर वह सेंटर के पास रहकर ही प्रैक्टिस भी करने लगी।''
देबी डायमारी ने 2022 में अपने ही जिले के बोकाखात में काजीरंगा स्थित खेलो इंडिया सेंटर में कुश्ती शुरू की थी और उसी साल उन्होंने विशाखापत्तनम में हुए सीनियर चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई कर लिया। इसके बाद साल बाद ही उन्होंने 2024 में स्टेट चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। देबी की पिछले साल ही शादी हुई है और उनका पति बेंगलोर में प्राइवेट नौकरी करता है। वह कहती हैं, '' ससुराल वाले मुझे हर तरह से बहुत सपोर्ट करते हैं। पति भी मुझे बहुत सपोर्ट करता है और वह बेंगलुरु से बराबर पैसा भेजता रहता है ताकि मुझे कोई चीज की दिक्कत ना हो।''
देबी डायमारी ने कहा, '' मेरा अगला लक्ष्य सीनियर लेवल पर और पदक जीतना है ताकि मैं उसके बाद इंटरनेशनल लेवल पर भाग ले सकूं। ये सब करने के लिए मैं दिन-रात कड़ी मेहनत कर रही हूं। यहां से जाने के बाद अब देखेंगे कि कोच साहब क्या प्लानिंग करते हैं और फिर हम उसी के हिसाब से काम करेंगे।''
रायपुर / गाँव में कभी बस की पहुँच नहीं थी, आज वहाँ बस के आते ही बच्चों के चेहरे खिल उठते हैं। सड़क पर बस दिखते ही बच्चे हाथ हिलाकर खुशी जाहिर करते हैं और हॉर्न की आवाज़ सुनते ही लोग घरों से बाहर निकल आते हैं—एक नई उम्मीद के साथ। यह उम्मीद अब शहर मुख्यालय, नगर मुख्यालय और विकासखंड मुख्यालय तक आसान पहुँच की है।
यात्री बस में बैठकर लोग उन दिनों को याद करते हैं, जब उन्हें पैदल या किसी निजी वाहन के सहारे दूसरे स्थानों तक जाना पड़ता था। अब हालात बदल चुके हैं। स्कूल के बच्चे समय पर स्कूल पहुँच रहे हैं, वहीं अधिकारी-कर्मचारी भी समय पर अपनी ड्यूटी पर पहुँच पा रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ़ सुविधा का नहीं, बल्कि उन ग्रामीण परिवारों के सपनों का है जो विकसित भारत की कल्पना को अपने जीवन में साकार होते देख रहे हैं। यह परिवर्तन मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना से संभव हो पाया है। इस योजना के तहत आज बसें उन गाँवों तक पहुँच रही हैं, जहाँ पहले कभी बस नहीं पहुँची थी।
पहाड़ी अंचल की महिलाओं को मिली राहत
जशपुर जिला के बगीचा विकासखंड के सन्ना निवासी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती सुनीता निकुंज बताती हैं कि पहले उन्हें पास के गाँव स्थित आंगनबाड़ी केंद्र तक पहुँचने के लिए किसी से लिफ्ट लेनी पड़ती थी, निजी वाहन या पैदल जाना पड़ता था। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यह बहुत कठिन था। अब ग्रामीण बस से उनकी यह समस्या दूर हो गई है। वे कहती हैं, “यह बस मेरे लिए बहुत बढ़िया साधन बन गई है।”
ग्रामीणों के चेहरे पर लौटी मुस्कान
बस में सफर कर रहे ग्राम मरंगी निवासी श्री दशरथ भगत हँसते हुए बताते हैं कि पहले इस सड़क पर बस नहीं चलती थी, इसलिए पैदल ही आना-जाना करना पड़ता था। बस का नाम लेते ही उसका चेहरा खिल गया l उन्होंने बताया कि “अब मुख्यमंत्री जी की पहल से बस शुरू हो गई है। हम आसानी से बगीचा जाते हैं और समय पर वापस भी लौट आते हैं।”
यात्री श्री मंगलराम बताते हैं कि पहले वे छिछली और चंपा जैसे बाजारों तक पैदल जाया करते थे। “अब बस आने से बहुत सुविधा हो गई है। हम सब बहुत खुश हैं।”
मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना से न केवल यात्रा सुगम हुई है, बल्कि ग्रामीणों को स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासनिक कार्यों के लिए शहर तक पहुँचने में भी बड़ी सुविधा मिली है। यह योजना ग्रामीण जीवन को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में एक सशक्त कदम साबित हो रही है और जशपुर जैसे पहाड़ी व दूरस्थ क्षेत्रों में विकास की नई राह खोल रही है।
किरण भारत के लिए खेल चुकी हैं और क्रोएशियन महिला लीग में डिनामो ज़ाग्रेब के लिए भी खेली हैं
किसी भी पोज़िशन पर खेलने की क्षमता उनकी सबसे बड़ी ताकत
