August 06, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / बुधवार का दिन भारत के लिए ऐतिहासिक रहा। काफी साल के बाद देश में नए लड़ाकू विमानों का आगमन हुआ है। राफेल से पहले भारत ने रूस से सुखोई खरीदा था। अच्छी बात यह है कि जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, तभी से वह नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के लिए प्रयासरत है। राफेल के आने के बाद अब भारत अपनी ही जमीन से चीन और पाकिस्तान के अंदरूनी ठिकानों पर हवाई हमले कर पाएगा। इसी तरह, बुधवार की दूसरी घटना आने वाले समय में भारत को विश्व-गुरु बनाने की दिशा में सहायक साबित होगी। सरकार ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की है, जो मैकाले की शिक्षा नीति को पलटकर रख देगी। नई नीति से उद्यमी ज्यादा पैदा होंगे, क्योंकि इसमें किताबी ज्ञान से ज्यादा हुनर निखारने पर जोर दिया गया है। आजादी के बाद से ही इसकी आवश्यकता महसूस की जा रही थी, लेकिन पिछली सरकारों ने इस दिशा में कुछ ठोस नहीं किया। मौजूदा सरकार उम्मीदों पर खरी उतर रही है।
    ब्रज किशोर सिंह

    चुनौतियां कायम हैं
    बेशक सरकार ने नई शिक्षा नीति को मंजूर कर लिया है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि बगैर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराए यह नीति कैसे सफल हो पाती है? नई शिक्षा नीति के तहत सरकार का पहला फोकस 5+3+3+4 शिक्षा के लिए स्कूलों और कॉलेजों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना और प्रशिक्षित लोगों की नियुक्ति है। जाहिर है, इस नीति को उपयोगी बनाने के लिए इसमें आम लोगों की भागीदारी जरूरी है। नई नीति में कुछ बदलाव समय के अनुरूप जरूर किए गए हैं, पर अधिकांश परिवर्तन बगैर इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाए लागू करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसका शायद ही सुखद नतीजा निकले।
    आशीष रंजन पांडे, बरडीहा, गढ़वा

    मातृभाषा पर जोर
    तमाम बाल मनोवैज्ञानिक व विशेषज्ञ लगातार यह कहते रहे हैं कि बच्चे की प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए। इसी भाषा में बच्चा आसानी से सीख और समझ सकता है और उसका बौद्धिक विकास भी तुलनात्मक रूप से बेहतर होता है। सन् 1882 में अंग्रेजों ने जो हंटर शिक्षा आयोग गठित किया था, उसने भी यही सिफारिश की थी कि प्राथमिक शिक्षा स्थानीय (मातृ) भाषा में दी जानी चाहिए। विडंबना ही है कि जिस तथ्य को अंग्रेजों ने वर्षों पहले पहचान लिया था, उसको लेकर हम आजादी के सात दशकों के बाद भी भ्रम की स्थिति में रहे। सुखद है कि नई शिक्षा नीति में इसे कुबूल कर लिया गया है और प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही देने की बात कही गई है। इससे बच्चों में सीखने, सोचने और समझने की क्षमता तेजी से बढ़ेगी। हमारा देश भी उन्नति और प्रगति के उच्चतम स्तर तक पहुंचेगा।
    सुरेंद्र कुमार, नजफगढ़, दिल्ली

    गांवों में फैलता संक्रमण
    कोरोना का कहर ऐसा बरपा कि गांवों से पलायन कर चुके लोग भी वापस अपने घर को लौट आए। लाखों श्रमिकों की चुनौती भरी घर वापसी हम सबको याद ही है। लेकिन इन श्रमिकों के साथ वे लोग भी गांव वापस आए हैं, जो संपन्न थे। अध्ययन यह बता रहा है कि जिन शहरों में प्रदूषण का स्तर अधिक है, वहां कोरोना मरीजों की संख्या में वृद्धि देखी गई है। तापमान बढ़ने से कोरोना संकट कम होगा, यह तो महज एक अनुमान रहा, हकीकत से इसका कोई वास्ता नहीं दिखा। ऐसे में, मानसून के बाद ठंड की दस्तक मुश्किलें बढ़ा सकती हैं। ठंड में इम्यूनिटी कमजोर होना आम बात है। इसीलिए बीमारी फैलने का खतरा भी होगा। चिंता की बात यह है कि यह खतरा सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं होगा। गांवों की ओर रुख करने वाले लोग भी इससे बच नहीं पाएंगे। इसीलिए प्रशासन को अभी से ही तैयारी कर लेनी चाहिए।
    कीर्ति सैनी, हिसार

     

    ओपिनियन / शौर्यपथ / सरकार की किसी भी नीति का मूल मकसद होता है, समस्याओं को पहचानना और उनका बेहतर समाधान। नई शिक्षा नीति इस कसौटी पर कमोबेश खरी उतरती दिख रही है। मौजूदा वक्त में शिक्षा की घटती गुणवत्ता देश की सबसे गंभीर समस्या है। नई शिक्षा नीति इस पर ध्यान दे रही है। कई दूसरी समस्याओं का भी इसमें सैद्धांतिक हल ढूंढ़ा गया है। मगर बड़ा और अहम सवाल यह है कि इसे व्यावहारिकता की जमीन पर उतारना कितना आसान है? इसका जवाब खोजने से पहले हमें शिक्षा क्षेत्र की घटती गुणवत्ता की वजहों पर गौर करना होगा।
    हमारा शिक्षा क्षेत्र योग्य शिक्षकों की कमी से लगातार जूझ रहा है। उनको प्रशिक्षण देने वाले बीएड और डीएलएड कॉलेज शिक्षा माफिया के गढ़ बन गए हैं। इनमें से कई कॉलेज तो ऐसे हैं, जो अस्तित्व में ही नहीं हैं, लेकिन डिग्रियां खूब बांटते हैं। यहां से प्रशिक्षण पाने वाले शिक्षक बच्चों को कैसी शिक्षा दे पाएंगे, यह आसानी से समझा जा सकता है। नई शिक्षा नीति इस परंपरा को तोड़ने के लिए प्रतिबद्ध दिखती है। अब राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद शिक्षकों के लिए पेशेवर मानक तो तैयार करेगा ही, टीचर्स ट्रेनिंग के लिए एक नया सिलेबस भी बनाएगा, जिसके कारण शिक्षण-कार्य के लिए कम से कम योग्यता चार वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स हो जाएगी। इस पर फैसला तीन साल पहले ही हो गया था, लेकिन नई नीति के माध्यम से अब इसे अमल में लाने का प्रयास हो रहा है।
    शिक्षकों का चयन भी एक बड़ी समस्या है। एक पूर्व मुख्यमंत्री शिक्षक चयन में फर्जीवाडे़ के कारण इन दिनों जेल में भी हैं। नई शिक्षा नीति इसके लिए चयन परीक्षा की वकालत करती है। इसके अलावा, वह यह भी सुनिश्चित करती है कि चयन के बाद शिक्षक पठन-पाठन में लगातार शामिल रहें और अपनी योग्यता को निखारने के लिए प्रशिक्षण-कार्य करते रहें। स्कूली बच्चों को मातृभाषा में पढ़ने की छूट देना भी एक अच्छी सोच है। हालांकि, इसे व्यावहारिक रूप में अमल में लाना मुश्किल होगा, क्योंकि आज स्कूलों को जितने शिक्षकों की दरकार है, उतने की भी नियुक्ति नहीं हो पा रही है। फिर, मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराने से ऐसे शिक्षकों की जरूरत बढ़ जाएगी, जो दो भाषाओं में दक्ष हों। जाहिर है, इन सबके लिए योग्य शिक्षकों के अलावा पर्याप्त धनराशि की भी जरूरत होगी, जिसके बारे में नई शिक्षा नीति स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहती।
    खराब शैक्षणिक व्यवस्था की दूसरी वजह है, बच्चों के आकलन की गलत प्रक्रिया। मौजूदा मूल्यांकन प्रक्रिया से यह पता नहीं चलता कि बच्चा कितना सीख रहा है? इसके लिए अब एक राष्ट्रीय संस्था बनाई जाएगी, जो समय-समय पर मूल्यांकन करेगी। अब तक यह काम एनसीईआरटी के जिम्मे था, जो अच्छा काम तो कर रही थी, मगर एक विशेषज्ञ संस्था बन जाने से हालात और बेहतर होंगे। इस संस्था को न सिर्फ धरातल की समस्याओं का ज्ञान होगा, बल्कि उनके समाधान का मार्गदर्शन भी वह कर सकेगी।