रायपुर / जब खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स के सेमीफाइनल में अरुणाचल प्रदेश के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट के दौरान किरण पिस्दा ने गोलकीपिंग के दस्ताने पहने, तब वह अपने अब तक के अनुभवों पर भरोसा कर रही थीं। उन अनुभवों पर, जिन्होंने चुनौतियों और निराशाओं के बीच उन्हें और अधिक मजबूत बनाया।
24 साल की उम्र में किरण अपने खेल कौशल के शिखर पर नजर आती हैं। वह यूरोप में लीग फुटबॉल खेल चुकी हैं और अब बड़े अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंटों के लिए भारतीय टीम में जगह बनाने की दहलीज पर हैं।
हालांकि, उनका यह सफर बिल्कुल आसान नहीं रहा, भले ही उन्हें स्कूल और परिवार से शुरुआती समर्थन मिला। उनके भाई गिरीश पिस्दा, जो खुद राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हैं, उनके लिए प्रेरणा बने।
किरण ने साई मीडिया से कहा, “मुझे स्कूल में काफी सपोर्ट मिला। वहीं से मुझे राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर खेलने के मौके मिले और हर चयन के साथ मेरा आत्मविश्वास बढ़ता गया।” इसके बाद किरण शारीरिक शिक्षा में डिग्री हासिल करने के लिए रायपुर आईं। छत्तीसगढ़ महिला लीग के दौरान उन्होंने चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा और उन्हें राष्ट्रीय शिविर के लिए बुलावा मिला।
किरण बताती हैं, “उस समय मैं शारीरिक रूप से उतनी फिट नहीं थी और मेरा मानसिक स्तर भी सीनियर खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार नहीं था।” यही कारण रहा कि उस राष्ट्रीय शिविर में उन्हें भारतीय टीम के लिए चयन नहीं मिला। वह कहती हैं, “मुझे एहसास हुआ कि वहां जो अनुभव मिला है, उस पर मुझे काम करना होगा।”
इसके बाद उनके जीवन में आत्म-सुधार का एक कठिन दौर शुरू हुआ। उन्होंने अपनी फिटनेस पर काम किया, मैचों का विश्लेषण करना शुरू किया और अपनी पोज़िशनल समझ को बेहतर बनाया। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव उनकी मानसिकता में आया।
वह कहती हैं, “मैंने खुद से कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं नकारात्मक नहीं सोचूंगी। अगर आप नकारात्मक हो जाते हैं, तो उसका सीधा असर आपके प्रदर्शन पर पड़ता है।” इस बदलाव में उनके मेंटर और कोच योगेश कुमार जांगड़ा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। किरन ने कहा,“जब भी मुझे लगता है कि मैं अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही हूं या मन खराब होता है, तो मैं उनसे बात करती हूं। वह हमेशा मुझे सकारात्मक रहने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।”
किरण की मेहनत का असर धीरे-धीरे दिखने लगा। घरेलू स्तर पर उनके प्रदर्शन ने केरल ब्लास्टर्स जैसे क्लबों के दरवाजे खोले, जहां उन्होंने खुद को और निखारा। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी बहुमुखी प्रतिभा बन गई। वह कहती हैं, “मैंने स्ट्राइकर के रूप में शुरुआत की, फिर मिडफील्ड में खेली और अब राष्ट्रीय टीम के लिए फुल-बैक के रूप में खेलती हूं। एक फुटबॉलर के रूप में आपको अपनी टीम के लिए कई पोज़िशन पर खेलने के लिए तैयार रहना चाहिए।”
किरण कई बार भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। वह 2022 के सैफ़ चैंपियनशिप स्क्वाड का हिस्सा रही हैं और क्रोएशियन महिला लीग में डिनामो ज़ाग्रेब के लिए भी खेल चुकी हैं। फिर भी, इस मुकाम पर भी असफलताएं उनके सफर का हिस्सा रही हैं। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में आयोजित एएफसी (AFC) महिला एशियन कप जैसे बड़े टूर्नामेंट के लिए चयन न होना उनके लिए एक और परीक्षा थी।
किरण कहती हैं, “बड़े टूर्नामेंट के लिए चयन न होना दुख देता है। हर खिलाड़ी इसे महसूस करता है। लेकिन अब मैं इसे अलग नजरिए से देखती हूं। इसे मैं और मेहनत करने और मजबूत वापसी करने की प्रेरणा मानती हूं।” दबाव को संभालना उनकी पहचान बन चुका है। चाहे टीम में जगह के लिए प्रतिस्पर्धा हो या अहम मैचों में प्रदर्शन, उन्होंने खुद को संयमित रखना सीख लिया है। वह कहती हैं, “ऊंचे स्तर पर खेलते समय दबाव हमेशा रहता है। आपको उसे संभालना सीखना पड़ता है।”