    तीसरा कारण था, नौनिहालों की शिक्षा पर नाममात्र का ध्यान। अभी तक इस बारे में ज्यादा सोचा ही नहीं गया था, जबकि सात-आठ साल का बच्चा दिमागी रूप से संयत हो जाता है। ‘अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन’ यानी बच्चों के शुरुआती दिनों की शिक्षा काफी मायने रखती है। नई शिक्षा नीति बताती है कि इसके लिए शिक्षा विभाग और बच्चों की बेहतरी में जुटी संस्थाएं आपस में मिलकर काम करेंगी।
    चौथी वजह है, उच्च शिक्षा यानी महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए होने वाली रस्साकशी। इसी के कारण 10-12वीं की परीक्षा में परीक्षार्थियों को भाषा के पेपर में भी शत-प्रतशित अंक मिलने लगे हैं। चूंकि नई शिक्षा नीति के तहत दाखिले की परीक्षा आयोजित की जाएगी, इसलिए दसवीं-बारहवीं में परीक्षार्थियों पर बनने वाला अंकों का दबाव खत्म हो जाएगा। यह परीक्षा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होगी, जिससे बच्चे अपनी योग्यता के मुताबिक महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में दाखिला ले सकेंगे।
    पांचवां कारण है, छात्र-छात्राओं का ढर्रे पर सोचना। इससे उच्च शिक्षा को लेकर नीरसता का माहौल बनने लगा था। मगर नई शिक्षा नीति पाठ्येत्तर गतिविधियों और वोकेशनल कोर्स पर पर्याप्त ध्यान दे रही है। इससे बच्चों में परंपरा से हटकर काम करने की सोच विकसित होगी, और आने वाले वर्षों में उनमें यह समझ भी विकसित हो सकेगी कि वोकेशनल कोर्स करने से नौकरी मिलने की संभावना तुलनात्मक रूप से ज्यादा है।
    जाहिर है, नई शिक्षा नीति समस्याओं पर तो गौर कर रही है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर उनका आधा-अधूरा समाधान ही पेश कर रही है। इसमें पहली समस्या तो जाहिर तौर पर धनराशि के अभाव की है। पैसों का इंतजाम कैसे होगा, इस पर नई नीति चुप है। इसमें सिर्फ मान लिया गया है कि बजट का इंतजाम हो जाएगा। फिर, अन्य कठिनाइयां भी हैं, जैसे मातृभाषा में पठन-पाठन की मुश्किलें। जरूरी था कि शिक्षा की बेहतरी में निजी क्षेत्र के महत्व को पहचाना जाता। आंकडे़ साफ बताते हैं कि निजी स्कूल में जाने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। माना जाता है कि लगभग 50 प्रतिशत बच्चे अभी ही निजी स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं। बेशक, सरकारी स्कूलों की व्यवस्था में सुधार जरूरी है, लेकिन निजी स्कूलों के महत्व को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। नई शिक्षा नीति निजी स्कूलों की बात एकाध जगहों पर करती भी है, तो उन पर नियंत्रण की बात करती है, उनको प्रोत्साहित करने की नहीं। अगर सरकार इनमें निवेश को प्रोत्साहित करे या निजी-सार्वजनिक सहयोग के तहत निजी स्कूलों को कुछ राहत दे, तो देश का शैक्षणिक माहौल काफी हद तक सुधर सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि निजी स्कूलों को मनमानी की छूट दे दी जाए। उन पर निगरानी रखते हुए उनका लाभ उठाने की जरूरत है।
    नई शिक्षा नीति से इंस्पेक्टर राज के लौटने का भी एहसास होता है। इसमें उच्च शिक्षा के लिए एक ही नियामक संस्था की वकालत की गई है। तकनीकी रूप से उसे नियामक तो नहीं कहा गया है, लेकिन जिस तरह के दायित्व उसे सौंपे जाने की संभावना है, उससे वह काम नियामक का ही करेगी। इससे भी बचा जाना चाहिए था।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) अनिल स्वरूप, पूर्व शिक्षा सचिव, भारत सरकार

     दुर्ग । शौर्यपथ । दुर्ग निगम प्रशासन की कार्यवाही हमेशा से विवादित रही है । कार्यवाही के नाम पर मनमानी का पर्याय बनी दुर्ग निगम में वर्तमान समय मे पूर्ण लॉक डाउन घोषित है । इस लॉक डाउन में शासन ने सिर्फ किराना , राशन व अतिआवश्यक वस्तुओं की छूट दी है त्योहार को देखते हुए किराना राशन की दुकानों व सेवई , राखी के स्टाल को पहले दी दिन की छूट दी गई उसके बाद यह 2 दिन और बढ़ा दी गई । किन्तु इस छूट का नियमो को ताक में रख कर फायदा उठाया जा रहा है इंदिरा मार्केट में आनन्द डेयरी के सामने संचालित डिस्पोजल दुकान द्वारा । इस डिस्पोजल दुकान  के संचालक सतीश गोयल है जो लगातार तीन दिनों से दुकान खोल भी रहे हैं व व्यापार भी कर रहे है वो भी प्रतिबंधित प्लास्टिक के क्रय विक्रय का । 

      शासन के नियमानुसार प्लास्टिक गिलास प्रतिबंधित है जिसकी जानकारी निगम प्रशासन के स्वास्थ्य व बाजार अधिकारी दुर्गेश गुप्ता सहित निगम आयुक्त बर्मन को भी है किंतु शायद गोयल प्लास्टिक से खास लगाव है अधिकारियों का जो लगातार तीन दिनों से अवैध तरीके से दुकान तो खोल ही रहे है साथ ही प्रतिबंधित प्लास्टिक का व्यापार भी कर रहे है । क्या निगम प्रशासन मामले को कानूनी रूप से संज्ञान लेकर कार्य वाही करेगा या निजी रूप से टेबल के नीचे वाली कार्यवाही होगी ?

    दुर्ग / शौर्यपथ / भाई - बहन के सबसे बड़े त्यौहार में जिला प्रशासन ने लॉक डाउन में कुछ रियायत बरतते हुए आम जनता के लिए सुकून भरा आदेश पारित किया . जिला प्रशासन दुर्ग द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार आगामी त्योहारों को ध्यान में रखते हुए किराना दुकान एवं राखी के स्टाल 31 जुलाई और 1 अगस्त को सुबह 6 बजे से सुबह 10 बजे तक खुले रहने का आदेश दिया है .

    भिलाई / शौर्यपथ / आने वाले दिनों में त्योहारों को देखते हुए मेयर व भिलाई नगर विधायक देवेंद्र यादव ने कलेक्टर डॉ. सर्वेश्वर भुरे को पत्र लिख कर मांग की है कि जिला प्रशासन जनता को त्योहारी सीजन में खरीदी करने का समय दे। शहर के बाजारों को दो दिन शुक्रवार और शनिवार तक और खोला जाए। ताकि त्योहार के लिए लोग खरीदी कर सके।
    गौरतलब है कि कोविड 19 के संक्रमण और बढ़ते केस को देखते हुए शासन के आदेशा नुसार शहर में लॉक डाउन कर दिया गया है। इस कारण से अधिकांश दुकानें व बेहद जरूरी सेवाओं को छोड़ कर सभी बंद रहेगी। लेकिन आने वाले दिनों में देश का बड़ा पर्व है। इन त्याेहारी सीजन को देखते हुए मेयर देवेंद्र यादव ने कलेक्टर डॉ. सर्वेश्वर भुरे को पत्र लिख कर मांग की है कि प्रशासन त्योहारी सीजन में जनता को थोड़ी राहत दे और दो दिन शहर के बजारों को खुला रहने का आदेश जारी करें। साथ ही मेयर ने यह भी कहा कि दुकान खोलने के साथ ही सोसल डिस्टेंसिंग, मास्क आदि सावधानियों का सख्ती से पालन भी किया जाए ।