किरण टीम के प्रदर्शन की भूमिका को भी महत्वपूर्ण मानती हैं। उन्होंने कहा, “अगर टीम अच्छा कर रही होती है, तो हर खिलाड़ी आत्मविश्वास से भरा होता है। लेकिन जब टीम हार रही होती है, तो व्यक्तिगत प्रदर्शन भी प्रभावित होता है।” जनजातीय पृष्ठभूमि से आने वाली किरण दूर-दराज के इलाकों के खिलाड़ियों की चुनौतियों को अच्छी तरह समझती हैं। उनका मानना है कि खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स जैसे मंच इस अंतर को पाटने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
वह कहती हैं, “जनजातीय इलाकों में बहुत प्रतिभा है, लेकिन खिलाड़ियों को हमेशा मौके नहीं मिलते। खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स ने उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच दिया है। इससे उन्हें आत्मविश्वास और राज्य तथा देश के लिए खेलने का सपना देखने की प्रेरणा मिलती है।” जहां तक किरण का सवाल है, उनका फोकस फिलहाल इंडियन वुमेंस लीग जैसी घरेलू प्रतियोगिताओं में लगातार अच्छा प्रदर्शन करने और राष्ट्रीय टीम में नियमित जगह बनाने पर है। लेकिन उनका लक्ष्य इससे कहीं बड़ा है।
वह कहती हैं, “मैं लगातार खुद को बेहतर बनाना चाहती हूं, नियमित प्रदर्शन करना चाहती हूं और बड़े टूर्नामेंट में भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहती हूं। अगर आपका चयन नहीं होता, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप अच्छे खिलाड़ी नहीं हैं—इसका मतलब है कि आपको और मेहनत करनी होगी।”
भिलाई / शौर्यपथ
दुर्ग जिले में हनुमान जन्मोत्सव इस वर्ष आस्था, ऊर्जा और सामाजिक जागरूकता के अद्भुत संगम के रूप में मनाया गया। जिले के कोने-कोने में “जय श्री राम” और “जय बजरंगबली” के जयघोष गूंजते रहे, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। सुबह से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, जहाँ बजरंगबली को सिंदूर का चोला अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की गई।
इसी क्रम में भिलाई के कोहका स्थित “बीरा के अंगना” में समाजसेवी इंद्रजीत सिंह के नेतृत्व में भव्य, अनुशासित और प्रेरणादायक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जो पूरे क्षेत्र में आकर्षण का केंद्र बना रहा।
कार्यक्रम की सबसे विशेष झलक 51 पंडितों के सानिध्य में हनुमान चालीसा का सस्वर पाठ रहा, जिसने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। मंत्रों की गूंज और भक्ति की लहर ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।
धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों को भी प्रमुखता दी गई। बच्चों के लिए कराटे डेमो क्लास का आयोजन किया गया, वहीं बच्चियों को विशेष आत्मरक्षा प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर और सशक्त बनने का संदेश दिया गया।
इस अवसर पर समाजसेवी इंद्रजीत सिंह ने सभी के सुख-शांति और समृद्धि की कामना की। कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्य अतिथियों ने कहा कि हनुमान जी के साहस, सेवा और समर्पण के भाव को अपने जीवन में उतारना ही सच्ची भक्ति है।
पूरे जिले में निकली भव्य शोभायात्राएं, भंडारे और सामूहिक आयोजन इस पर्व को जन-जन का उत्सव बना रहे हैं। खासकर युवाओं और महिलाओं की बढ़ती सहभागिता ने धार्मिक आयोजनों को एक नई सकारात्मक दिशा दी है, जिससे समाज में ऊर्जा और एकता का संदेश प्रसारित हो रहा है।
? कोहका का यह आयोजन न केवल आस्था का प्रतीक बना, बल्कि समाज को सशक्त और जागरूक बनाने का प्रेरणास्रोत भी साबित हुआ।
? धमतरी / शौर्यपथ
✍️ संभाग प्रमुख: कुमार नायर
धमतरी पुलिस द्वारा अवैध जुआ-सट्टा के विरुद्ध चलाए जा रहे अभियान के तहत सिटी कोतवाली पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए बनियापारा क्षेत्र में सट्टा खिलाने वाले खाईवाल को रंगे हाथ गिरफ्तार किया है।
पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार, पेट्रोलिंग के दौरान कोतवाली पुलिस टीम को मुखबिर से सूचना मिली कि बनियापारा में एक व्यक्ति अवैध रूप से सट्टा संचालित कर रहा है। सूचना को गंभीरता से लेते हुए पुलिस ने तत्काल टीम गठित कर बताए गए स्थान पर घेराबंदी कर दबिश दी।
कार्रवाई के दौरान आरोपी दिनेश ढीमर उर्फ चिकु (40 वर्ष) को लोगों से पैसे लेकर सट्टा लगवाते और अंकों वाली सट्टा पट्टी लिखते हुए रंगे हाथ पकड़ लिया गया।
पुलिस ने आरोपी के कब्जे से गवाहों की उपस्थिति में 1000 रुपये नगद, तीन सट्टा पट्टी एवं एक डॉट पेन जब्त किया। जब्त सट्टा पट्टियों में विभिन्न नामों के सामने अंकों में रकम दर्ज पाई गई, जो अवैध सट्टा संचालन की पुष्टि करती है।
इस कृत्य को छत्तीसगढ़ जुआ प्रतिषेध अधिनियम 2022 की धारा 6(क) के तहत अपराध पाए जाने पर आरोपी के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई करते हुए उसे गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया है।
? आरोपी का विवरण:
दिनेश ढीमर उर्फ चिकु
पिता – लक्ष्मीनारायण
उम्र – 40 वर्ष
निवासी – बनियापारा, धमतरी
थाना – सिटी कोतवाली, जिला धमतरी
? धमतरी पुलिस ने स्पष्ट किया है कि जिले में जुआ, सट्टा एवं अन्य अवैध गतिविधियों के विरुद्ध इसी प्रकार सख्त और निरंतर कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी।
? धमतरी / शौर्यपथ
✍️ संभाग प्रमुख: कुमार नायर
धमतरी जिले के मगरलोड थाना अंतर्गत चौकी करेलीबड़ी क्षेत्र के ग्राम हरदी में नवविवाहिता की संदिग्ध मृत्यु का मामला अब सनसनीखेज हत्या में बदल गया है। पुलिस की गहन विवेचना में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि महिला की हत्या उसके ही पति ने गला घोंटकर की, जबकि सास ने सच्चाई छुपाने का प्रयास किया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 30 मार्च 2026 को ग्राम हरदी में नवविवाहिता की मृत्यु की सूचना मिलते ही करेलीबड़ी पुलिस टीम तत्काल मौके पर पहुंची। प्रारंभिक जांच में मामला संदिग्ध प्रतीत होने पर मर्ग कायम कर गंभीरता से जांच शुरू की गई। घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण, परिस्थितिजन्य साक्ष्य एकत्रण और गवाहों के बयान के आधार पर पुलिस ने हर पहलू की सूक्ष्म जांच की।
शव परीक्षण रिपोर्ट ने पूरे मामले का रुख बदल दिया। रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि महिला की मृत्यु श्वास अवरुद्ध (गला घोंटने) से हुई है और इसकी प्रकृति हॉमीसाइडल यानी हत्या है। इसके बाद पुलिस ने जांच का दायरा और तेज कर दिया।
विवेचना के दौरान एफएसएल टीम की तकनीकी जांच और लगातार पूछताछ में यह तथ्य सामने आया कि मृतिका और उसके पति चन्द्रशेखर यादव के बीच संतान को लेकर अक्सर विवाद होता था। घटना वाले दिन भी इसी बात को लेकर दोनों के बीच कहासुनी हुई, जो हिंसक रूप ले बैठी। गुस्से में आकर आरोपी पति ने रस्सी से गला दबाकर अपनी पत्नी की हत्या कर दी।
पुलिस की सख्त पूछताछ और निगरानी के चलते आरोपी चन्द्रशेखर यादव (26 वर्ष) ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसकी निशानदेही पर घटना में प्रयुक्त काले रंग की नोई रस्सी भी बरामद कर ली गई। आरोपी को 1 अप्रैल 2026 को विधिवत गिरफ्तार कर लिया गया।
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी की मां रिना बाई यादव (46 वर्ष) ने घटना को छुपाने के लिए मृतिका की मौत को सीने में दर्द से होना बताया और पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की। साक्ष्य छुपाने के इस प्रयास के चलते पुलिस ने उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ अपराध क्रमांक 51/2026 के तहत धारा 103(1) और 238(क) भारतीय न्याय संहिता में मामला दर्ज कर न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया है।
? आरोपीगण:
? यह घटना एक बार फिर पारिवारिक विवादों के भयावह परिणाम को उजागर करती है, जहां रिश्तों की नींव ही हिंसा में बदल गई।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