    दुर्ग / शौर्यपथ / नगर निगम में केंद्र सरकार की पीएम आवास योजना का हाल बेहाल है। दो साल पहले तत्कालीन महापौर चंद्रिका चंद्राकर ने 88 परिवारों को कार्यक्रम आयोजित कर पक्के आवासों की चाबी सौंपी। यहां रहने आए लोग लौट गए क्योंकि आवासों में न तो पानी-बिजली जैसी बुनियादी सुविधा ही नहीं थी। करीब 25 करोड़ की लागत से 21 ब्लॉकों में बने 252 आवासों में सन्नाटा पसरा है। केंद्र सरकार की योजना में राज्य सरकार का भी पैसा लगा है। शासन के निर्देश पर नगर निगम की पिछली परिषद ने शहर में आवासहीन या किराए पर रहने वाले लोगों से आवेदन जमा कराए थे। सबको पक्के मकान देने का खूब शोर मचाया गया। दुर्ग शहर में कुल 25 हजार लोगों ने आवेदन जमा किया। पिछले पांच साल में कछुआचाल से चली योजना के पहले चरण में बनाए गए पक्के आवासों का न तो काम पूरा हुआ न आवंटन की प्रक्रिया पूरी हो पाई है। बोरसी में कुल 24 करोड़ 83 लाख रुपए की लागत से बने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कुल 252 आवास बनाने का काम पूरा करने की समयसीमा खत्म हो चुकी है। यहां के 10 ब्लॉकों के 132 मकानों में किचन और टायलेट के काम अधूरे हैं। कहीं किचन का सिंक नहीं लगा है तो कहीं वाशरूम के नल ही नहीं लगे हैं। सभी आवासों में इलेक्ट्रिक कनेक्शन देने का काम भी अधूरा पड़ा है। यहां सबसे पहले ठगड़ा बस्ती की कच्ची झोपड़ी में रहने वालों को शिफ्ट करने का प्लान बनाया गया। करीब 88 लोगों को पक्के आवासों का आवंटन किया गया। यहां कई लोग सामान के साथ रहने के लिए पहुंचे। हकीकत पता चली तो सभी परिवार वापस लौट गए। वजह ये थी कि इन आवासों में पानी सप्लाई के लिए मेन पाइप से कनेक्शन जोडऩे का काम ही नहीं हुआ था। आवासों में लाइट फिटिंग थी लेकिन बिजली कनेक्शन जोडऩे का काम नहीं किया गया था। पक्के आशियाने का सपना लेकर पहुंचे लोग चंद घंटों में ही बैरंग अपनी झोपड़ी में लौट गए।
    इस मामले में विधायक अरूण वोरा ने नाराजगी जताते हुए कहा है कि योजना पर 25 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। वोरा ने तल्ख लहजे में कहा कि अगर गरीबों को पक्के आवास बनाकर नहीं देना थाए तो इतनी बड़ी राशि क्यों खर्च की गई। भाजपा शासनकाल में सिर्फ वादे किए गए। इन वादों को पूरा नहीं किया गया। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आवासहीन परिवारों को मकान देने का काम प्राथमिकता से करने की घोषणा की है। यह काम सर्वोच्च प्राथमिकता से पूरा किया जाना चाहिए। उन्होंने निगम प्रशासन के साथ.साथ जिला प्रशासन से भी आग्रह किया है कि योजना के अधूरे कार्यों को प्राथमिकता से पूरा कराएं और तत्काल पात्र हितग्राहियों को आवास आवंटित करें।

    जयपुर / शौर्यपथ / राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों पर निशाना साधते हुए कहा कि वे देश के लिए अनर्थकारी साबित हुई हैं. गहलोत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के एक ट्वीट को ''रिट्वीट'' करते हुए लिखा है, ‘‘प्रधानमंत्री मोदी की गलत नीतियां देश के लिए विनाशकारी साबित हुई हैं. जैसा कि राहुल गांधी ने रेखांकित किया है कि चाहे वह नोटबंदी हो, जीएसटी का कार्यान्वयन हो या कोरोना वायरस के दौरान कुप्रबंधन या गिरती अर्थव्यवस्था...रोजगार छिनने से चारों तरफ अंधेरा है. दस करोड़ रोजगार छिनने का भय भयावह है.'' इससे पहले राहुल गांधीने कोरोना वायरस के कारण दस करोड़ नौकरियां खतरे में पड़ने वाले समाचार को शेयर करते हुए लिखा, ‘‘मोदी देश को बर्बाद कर रहे हैं.''
    गौरतलब है कि अशोक गहलोत इस समय राजस्‍थान में सियासी चुनौती का सामना कर रहे हैं. सचिन पायलट की अगुवाई में डेढ़ दर्जन विधायकों ने उनके खिलाफ बागी तेवर अख्तियार कर रखे हैं. गहलोत ने राज्य में जारी राजनीतिक गतिरोध की ओर संकेत करते हुए बुधवार को दावा किया था कि ‘‘यह लड़ाई हम जीतेंगे.'' इसके साथ ही मुख्‍यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार स्थायी व मजबूत है.

    गहलोत ने कहा था, ‘‘केंद्र सरकार के सहयोग से, भाजपा के षड्यंत्र से और धनबल के प्रयोग से राज्य की कांग्रेस सरकार को अस्थिर करने की साजिश रची जा रही है.'' पार्टी से बगावत करने वालों को माफी को लेकर गहलोत ने कहा कि इस बारे में फैसला आलाकमान को करना है. उन्होंने कहा, ‘‘यह लड़ाई हम जीतेंगे और जिन लोगों ने पार्टी को धोखा दिया है वे या तो वापस आ जाएंगे, माफी मांग लेंगे पार्टी आलाकमान से कि गलती हो गई. आलाकमान जो भी फैसला करेगा, हमें मंजूर होगा.''

     

    नई दिल्ली / शौर्यपथ / सुप्रीम कोर्ट ने फसलों को बचाने के लिए कुछ राज्यों में नीलगाय जैसे जंगली जानवरों को मारने की अनुमति दिए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका पर राज्यों को नोटिस जारी किया है. CJI एसए बोबडे ने कहा कि इस मामले में हम जानना चाहते हैं कि वन विभाग क्या कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने मामले को केरल में हथिनी की मौत के मामले के साथ जोड़ा है.
    सांसद अनुभव मोहंती ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है और भारत में जंगली जानवरों की अंधाधुंध और नृशंस हत्या के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से दखल देने की मांग की है. अपनी याचिका में केंद्रपाड़ा के बीजेडी सांसद ने दलील दी है कि बिहार, हिमाचल प्रदेश और केरल जैसे कई राज्यों की सरकारों ने नीलगाय और जंगली सुअर जैसे जंगली जानवरों की हत्या को वित्तीय रूप से प्रोत्साहित किया है. दुर्भाग्य से राज्य सरकारों द्वारा पुरस्कृत होने का एक लोकप्रिय तरीका जंगलों में बम और जहर लगाकर जानवरों की हत्या करना है.

    सुप्रीम कोर्ट ने इस पर बिहार, हिमाचल, केरल और अन्य राज्यों को नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने टिप्पणी की है कि मनुष्य और पशुओं के बीच टकराव रोकने का उपाय ढूंढा जाना चाहिए. चीफ जस्टिस ने कहा कि हम इस मामले को चिंता के साथ ले रहे हैं. क्या होगा अगर जंगली जानवर खेत की भूमि को नष्ट कर दें. फसलों को नष्ट करने वाले एक जंगली बाघ या दुष्ट हाथी को मारा जा सकता है या नहीं? हां, 50 नीलगायों को मारना न्यायसंगत नहीं है.


    चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने कहा कि रबर की गोलियां होती हैं, जिनका उपयोग किया जा सकता है, जिन्हें विस्फोटक
    के स्थान पर इस्तेमाल किया जा सकता है. याचिका में सुझाव दें और यह भी देखें कि क्या ऐसा हो रहा है कि जंगलों के अंदर जानवरों की जमीन पर अतिक्रमण हो रहा है? CJI ने कहा कि हमें एक समाधान की आवश्यकता है. कोई समाधान केवल यह कहने में नहीं है कि उन्हें मत मारो.

     

    दुर्ग / शौर्यपथ / ब्राम्हण पारा वार्ड 32 में गोस्वामी परिवार का कच्चा मकान लगातार बारिश और तूफान के कारण कमजोर और जर्जर हो गया था जो आज प्राकृतिक आपदा के तहत् गिर गया । इससे किसी भी प्रकार की जानमाल की हानि नहीं हुई । घटना की जानकारी मिलते ही निगम महापौर धीरज बाकलीवाल मौके पर पहुॅचें। उन्होनें प्रभावित परिवार के मुखिया से मुलाकात कर उन्हें सांत्वना दी और यथा संभव सहयोग का आश्वासन दिये। इस दौरान तहसीलदार श्रीमती पार्वती पटेल, निगम कार्यपालन अभियंता मोहनपुरी गोस्वामी के अलावा भवन अधिकारी गिरीश दीवान, उपअभियंता विनोद मांझी, वार्ड निवासी अनिल ताम्रकार, दिलीप बाकलीवाल, दीपक तम्बोली आदि उपस्थित थे ।
    मौके पर उपस्थित निवासियों ने महापौर को जानकारी में बताया कि यह कच्चा मकान सतीश गोस्वामी का है। जहाॅ 4 परिवार के 18 लोग निवास करते हैं। महापौर ने परिवार के मुखिया से मुलाकात कर सांत्वना देते हुये अभी अस्थायी रुप से निगम की आईएचएसडीपी आवास में आवास देने की पहल की । उन्होनें कहा इस भूमि मकान का पारिवारिक समस्याओं को दूर करने के बाद यहाॅ प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत् आवास का निर्माण करा दिया जावेगा । उन्होनें उपस्थित निगम अधिकारियों को आवश्यक कार्यवाही करने निर्देश दिये। साथ ही उन्होनें कहा शहर के अंदर और भी एैसे ही पुराने कमजोर और जर्जर मकान होगें सभी का सर्वे किया जावे । और समय रहते उसे डिसमेंटल की कार्यवाही कर संबंधितों को योजनाओं के तहत् लाभ दिया जावे।

    नई दिल्ली / शौर्यपथ / सुशांत सिंह राजपूत मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने बिहार पुलिस को पत्र लिखकर दर्ज हुई एफआईआर की प्रति मांगी है. एक अधिकारी ने बताया कि ऐसे में अब मामला पीएमएलए के तहत दर्ज किया जा सकता है. सुशांत के पिता ने एफआईआर में रिया चक्रवर्ती पर आरोप लगाया है कि उनके बेटे के बैंक खाते से कम से कम 15 करोड़ रुपये अज्ञात खाते में ट्रांसफर किए गए हैं. अब इस लेनेदेन की जांच ईडी कर सकती है. बीते महीने की 14 तारीख को सुशांत सिंह राजपूत अपने आवास पर मृत पाए गए थे.
    मामले से जुड़ी अहम जानकारियां :
    प्रवर्तन निदेशालय ने बिहार पुलिस से सुशांत सिंह राजपूत के पिता केके सिंह द्वारा रिया चक्रवर्ती और उनके परिवार के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर की प्रति मांगी है.
    एफआईआर में रिया चक्रवर्ती के परिवार के सदस्यों के अलावा अन्य छह लोगों के नाम भी हैं. सुशांत के पिता ने सुशांत को आर्थिक रूप से धोखा देने, उसे मानसिक रूप से परेशान करने और आत्महत्या के लिए उकसाने का करने का आरोप लगाया था.
    सुशांत सिंह राजपूत के पिता ने रिया पर आरोप लगाया कि उसने एक्टर के अकाउंट से 15 करोड़ रुपये अंजान लोगों के बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिए थे. अब मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल को ध्यान में रख ईडी मामले की जांच कर सकती है.
    एजेंसी के सूत्रों ने एनडीटीवी को इस संबंध में बताया कि ईडी ने अभी तक धन शोधन निवारण अधिनियम केस के तहत कोई मामला दर्ज नहीं किया है. हमने बिहार पुलिस से सिर्फ विवरण की मांग की है. बिहार पुलिस से विवरण और दस्तावेजों की जांच के बाद मनी लॉन्ड्रिंग जांच शुरू करने के बारे में निर्णय किया जाएगा.
    इससे पहले दिन में,सुप्रीम कोर्ट ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंपने की अपील को खारिज कर दिया था.
    चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने याचिकाकर्ता अलका प्रिया को निर्देश दिया कि अगर आपके पास कुछ भी ठोस है तो वो बॉम्बे हाई कोर्ट जाएं. अन्यथा पुलिस को अपना काम करने दें.
    सीबीआई जांच के लिए विभिन्न नेताओं द्वारा आवाज उठाने के बाद बुधवार रात महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने कहा था कि इस मामले को सीबीआई को नहीं दिया जाएगा.
    सुशांत सिंह राजपूत के पिता ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उन्होंने पटना से मुंबई तक उनके द्वारा दायर मामले को स्थानांतरित करने के लिए रिया चक्रवर्ती की याचिका पर फैसला करने से पहले इसे सुनने के लिए कहा है. रिया चक्रवर्ती ने इससे पहले अमित शाह से सीबीआई जांच की अपील की थी.
    सुशांत सिंह राजपूत 14 जून को मुंबई के बांद्रा में अपने अपार्टमेंट में मृत पाए गए थे. मुंबई पुलिस हर एंगल से इस मामले की जांच कर रही है.
    सुशांत सिंह राजपूत केस में रिया चक्रवर्ती सहित अब तक 40 लोगों से पूछताछ हो चुकी और उनके बयान दर्ज किए जा चुके हैं.

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